शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

महावीर सरन जैन का आलेख - संचार एवं संप्रेषण

संचार एवं संप्रेषण

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अंग्रेजी शब्द 'Communication' शब्द को परिभाषित करना कठिन कार्य है। इसका कारण यह है कि इस शब्द का प्रयोग मानविकी एवं तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के अलग-अलग शास्त्रों में भिन्न-भिन्न संदर्भों में होता है। विशेष रूप से मानविकी के अनुशासनों में इसका विवेचन जिस प्रकार किया जाता है उससे बिलकुल अलग तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होता है। हिन्दी में 'Communication' शब्द के लिए संचार एवं संप्रेषण दो शब्दों का प्रयोग होता है। मेरा सुझाव है कि संचार शब्द का प्रयोग तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रयुक्त 'Communication' शब्द के लिए किया जाना चाहिए तथा संप्रेषण शब्द का प्रयोग मानविकी के ज्ञानानुशासनों में प्रयुक्त 'Communication' शब्द के लिए किया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि संचार शब्द में संदेश की संचरण-प्रक्रिया पर बल है जबकि संप्रेषण में संदेश के संवहन होने पर।

संचार सिद्धांत

संचार सिद्धांत सूचना की तकनीकी प्रक्रिया का अध्ययन करता है। संप्रेषण में वक्ता दूसरे श्रोता को अपने संदेश, भाव, विचार, मनोभाव को पहुँचाने का काम करता है। संप्रेषण मानव जाति में भी होता है और मानवेतर प्राणियों में भी। संचार में सूचना को किसी माध्यम की सहायता से अन्य व्यक्ति को पहुँचाने की प्रक्रिया की प्रधानता है। एक प्रेषक जो सूचना भेजता है। दूसरी पार्टी जो सूचना प्राप्त करता है। प्रेषक माध्यम द्वारा प्राप्तकर्ता को सूचना भेजता है। सूचना भेजने की यह प्रक्रिया संचार है। संचार सिद्धांत के तीन बुनियादी घटक हैं। (1) प्रेषक जो अपने संदेश का विकास एन्कोडिंग के रूप में करता है। (2) संदेश प्रेषित करने का माध्यम चैनल (3) गतव्य जहाँ प्राप्त संदेश की व्याख्या अथवा डिकोडिंग की जाती है। संचार प्रक्रिया का लक्ष्य भी एक व्यक्ति अथवा समूह के संदेश अथवा सूचना को दूसरे व्यक्ति अथवा समूह तक पहुँचाना है। संदेश को तकनीकी साधनों से भेजने के लिए उसका विकास “एन्कोडिंग” कहलाता है। प्राप्त संदेश की व्याख्या को “डिकोडिंग” कहते हैं। जब दो व्यक्ति अथवा दो समूह परस्पर विचारों अथवा भावों का आदान प्रदान करते हैं तो संचार की प्रक्रिया केवल प्रेषक के अपने संदेश को चैनल के माध्यम से गंतव्य तक पहुँचाने तक सीमित नहीं होती। यह केवल एकतरफा संचार तक सीमित होकर नहीं रह जाता। दूसरा व्यक्ति अथवा समूह जब संदेश प्राप्त करता है तो वह प्रतिक्रिया में जो उत्तर संचरित करता है उसे “फीडबैक” कहते हैं। यह चक्र चलता है। यह चक्र भी प्रेषक- प्राप्तकर्ता की प्रक्रिया के ही अनुरूप में होता है। इसमें भूमिकाएँ बदल जाती हैं। प्राप्तकर्ता की भूमिका प्रेषक की हो जाती है। संचार सिद्धांत का जन्म दूर संचार के अविष्कार से हुआ। आजकल वाइस मेल, इन्टरनेट, दृश्य-श्रव्य तकनीक से चैटिंग आदि का चलन बढ़ रहा है। संचार प्रक्रिया के मॉडल को इस प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं।

 

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इसके बुनियादी तत्वों अथवा घटकों का विस्तार निम्न है।

 

1.संदेश- एक अवधारणा, सूचना, संचार, या बयान जिनको मौखिक, लिखित, रिकोर्डिड अथवा दृश्य/श्रव्य रूप में भेजा जाए।

