चन्द्रकुमार जैन का आलेख - भूखे को रोटी, सेहत और काम भी मिले तो कोई बात बने।

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भूखे को रोटी, सेहत और काम भी मिले तो कोई बात बने।

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

आदमी खुद को कभी यूं भी सजा देता है,

आपने दामन से ही शोलों को हवा देता है।

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है,

भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है। 

हमारे गाँवों का मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है। कृषि उत्पादन पहले की अपेक्षा बढ़ा भी है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह दुखद सच उद्घाटित होता है कि दुनिया का हर दूसरा कुपोषित नागरिक भारतीय है। भारत सरकार भी मानती है कि गाँव की 75% प्रजा भूख से जूझ रही है। निश्चित तौर पर यह हमारे लिये चिंता और चिंतन की बात है कि कृषिप्रधान देश होने के बावजूद हमारे देशवासी सेहत के योग्य भोजन पाने में अक्षम क्यों है, जबकि देश के सरकारी गोदाम अनाज से भरे हैं। रखे-रखे अनाज गोदामों में सड़ भी रहे हैं ? सरकार इसकी वजह गरीबी को मानती है। आम आदमी गरीब है, इसलिये ज़रूरत भर अनाज भी वह खरीद नहीं पाता। विडम्बना है कि हमारी व्यवस्था इसमें अपनी असफलता मानने से भी नहीं हिचकती, क्योंकि गरीबी दूर नहीं कर पाने की वजह वह देश की बढ़ती जनसंख्या को मानती है, जिसके लिये उससे कहीं अधिक जिम्मेवार जनता है।

भोजन के अधिकार को बचाएँ

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बहरहाल, माननीय उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद भोजन को नागरिक के अधिकार में शामिल किया, ताकि हर आदमी को दोनों समय का भोजन अनिवार्य रूप से मिल सके। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक नेक निर्णय है। एक तरफ अनाज गोदामों में सड़ता रहे और दूसरी तरफ जनता भूख से मर जाय, कुपोषण का शिकार बनकर बीमारियों से मर जाय, लोकतंत्र में इससे अधिक क्रूर मज़ाक कुछ और नहीं हो सकता। सरकार उन ज़रूरतमंदों तक अनाज पहुँचाने का काम करती है, बेशक यह एक उत्तम काम है, मगर सरकार जिस तरह से यह काम कर रही है, उसमें उसकी मंशा पर शक और सवाल दोनों खड़े होते हैं।

भारत की भूखी जनता तक अनाज पहुँचाने की व्यवस्था (पीडीएस) पहली बार 1940 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत को तब करनी पड़ी थी, जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था। उसके बाद भारत सरकार को फिर इस प्रणाली की मदद लेनी 60 के दशक में देश में आये भयंकर अकाल से जनता को बचाने के लिये। उसके बाद देश में हरित क्रांति आई, अनाज की पैदावार दूनी हो गयी। इसके साथ ही बिजली के प्रसार और सिंचाई के लिये नहर आदि अन्य विकल्पों ने सूखे की आशंका को कमतर बना दिया। मगर पीडीएस फिर भी रुका नहीं, तब से वह लगातार अपनी सेवा देता आ रहा है। और अब जब सरकार ने भोजन को नागरिक अधिकार में शामिल कर दिया है तब पीडीएस की भूमिका और उपयोगिता और बढ़ गयी है। देश भर में अभी तकरीबन पाँच लाख पीडीएस दुकानें हैं।

लुका-छिपी के खेल से बाज़ आएँ

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मगर एक शोध निष्कर्ष के अनुसार विचारणीय है कि गाँव के ज़रूरतमंदों तक सरकार जिस तरह से अनाज पहुँचाती है, वह अव्यावहारिक,खर्चीला और भ्रष्टाचार से भरी कुव्यवस्था का शिकार आखिर क्यों है ? पारदर्शिता की मौजूदा सदी लुका-छिपी के खेल के आगे घुटने क्यों टेक देती है ? सरकार यह अनाज विदेशों से नहीं मँगवाती, बल्कि राज्य सरकारें गाँव के किसानों से ही खरीदकर भारत सरकार को देती है। भारत सरकार उस अनाज को शहर स्थित खाद्य निगम के गोदामों में जमा करती है। फिर केन्द्र सरकार पीडीएस के तहत बाँटने के लिये गोदाम से अनाज वापस राज्य सरकार के पास भेजती है और राज्य सरकार उसे गाँव स्थित पीडीएस दुकानों में भेजती है। यानी गाँव से शहर गया अनाज वापस गाँव आता है। इस तरह अनाज की इस आवाजाही में करोड़ों रुपयों का गैरज़रूरी खर्च तो होता ही है, अनाज की इस उठापटक में अनाज की अच्छी खासी बर्बादी भी होती है। जबकि यही अनाज पंचायत या ब्लॉक स्तर पर गोदाम बनाकर जमा किये जा सकते हैं और समय के साथ वहीं बाँटा जा सकता है। इससे अनाज की बर्बादी रुकेगी और रखरखाव पर खर्च भी कम आयेगा।

मुफ्त भोजन नहीं,पुष्ट काम दें

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याद रहे कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ऐसे किसी भी तन्दुरुस्त आदमी को मुफ्त भोजन देने के खिलाफ थे,जिसने ईमानदारी से कुछ न कुछ काम न किया हो। उनका कहना था कि मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन हुआ है। सुस्ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्साहन मिला है। नियम यह होना चाहिए कि मेहनत नहीं तो खाना नहीं। हाँ जो शरीर से लाचार हैं, उनका पोषण राज्य को करना चाहिए।

मगर शोध के मुताबिक़ वास्तविकता यह है कि पीडीएस लाचार, बीमार, वृद्ध और कुपोषितों का पोषण करने, जनता को पेट भरने के लिये उद्यम करने की जगह पर काहिल बने रहने के लिये प्रेरित करता है। नहीं तो, गाँव में गरीबी होने के बावजूद किसी काम के लिये मजदूरों की कमी नहीं होती। सिर्फ खेती के काम के लिये ही नहीं, जिसमें ज्यादा मजदूरी न देना किसानों की मजबूरी है, बल्कि अन्य कामों के लिये भी मजदूर नहीं मिलते। लिहाज़ा, मानव श्रम के उपयोग और सम्मान की रक्षा के लिए भी नए विकल्पों पर चिंतन किया जाना चाहिए। बकौल दुष्यंतकुमार भूख का मुद्दा तो हर दौर ज़ेरे बहस रहा है, लेकिन भूख को करने की स्वाभिमान के हासिल का इंतज़ार आज भी ख़त्म नहीं हुआ है। सब्र करें न जाने वह सुबह कभी तो आयेगी। 

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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय

पीजी कालेज,राजनांदगांव

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