बुधवार, 12 नवंबर 2014

सपना मांगलिक का आलेख - दहेज – एक कुप्रथा भी और जुर्म भी

दहेज –एक कुप्रथा भी और जुर्म भी

हमारे भारतीय समाज में फैली बुराईयां जैसे वधु हत्या ,बाल विवाह ,कन्या भ्रूण हत्या, रिश्वत ,भ्रष्टाचार इत्यादि बुराइयों का एक ही बीज है और वो है दहेज प्रथा .जिसकी वजह से गरीव और मध्यम वर्गीय मॉ,बाप अपनी कन्याओं के पैदा होते ही या तो उनका काम तमाम कर देते हैं या उन्हें पैदा ही नहीं होने देते .और जो भावुक पिता अपनी कन्या को मारने का साहस नहीं कर पाया वो उसके पैदा होते ही उसका दहेज इकट्ठा करने में लग जाएगा जिससे कि कन्या के युवा होने पर उसे अच्छा घर वर मिल सके और इसी चिंता में डूबे हुए या तो वो खुद कोई गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाता है. या शोर्टकट अपनाने के लिए रिश्वत या किसी रिश्तेदार का हक छीनने या फिर खुद अपनी पत्नी को उसके मायके से गिफ्ट या त्योहारों के रूप में रकम या गहने लाने को विवश करता है .

भारत में दहेज प्रथा सदियों से चली आ रही है प्राचीनकाल में राजा महाराजा अपने से बड़े सम्राट के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना पसंद करते थे और रिश्ता पक्का होने से पूर्व और बाद में तोहफे के रूप में चांदी सोने के थालों में सजा के स्वर्ण मुद्राएं ,गहने ,अश्व या कोई अधीन राज्य भिजवाया जाता था .इस प्रथा का मूल सिर्फ एक ही है और वो है अपनी पुत्री जो कि विवाह पश्चात किसी और के घर में रहने वाली है उसे ससुराल वाले सताए नहीं तथा अपने से बड़े कुल में बेटी ब्याहने से खुद अपने कुल के रुतबे का अत्यधिक बढ़ जाना . केवल माँ बाप कि ही नहीं अपितु देखा गया है कि खुद कन्याओं की भी यही चाहत होती है कि उनका पति उनके पिता या भाई से ज्यादा संपन्न हो और आजकल तो खुद पुत्रियां अपने घरवालों को दहेज देने के लिए विवश करती हैं जिससे कि उनके ससुराल और सोसाइटी में उनकी वाह वाह हो .

दहेज की इस समस्या ने वर्तमान समय में बड़ा ही विकट रूप धारण कर रखा है .जिसके अंतर्गत वर पक्ष गाडी ,रकम जमीन की वधु पक्ष से मांग करते हैं और मांग पूरी ना होने पर वधु को तरह तरह से धमकाया और मारा –पीटा जाता है. उसपर भी दहेज की रकम ना हासिल हो तो उसे केरोसिन डाल कर जलाया जाता है जिससे उस वधु से छुटकारा मिलने के उपरान्त दोबारा वर का विवाह किया जा सके और दूसरी वधु के घरवालों से दहेज प्राप्त किया जा सके.

दहेज हत्या अक्सर उन्हीं वधुओं की होती है जो अपने ससुरालवालों की नाजायज मांगों के सामने नहीं झुकती या फिर उनके माता पिता अपना घर दुकान इत्यादि बेचकर भी वर पक्ष की इच्छित राशि का प्रबंध नहीं कर पाते .गरीब माँ बाप कई बार अपनी बेटी को इस तरह विवश और अत्याचार सहते हुए नहीं देख पाते और अपना सब कुछ गिरवी रख देते हैं. जिसका परिणाम यह होता है कि ससुराल वालों के मुंह तो भष्मासुर की तरह से खुले के खुले ही रहते है और वो खुद भी दर -दर की ठोकर खाने को मजबूर हो जाते हैं .

एक सच्ची घटना का जिक्र करती हूँ-“मेरे एक पहचान वाले फतेहपुर सीकरी में पान कि दुकान चलते हैं जिससे उनके ३ लड़कियों और २ लड़कों का पढ़ाई लिखाई और घर खर्च भी चलाना कई बार संभव नहीं हो पता .बच्चियों के युवा होने पर लोगों ने उन्हें सलाह दी कि कन्याओं का विवाह सामूहिक विवाह सम्मेलन के द्वारा कराया जाए वहां दहेज नहीं देना पड़ता और सम्मेलन में लड़की को विवाह का सारा सामान उपहार में भी मिलता है .पिता ने एक सम्मेलन में रजिस्ट्रेशन करवाया और एक उपयुक्त काम करने वाले लड़के से अपनी पुत्री का संबंध पक्का कर दिया .