2.प्रेषक अर्थात संदेश अथवा सूचना का स्रोत – टर्मिनल के लिए भेजी जाने वाली कोई सूचना अथवा सूचनाओं का अनुक्रम।

3.संदेश अथवा सूचना की एन्कोडिंग

4."ट्रांसमीटर" - वक्ता की अभिप्रेत सूचना के प्रसारण के लिए चैनल के लिए सिग्नलों का उत्पादन।

5.ग्रहण - "ट्रांसमीटर" से प्राप्त सिग्नलों की डिकोडिंग।

6.प्राप्तकर्ता – व्यक्ति अथवा समूह जो प्राप्त संदेश का अर्थ बोध करता है।

7.प्राप्त करने वाले की प्रतिक्रिया अथवा "फीड बैक"। संदेश प्राप्त करने के बाद प्राप्तकर्ता संदेश को समझता है और फिर उसके अनुसार कार्य करता है।

एन्कोडिंग, संदेश भेजने की प्रक्रिया एवं संदेश की डीकोडिंग का कार्य गणित एवं अभियांत्रिकी का विषय है। इस कारण संचार प्रक्रिया वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषय है। दूरसंचार के क्षेत्र में, संचार प्रणाली व्यक्तिगत संचार नेटवर्क (individual communications networks), ट्रांसमिशन सिस्टमों(transmission systems), रिले स्टेशनों (relay stations), सहायक स्टेशनों (tributary stations) तथा सक्षम डेटा टर्मिनल उपकरण (data terminal equipment =DTE) का एक दूसरे से सम्बंधों और संचार प्रणाली के घटकों के नियंत्रण (interoperation) का एकीकृत संग्रह है। जो अध्येता संचार प्रक्रिया का गहन अध्ययन करना चाहते हैं, वे निम्न ग्रंथों से सहायता ले सकते हैं –

1. Crag, Robert T. (1999). Communication Theory as a Field. International Communication Association.

2. Chandler, Daniel (1994). The Transmission Model of Communication. University of Western Australia.

3. Dainton, Marianne; Elain D. Zellei and others (2011). Applying Communication Theory for Professional Life. Sage Publications

4. Frigg, Roman and Hartmann, Stephan (2009). Models in Science. The Stanford Encyclopedia of Philosophy.

5. Goffman, Erving. The Presentation of Self in Everyday Life. New York, NY: Anchor/Doubleday, 1959. 73.

6. Miller, K., Communication Theories: Perspectives, processes, and contexts. 2nd edition. New York: McGraw-Hill, 2005.

7. Shannon, Claude Elwood (July and October, 1948). A Mathematical Theory of Communication. The Bell System Technical Journal.

8. Werner, E., "Cooperating Agents: A Unified Theory of Communication and Social Structure", Distributed Artificial Intelligence, Vol. 2, L. Gasser and M. Huhns, eds., Morgan Kaufmann and Pitman Press, 1989.

संप्रेषण

हम अपने सामान्य व्यवहार में भाषा को संप्रेषण के पर्याय के रूप में ग्रहण करते हैं किन्तु तत्त्वतः भाषा संप्रेषण का एकमात्र साधन नहीं हैं।

(“It seems convenient to take the term ‘language’ in such a wide sense as to cover all these kinds of systems of means of communication, no matter what material they use.”

- Carnap, Rudolph : Introduction to Semantics, p. 3 (1948), Harvard University Press.)

हम शारीरिक चेष्टाओं, मुखमुद्राओं एवं सहज वाचिक उत्तेजनाओं के द्वारा भी अपने विचारों एवं भावों को संप्रेषित करते हैं। संप्रेषण की ये विधियाँ भाषा से भी प्राचीन हैं तथा आज भी हमारे सामाजिक व्यवहार में व्यह्रत हैं। जब व्यक्ति अपनी बात ‘बोलकर’ अभिव्यक्त नहीं कर पाता तो इशारों की शरण लेता है। इसी के साथ-साथ यह भी द्रष्टव्य है कि भाषा के द्वारा कही गयी बात की अपेक्षा मुखमुद्राओं के भावों को अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

पतंजलि ने अपने महाभाव्य में यह प्रश्न उठाया था कि क्या संकेतों एवं शारीरिक चेष्टाओं को शब्द माना जा सकता है ? उन्होंने इसका उत्तर नकारात्मक दिया तथा स्पष्ट विधान किया कि ये शब्द नहीं क्रियाएँ हैं।

(भगवत्पतंजलि व्याकरण महाभाष्य (प्रथम नवान्हिक) पृष्ट 3 (अनुवादक – चारुदेव शास्त्री) मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (सम्वत् 2025)

किसी समाज की मूल संप्रेषण-विधियाँ संकेत, इशारे एवं भाषा ही हैं। आदिम समाज की अपेक्षा आधुनिक जीवन में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा का सहारा अधिक लिया जाता है। संभवतः इसी कारण समाज वैज्ञानिक दृष्टि से भाषा को ‘‘सर्वाधिक सुनिश्चित संप्रेषण व्यवहार की सर्वाधिक प्रचलित विधि’’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है।

(“Language is the most explicit type of communicative behavior that we know of” -Encyclopaedia of the Social Sciences, Vol., Vol. IV p. 78.)

दर्शनशास्त्री मनुष्य के स्वतः अवाक् चिन्तन को भी भाषा मानते हैं। व्यक्ति कभी-कभी आँख बन्द करके भावों एवं विचारों की गहराइयों में खो जाता है। उस समय वह बोलता कुछ नहीं किन्तु उसके पास बैठा व्यक्ति उसकी मुखमुद्रा को देखकर यह समझ जाता है कि इस समय अमुक व्यक्ति कुछ सोच रहा है और उससे पूछ बैठता है कि तुम चुपचाप बैठे क्या सोच रहे हो ? यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के स्वतः अवाक् चिन्तन को भाषा विज्ञान में ‘भाषा’ की सीमा में आबद्ध नहीं किया जाता । संप्रेषण के सिद्धांत के आधार पर भी हम इसको संप्रेषण-विधि के अन्तर्गत नहीं रख सकते। इसका कारण यह है कि संप्रेषण में एक व्यक्ति के विचारों का दूसरे व्यक्ति तक संवहन होना आवश्यक है।

‘संप्रेषण शब्द को परिभाषित करना अत्यन्त कठिन कार्य है। इस शब्द का प्रयोग अलग-अलग शास्त्रों में भिन्न-भिन्न संदर्भों में होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार किसी जीव की उत्तेजना की निश्चित प्रतिक्रिया संप्रेषण है। इस परिभाषा से संप्रेषण के पूरा स्वरूप स्पष्ट नहीं होता। इसका कारण यह है कि ‘संप्रेषण’ अपने आप में केवल प्रतिक्रिया नहीं है अपितु उत्तेजना का संचरण तथा उसका प्रतिक्रियाओं की जागृति से सम्बन्ध स्थापित करना है।

इसी प्रकार समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच निश्चित चिह्रों या प्रतीकों द्वारा विचार, कल्पना, तथा संवेदना के आदान-प्रदान को संप्रेषण कहते हैं। इस परिभाषा में भी अव्याप्ति-दोष है। संप्रेषण केवल मानव जीवन की ही विशेषता नहीं है।

(“The human factor may be essential in language, but not in communication generally.” Gleason, H.A. : An Introduction to Descriptive Linguistics, Revised Edition (1966) p. 374.)

इसकी परिधि में वे समस्त उत्तेजनाएँ अन्तर्भुक्त हैं, जिनके द्वारा कोई एक प्राणी दूसरे तक संवहन कराकर उसमें प्रतिक्रिया उत्पन्न करा पाता है।

समाज के सदस्य परस्पर संप्रेषण व्यवहार के जुड़ते हैं। यदि हम अपने विचार को दूसरों तक पहुँचाना चाहते हैं तो इसके लिए ऐसे साधनों का प्रयोग करते हैं, जिससे अभिप्रेत अर्थ का उन्हें बोध हो सके। इस दृष्टि से संप्रेषण-प्रक्रिया निश्चित नियमों के समुच्चय के द्वारा जीवन की प्रथाओं एवं विविध व्यवहारों में हमें भागीदार बनाती हैं। अगर एक व्यक्ति अपने मन में बोलता है, तो वह संप्रेषण नहीं हैं। यदि वह जोर से भी बोलता है किन्तु उसके बोलने से श्रोता पर उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती तो वह भी संप्रेषण नहीं है। संप्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि उत्तेजना के संचरण के द्वारा श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। इस दृष्टि से संप्रेषण एवं संप्रेषणीयता में भी अन्तर किया जा सकता है। सूचना का यथार्थ रूप में संवहन होना संप्रेषण है किन्तु संप्रेषणीयता में संवहन की क्रिया का सम्पादन अथवा उसकी संभाव्यता दोनों समाहित हैं। इस दृष्टि वे समस्त व्यवहार संप्रेषणीय हैं जो यथार्थतः अथवा सम्भाव्य रूप में एक प्राणी से दूसरे तक पहुँचाते हैं।