सम्मेलन वालों ने विवाह का जोड़ा मंगल सूत्र घर गृहस्थी का तमाम सामान उपहार स्वरुप वधु को दिया .तथा माता पिता ने भी क्षमतानुसार जो बन पड़ा अपनी लाड़ली बिटिया को प्रेम से दिया .शादी के कुछ दिन बाद से ही वर व उसके परिवार वाले वधु पर दो लाख का इंतजाम करने का दबाव डालने लगे बेचारी वधु कैसे अपने घरवालों से यह कहती क्यूंकि उसे तो परिवार की आर्थिक तंगी का पता था .लेकिन उसके पडोस में रहने वाली उसके ही गाँव की एक महिला को उसकी परेशानी और उसके ऊपर होने वाले अत्याचार का पता था .उसने वधु के माँ बाप को ये सूचना दी .वधु ने अपने माता –पिता से कहा कि वो सब सह लेगी. लेकिन उसके छोटे भाई बहन का पिता ध्यान रखे क्योंकि उनकी शादी और काम के लिए भी पैसे चाहिए वधु ने यह भी बताया कि वह माँ बनने वाली है और भगवान ने चाहा तो उसका बच्चा अपने पिता और दादी दादा के मन में उसके और उसकी माँ के लिए प्यार पैदा कर देगा .पिता ये सुनकर खुशी खुशी वापस अपने गाँव चला आया और फिर करीब ४ महीने बाद पता चला कि उनकी बेटी जो छह माह से गर्भवती थी की जलाकर हत्या कर दी गयी और लाश को भी ठिकाने लगा दिया गया

बहुत निराशा होती है .यह देखकर कि जो लड़का अग्नि के सात फेरे लेकर जिस लड़की को जीवन भर साथ निभाने के और उसकी रक्षा के सात वचन देता है .वही उसका साथ एक जन्म तो क्या कुछ वर्ष तक भी नहीं निभा पाता और अपनी कुछ महत्त्वाकांक्षाओं के कारण उस वधु की बलि देने से भी नहीं चूकता .पति को हमारे समाज में परमेश्वर कहा जाता है क्योंकि पत्नी अपने घर ,और तमाम रिश्तों को छोड़ कर उसकी शरण में आती है और पति भी पत्नी को धन से ,मन से सम्मान और खुशियाँ देकर उसकी रक्षा करता है लेकिन आज कल लोग छोटी छोटी लालसाओं को पूरा करने के लिए अपनी उस पत्नी को सताता है जो उसके दुःख में सबसे ज्यादा विचलित होती है ,जो उसे भगवान मानती है और जब वह बीमार होता है तो उसकी माँ से भी ज्यादा सेवा करके उसके लिए प्रार्थनाएं करती है .वो पत्नी जो अपनी सेवा और प्रेम से आपको यमराज के मुंह से खींच लाने की भी सामर्थ्य रखती है .एक औरत जो सबसे ज्यादा प्रेम अपने बच्चे से करती है वह वक्त आने पर अपने बच्चे को त्याग अपने सुहाग को चुनती है .ऐसी पत्नी को यातना देना कहाँ तक उचित है ?एक वेश्या भी एक रात में हजारों रूपये कमाती है लेकिन वह इसके लिए किसी और कि बलि नहीं अपितु अपने ही शरीर की बलि देती है और दहेज मांगने वाले पुरुष उस वेश्या से भी गए बीते हैं जो अपने स्वार्थ के लिए अपनी निरीह पत्नी को हलाल करते हैं .

आज के दौर में भौतिक और आरामदायक वस्तुओं के चलन की वजह से उन्हें प्राप्त करने कि होड़ में लोग सही गलत की परिभाषा को ही भूल चुके हैं .जिसके चलते इस दहेज रुपी कुप्रथा को बढ़ावा मिला है .जो वस्तुएं पुरुष खुद हासिल नहीं कर सकते उसे पत्नी को बलि का बकरा बना कर हासिल करने का प्रयास किया जाता है .जो सरासर गलत है पश्चिमी देश हमारी तुलना में अधिक संपन्न इसीलिए हैं क्योंकि वहां इस तरह की कुप्रथाओं और अंधविश्वासों के लिए कोई जगह नहीं है.

 

साहित्यकार /कवि/स्वतंत्र पत्रकार

सपना मांगलिक (आगरा)up 282005

Sapna8manglik@gmail.com

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