इस दृष्टि से ‘संप्रेषण-सिद्धांत के अन्तर्गत मनुष्य की विशिष्ट मानवीय संप्रेषण विधियाँ अन्तर्भुक्त हो सकेंगी।

संप्रेषण की व्यापक परिभाषा के अन्तर्गत प्रत्येक प्राणी अपने समाज में संप्रेषण- व्यवहार करता है। जिस प्रकार एक मनुष्य आंगिक चेष्टाओं के द्वारा दूसरे व्यक्ति तक अपने मनोभावों को संप्रेषित कर देता है उसी प्रकार पशु-पक्षी भी अपने समुहों में यह कार्य करते हैं। यह भी उल्लेखनीय हैं कि पशु-पक्षी अनेक माध्यमों से संवेदनाओं एवं सूचनाओं का संवहन करते हैं। इस प्रकार संप्रेषण-प्रक्रिया का प्रयोग मानव एवं मानवेतर सभी प्राणियों में होता है। सेवाक ने प्राणी जगत के संप्रेषण-व्यवहार के संकेतों के अध्ययन-शास्त्र का नामकरण “Zoosemiotics” (प्राणी संकेत विज्ञान) किया है।

(Seabok, Thomas A : Perspectives in Zoosemiotics (1972) )

मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों के संप्रेषण के विविध व्यवहारों में ध्वनि, दृष्टि, गन्ध, आदि इन्द्रिय ज्ञान सम्बन्धी अनुभाव साधनों का प्रयोग होता है।

(Chafe, Wallace L. : Meaning and the Structure of Language (1970))

यह बात अवश्य है कि जहाँ संप्रेषण की कुछ विधियाँ मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में भी प्रयुक्त होती हैं वहीं कुछ ऐसी भी संप्रेषण विधियाँ हैं जिनका व्यवहार मनुष्य जाति में ही होता है।

प्राणी संप्रेषणीयता के साधन

प्राणी मात्र में संप्रेषण व्यवहार होता है। कुछ विद्वानों ने पौधों (plant) में और फफूंद में भी संप्रेषण होना माना है। उन विद्वानों ने इसका अध्ययन कोशिका सन्केत (cell signaling), कोशिका संप्रेषण (cellular communication) और रासायनिक संप्रेषण के विभागों में किया है। हम इस लेख में केवल मनुष्य और मनुष्यतेर प्राणियों के संप्रेषण-व्यवहार के सम्बंध में विचार करेंगे। मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों के संप्रेषण की दो मुख्य विधियाँ हैं-

(1.) ध्वनिरहित संप्रेषण

(2.) ध्वनिसहित संप्रेषण (सहज वाचिक उत्तेजनाओं द्वारा)

(क) ध्वनि रहित संप्रेषण

इसके तीन मुख्य प्रकार हैं-

(1.) मुखमुद्राओं द्वारा

(2.) अन्य शारीरिक अंगों के विक्षेपों द्वारा

(3.) इंद्रिय इंगितों द्वारा

मुखमुद्राओं द्वारा

मुखमुद्राओं की भाव-भंगिमा हृदय की बात कह देती है। मनुष्य के संदर्भ में साहित्यकारों ने इन मुखमुद्राओं का अध्ययन विस्तार के साथ किया है। लज्जा एवं शर्म से गालों का लाल हो जाना तथा क्रोधित होने पर भौहों का चढ़ जाना सामान्य बात है। हृदय की प्रसन्नता के समय मुख की जो मुद्रा होती है, वह गहन विषाद के समय नहीं होती। मुखमुद्राओं का यह अन्तर मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों के चेहरों की भाव-भंगिमाओं में भी होता है। अपने बछड़े का स्नेह से दुलारते समय गाय की जो मुख मुद्रा होती है वह क्रोध की अवस्था में बदल जाती है।

अन्य शारीरिक अंगों के विक्षेपों द्वारा

अन्य शारीरिक अंगों के विक्षेपों द्वारा- मुखमुद्राओं के अतिरिक्त शरीर के अन्य अंगों का विक्षेप भी विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति कर देता है। उदारणार्थ, विशिष्ट स्थिति में एक नायिका की आँखू में आँसू तो आते ही हैं पूरा शरीर भी रोमांचित हो जाता है, कम्पित हो जाता है तथा पसीना-पसीना हो जाता है।

‘‘कम्प छुट्यो, धन स्वेद बढ़्यो, तन रोम उठ्यो अखियाँ भरि आई’’।

मनुष्य के इन सहज, स्वाभाविक, अप्रयत्नज, शारीरिक विक्षेपों को नाटय-शास्त्रकार के सात्विक अनुभाव के नाम से पुकारा हैं। साहित्य-दर्पणकार ने इनके अन्तर्गत स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु तथा प्रलय को रखा है।

स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाचः स्वरभडोऽथ वेपथुः।

वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टी सात्त्विकाः स्मृताः।।

(साहित्य दर्पण विमलाख्या टीका 135 (तृतीय परिच्छेद), पृष्ठ 94, मोतीलाल बनारसीदास (1956))

रत्नाकर ने इन सात्विक अनुभावों का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। उद्धव के निर्गुण ब्रह्म का उपदेश सुनकर कोई गोपी काँपने लगी, कोई स्थिर हो गयी, कोई क्रुद्ध तो कोई बड़बड़ाने लगी, कोई व्याकुल हो गयी, किसी को पसीना आ गया तो किसी की आँखों में आँसू आ गये तथा कोई घूम-घूमकर संज्ञाहीन हो पृथ्वी पर गिर पड़ी।

(रत्नाकर – उद्धव शतक, पृष्ठ 40 (1958)

पशु-पक्षियों के अंग-विक्षेपों का इतना गहन विश्लेषण तो नहीं हुआ है किन्तु इतना निश्चित है कि पशु एवं पक्षी भी अंग-विक्षेपों के द्वारा अपने प्राणी समाज में सूचनाओं का संवहन करते हैं। सन् 1946 में वान फिस्क ने यह सिद्ध कर दिया कि मधुमक्खियों का नृत्य निश्चित सूचना प्रदान करने का एक साधन है।

( Lotz, J. : Symbols Make Man, in Lynn White Jr. (Ed.) ‘Frontiers of Knowledge in the Study of Man; p. 228, New York (1956).

मधुमक्खियाँ अपने नृत्य से मकरंद अथवा पराग के क्षेत्र की दूरी एवं दिशा की सूचना परस्पर देती हैं। एक मधुमक्खी ‘क्षेत्र से थोड़ी से मात्रा में मकरंद या पराग अपने छत्ते पर लाती है तथा वहाँ नृत्य की गति एवं आवृत्ति के द्वारा मधु के क्षेत्र की सूचना अन्य मधुमक्ख्यिों को प्रदान करती है। मकरंद या पराग का क्षेत्र छत्ते से जितना अधिक निकट होता है, नृत्य की गति उतनी ही तीव्र होती है तथा जितना अधिक दूर होता है वह गति उतनी ही धीमी होती है। छत्ते से पराग के क्षेत्र की दूरी यदि 100 मीटर होती हैं तो नृत्य की प्रति मिनट आवृत्तियाँ 38 होती हैं तथा दूरी यदि 6 किमीमीटर होती है तो प्रति मिनट नृत्य की आवृत्तियाँ 8 होती हैं। यदि क्षेत्र की दूरी 75 मीटर से अधिक होती है तो वह उसकी दिशा की सूचना अपने शरीर के पिछले भाग के उदर की टेड़ी-मेढ़ी गति के द्वारा देती है। मधुमक्खियों के इस नृत्य के सम्बंध में हॉकिट ने विवेचना की है कि मधुमक्खी के नृत्य की गति तथा आवृत्तियों से उसकी अर्थ-बोधकता का सम्बंध याद्यच्छिक नहीं है। उन्होंने इसका सम्बंध वंश-परम्परा से माना है। मधुमक्खियों का यह ज्ञान अंतर्जात होता है। दूसरे शब्दों में यह नैसर्गिक होता है।

(Hockett, C.F. : A Course in Modern Linguistics, Chapter 64, New York (1958).)

टिनबर्गन के पशुओं के सामजिक व्यवहार का अध्ययन करते समय यह माना है कि उनकी विभिन्न शारीरिक चेष्टाएँ परस्पर तदनुरूप उत्तेजनाओं को जागृत करती हैं।

(Tinbergen, N : Social Behaviour in Animals, Methuen and Co. Ltd., London (1953).)

इंद्रिय इंगितों द्वारा

नाक के द्वारा सूंघकर बहुत से पशु अपनी इच्छा का संवहन करते हैं। स्पर्शन्द्रिय के द्वारा प्राणी मात्र संप्रेषण व्यवहार करता है। शरीर का स्पर्श, मन की बात कह देता हैं। नेत्र के द्वारा भी बात कही जाती है। नेत्रों की भाषा का अध्ययन मनुष्य के संदर्भ में विशेष रूप से हुआ है। बिहारी के नायक एवं नायिका भरे भवन में नैनों से बात करते हैं।

(बिहारी-रत्नाकर, दोहा 32, सम्पादक – जगन्नाथदास रत्नाकर, पृष्ठ 18 (1955))

(ख) ध्वनि सहित (वाचिक सहज उत्तेजनाएँ)

सहज वाचिक उत्तेजनाओं के द्वारा बिना किसी प्रयास के ही मन की भावना प्रकट हो जाती है। आदिम स्थिति से ही मनुष्य चीखता, कराहता, अट्टहास करता, दहाड़ता आया है। मानवेतर प्राणी भी आवाज़ों के द्वारा संप्रेषण करते हैं। हाथी चिंघाड़कर, शेर दहाड़कर, घोड़ा हिनहिनाकर, गधा रेंककर, गाय रंभाकर, बकरी मिमियाकर, कोयल कुहु कर अथवा कूककर, कुत्ता भोंककर, मेंढक टर्राटर और मच्छर भिनभिनाकर अभिव्यक्ति करते हैं। जंगल में शेर की दहाड़ सुनकर न जाने कितने पशु भयभीत हो जाते हैं। हिरन तथा अन्य पशु किसी सम्भावित खतरे को देखकर चिल्लाने लगते हैं। एक हिरन की उस विशिष्ट घबराहट भरी आवाज़ के अर्थ को दूसरे हिरन समझ जाते हैं। एक चिड़िया अगर बिल्ली को देख लेती है तो विशेष प्रकार की आवाज़ करती है जिसको सुनकर आसपास की चिड़ियाएँ उड़ जाती हैं। यौन आमन्त्रण के समय भी पशु-पक्षी विशिष्ट आवाजें करते हैं। हॉकिट ने लंगूरों की संप्रेषण व्यवहार का अध्ययन करते समय विवेचित किया है कि वे मुखमुद्राओं एवं संकेतों के अतिरिक्त वाचिक ध्वनिक आवाज़ों के द्वारा भी पररस्पर व्यवहार करते है।

( Hockett, C.F. : A Course in Modern Linguistics. P. 573)

विद्वानों ने समुद्रीय जीवों की आवाज़ों पर भी अनुसंधान कार्य किया है।

( Tavolga, H.N. and Steinberg, J.C. : Marine Animal Sounds : Science No. 134 (1961).)

मानव जाति की संप्रेषणीयता के साधन

(क) ध्वनि रहित

1.शारीरिक चेष्टाएँ

मनुष्य जहाँ सहज शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा संप्रेषण व्यवहार करता है वहीं उसने अपने सामाजिक जीवन में याछच्छिक शारीरिक चेष्टाओं को विशिष्ट अर्थ प्रदान किए हैं। उदाहरण के रूप में जहाँ मुख का लाल हो जाना अथवा प्रफुल्ल हो जाना, प्राणी संप्रेषणीयता के साधनों के अन्तर्गत समाहित है वहीं मुँह को घुमाकर स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का द्योतन कराना मानव की विशिष्ट संप्रेषण विधि हैं। इसी प्रकार कम्प, स्तम्भ, रोमांच आदि, अंग-विक्षेप प्राणी संप्रेषणीयता के साधनों के अन्तर्गत आते हैं, वही हाथ हिलाना, हाथ मिलाना, हाथ जोड़ना, हाथ उठाना, हाथ दिखाना, आदि के द्वारा विशिष्ट अर्थों का द्योतन मानव की विशिष्ट संप्रेषण-विधियाँ हैं। इन्द्रिय इंगित के भी दोनों प्रकार हैं। इन्द्रियों के अप्रयत्नज सहज सात्विक व्यवहार, जहाँ प्राणी संप्रेषणीयता के अन्तर्गत आते हैं वहीं सायास ‘ आँख मारकर’ अपनी बात कहना मानव की विशिष्ट संप्रेषण विधि का उदाहरण है।

2. अन्य

संप्रेषणीयता के ध्वनि रहित साधनों में मनुष्य ने जहाँ शरीर के विभिन्न अंगों एवं इन्द्रियों के विविध कार्य-व्यापारों को निश्चित अर्थ प्रदान किए हैं वहीं संप्रेषण के अन्य साधनों का विकास किया है। इनके भी हम दो उपभेद कर सकते हैं-

(अ)लिखित (आ) अलिखित

(अ)लिखित

मनुष्य के लेखन कला के विविध रूपों द्वारा संप्रेषण के साधनों का विकास किया है। इनके तीन मुख्य भेद हैं-

(1.) वर्णात्मक

(2.) चित्रात्मक

(3.) चिह्रात्मक

(1.) वर्णात्मक

भाषा को लेखबद्ध करने के लिए मनुष्य ने अलग-अलग ध्वनियों को अलग-अलग वर्णों से लिखना आरम्भ किया। आज का मनुष्य लिपि के द्वारा अपनी बात को दूर-दूर तक पहुँचा देता है। संप्रेषण के इस साधन का दिन-प्रतिदिन विकास हो रहा है। इसके द्वारा हम पुस्तकों, समाचारपत्रों, व्यक्तिगत पत्रों आदि के द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करते हैं।

(2.) चित्रात्मक

हम चित्रों, रेखाचित्रों के द्वारा बिम्ब को ग्रहण कर लेते हैं। पुरूष एवं महिला के भिन्न शौचालयों का बोध कराने के लिए द्वारों पर पुरूष एवं महिला के चित्र बना दिए जाते हैं। रेखागणित की रेखाएँ विषय के जानकारों को विषयगत विवेचना करने का माध्यम प्रदान करती हैं।

(3.) चिह्रात्मक

मनुष्य ने अनेक प्रकार के चिह्रों को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में अपनाया है। बहुत से चिह्न वस्तु के तदनुरूप प्रतीक होते हैं, तो बहुत से पूर्णतः याछच्छिक। सड़कों पर यातायात के चिह्न जहाँ आने वाले मार्ग के मोड़ की सूचना देते हैं, वहीं तरी का निशान हमें दिशा का निर्देश कराता है। वृत्त, त्रिकोण एवं डैश के चिह्न भी इसी कोटि में आते हैं। मनुष्य ने बहुत से याद्दच्छिक चिह्नों की खोज की है। रसायन विज्ञान, गणित विज्ञान आदि विशिष्ट शास्त्रों की बहुत सी अभिव्यक्ति इन ‘माने हुए चिह्नों' के द्वारा ही होती है। भाषाविज्ञान में भी बहुत से चिह्नों का प्रयोग होता है।

उदाहरण-{ }, [ ] , एवं / /

भाषाविज्ञान में इन सांकेतिक चिह्नों का क्रमशः रूपिमिक कोष्ठक, ध्वन्यात्मक कोष्ठक एवं ध्वनिमिक कोष्ठक के अर्थ में प्रयोग होता है।

गाणित, रसायनशास्च, भौतिकी आदि विषयों के विशिष्ट चिह्नों का उस विषय के अध्येता समान रूप से विश्वव्यापी प्रयोग करते हैं। यह बात दूसरी है कि इन चिह्नों के द्वारा अर्थ प्रतीति विषय-विशेष के अध्येतओं को ही हो पाती है, प्रत्येक व्यक्ति को इससे अर्थ बोध नहीं होता। इसी प्रकार मनुष्य ने लेखन प्रक्रिया के आधार पर सांकेतिक चिह्नों की पद्धतियाँ भी विकसित की है, उदाहरण-आशु लिपि (Short-hand)

(आ) अलिखित

सामाजिक व्यवहार की सुविधा के लिए मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रतीकों का प्रयोग करता है। चैराहे पर खड़ा हुआ सिपाही हाथ के इशारे द्वारा दिशा निर्देश करता है। यही कार्य महानगरों में चैराहों पर यांत्रिक प्रकाश व्यवस्था के द्वारा होता है। जिधर लाल रोशनी जलती है उस दिशा का यातायात रूक जाता है। हरी रोशनी जलने पर रूका हुआ यातायात गतिमान हो जाता है। रेल का गार्ड भी लाल, हरी झंडी या बत्ती दिखाता है तो उसका अर्थ सब समझ जाते हैं। जब हम बैंक में जाते हैं और कांउटर पर चेक देते हैं तो बदले में हमें एक टोकन मिलता है। उस टोकन को लेकर जब हम कोषाध्यक्ष के पास केश कांउटर पर जाते हैं तो टोकन के माध्यम से बातचीत हो जाती है। विशिष्ट कार्यक्रमों में निमंत्रण-पत्र को देखकर पुलिस का सिपाही बिना बातचीत के आगत व्यक्ति को हॉल में प्रवेश करने देता है।

(ख) ध्वनि सहित

मानव वागेन्द्रियों द्वारा सायास उच्चरित

मनुष्य ने अपनी वागेन्द्रियों द्वारा सायास उच्चरित वाक् ध्वनियों के विशिष्ट क्रम से निर्मित प्रतीकों के द्वारा जहाँ भाषा का निर्माण एवं विकास किया है वहीं भाषेतर उच्चारों को भी विशिष्ट अर्थ प्रदान किए हैं। भारत के गाँवों में घर में घुसते समय जब कोई व्यक्ति सायास खाँसता है या मँठारता है तो इससे घर की महिलाओं को उसके आगमन की सूचना मिल जाती है।

अन्य साधनों द्वारा

मानव वागेन्द्रियों के अतिरिक्त अन्य ध्वनिक साधनों के द्वारा भी मनुष्य ने संप्रेषण के साधनों का विकास किया है। जब कोई हमारा दरवाजा खटखटाता है अथवा हमारे दरवाजे पर लगी हुई बिजली की घंटी बजाता है तो हमें सूचना मिल जाती है कि कोई आया है।

इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि संप्रेषण की व्यापक परिभाषा के अन्तर्गत जहाँ मानवेतर प्राणियों के संप्रेषण के बहुत सारे साधन अन्तर्भुक्त हैं वहीं मनुष्य के द्वारा विशिष्ट रूप से विकसित बहुस से माध्यम एवं साधन भी समाहित हैं। भाषा विज्ञान में विवेच्य ‘भाषा’ संप्रेषण का पर्याय न होकर उसका एक प्रकार मात्र है। ‘भाषा’ शब्द संस्कृत की ‘भाष्’ धातु से व्युत्पत्र है जिसका अर्थ है-कहना, बोलना, उच्चारण करना, सम्बोधित करना, घोषणा करना, प्रकथन करना, बातें करना। हम भाषाविज्ञान में इस व्युत्पत्त्यर्थ में ‘भाषा’ शब्द का प्रयोग नहीं करते। इसका कारण यह है कि मनुष्य ही नहीं, मानवेतर प्राणी भी आवाज़ों के द्वारा संप्रेषण करते हैं, वे भी बोलते हैं, ध्वनिक उच्चारण करते हैं जबकि ‘भाषा विज्ञान’ में ‘भाषा’ शब्द मानव समाज के उच्चारणों के यादृच्छिक प्रतीकों की व्यवस्था के लिए ही प्रयुक्त होता है। इसका अभिप्राय यह है कि भाषाविज्ञान में 'भाषा' का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग होता है जिसका विवेचन अन्यत्र किया जाएगा।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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