बुधवार, 12 नवंबर 2014

सपना मांगलिक का आलेख - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेरी नजर में

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का अगर आप फोटो देखेंगे तो लगेगा कि कोई गाँव के सरपंच या किसान है .सादा जीवन उच्च विचार की तर्ज पर इनका रहन-सहन और पहनावा था .सादगी की मूरत हजारी जी दिखने में जितने सादा थे उतने ही सादा सहज उनके विचार ,बोली और व्यवहार था ..जिनके बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी था का जन्म 19 अगस्त, 1907 को ओझवलिया, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पं. अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। माता श्रीमती ज्योतिष्मती थीं। 1927 ई. में श्रीमती भगवती देवी के साथ इनका विवाह हुआ। इनके सात पुत्र-पुत्रियां थे। इन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से ज्योतिष और संस्कृत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1929 ई में संस्कृत साहित्य में शास्त्री और 1930 में ज्योतिष विषय लेकर शास्त्राचार्य की उपाधि पाई।8 नवम्बर, 1930 को हिंदी शिक्षक के रूप में शांतिनिकेतन में कार्यारम्भ किया। वहीं 1930 से 1950 तक हिन्दी-भवन में अध्यक्ष का कार्य करते रहे। अभिनवभारती ग्रन्थमाला का संपादन, कलकत्ता में 1940-46 के बीच किया। विश्वभारती पत्रिका का संपादन 1941-47 तक किया। इन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्मानार्थ डॉक्टर ऑफ लिट्‌रेचर की उपाधि 1949 से नवाजा गया । सन् 1950 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर और हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर इनकी नियुक्ति हुई। विश्वभारती, विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउन्सिल के सदस्य 1950-53 काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष 1952-53 साहित्य अकादेमी दिल्ली की साधारण सभा, काशी के हस्तलेखों की खोज (1952) तथा साहित्य अकादेमी से प्रकाशित नेशलन बिब्ल्योग्रेफी 1954 के निरीक्षक। राजभाषा आयोग के राष्ट्रपति मनोनीत सदस्य 1955 रहे.सन् 1957 में राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण उपाधि से इन्हें सम्मानित किया गया .

1960-67 के दौरान, पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ में हिंदी प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष। सन् 1962 में पश्चिम बंग साहित्य अकादेमी द्वारा टैगोर पुरस्कार। 1967 के बाद पुनः काशी हिंदु विश्वविद्यालय में कुछ समय तक रैक्टर के पद पर भी रहे। 1973 में केंद्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत हुए जीवन के अतिंम दिनों में ‘उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान’ के उपाध्यक्ष रहे। 19 मई 1979 को इस साहित्य के आधार स्तम्भ निश्छल ज्वाजल्य्मान आत्म पुंज ने अपनी देह का त्याग कर दिया और परम पिता परमात्मा के ओज में विलीन हो गए.।

द्विवेदी जी, सरल, उदार एवं विनोद प्रियक्तित्व वाले थे। उनका अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बंगला, आदि भाषाओं का गहरा ज्ञान था उन्हें। इसके अलावा भाषा, इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्मशास्त्र आदि विषयों में भी उनकी रूचि थी .

द्विवेदी जी को निबंध में महारत हासिल थी इन्हें ललित निबंधों का जादूगर भी कहा जाये तो गलत नहीं होगा .इनका लिखा निबंध “नाख़ून क्यों बढ़ते हैं “निबंध में इनके पांडित्य को चित्रित करते हैं . द्विवेदी जी की भाषा में भाषण-शैली का प्रवाह और ओज है। संस्कृत, अंग्रेज़ी, ऊर्दू आदि शब्दों का इन्होंने निस्संकोच प्रयोग किया है। द्विवेदी जी का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। विषयानुकूल भाषा उनकी विशेषता थी। अपनी संस्कृतनिष्ठ भाषा के होते हुए भी वे आवश्यकतानुसार देशी विदेशी शब्दों के प्रयोग से नहीं चूके। उन्होंने शब्दों के मर्म को पहचान कर मनचाहा अर्थ सम्प्रेषित कराया। इस प्रकार द्विवेदी जी हिन्दी साहित्य के ऐसे अध्येता हैं जिनमें सर्जन शक्ति की नूतनता, चिन्तन की गम्भीरता, पुरातन और नूतनता का समन्वय है।‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘भारतीय धर्मसाधना’, ‘सूरदास’, ‘कबीर’ आदि ग्रंथ उनके साहित्य की परख और इतिहास बोध की प्रखरता को एखांकित करते हैं। ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’ ‘कुटज’ आदि निबंध संग्रह उनको एक सर्वोत्तम ललित निबंधकार और भारतीय संस्कृति के उद्गाता के रूप में रेखांकित करते हैं।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सांस्कृतिक इतिहास की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कालजयी उपन्यासकार थे। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के साथ ही ‘पुनर्नवा’, ‘चारूचन्द्रलेखा’ और ‘अनामदास का पोथा’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यास द्विवेदी जी की कलात्मक क्षमता के साथ ही उनके प्रखर इतिहास बोध को भी रेखांकित करते हैं। इन उपन्यासों द्वारा उन्होंने बोध के स्तर पर ऐतिहासिकता और पौराणिकता की रक्षा करते हुए अपने युग और समाज के सच को भी उजागर किया है

इनकी मुख्य कृतियाँ निम्न हैं -

आलोचना : हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, नाथ सम्प्रदाय, साहित्य सहचर, हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास, सूर साहित्य, कबीर, कालिदास की लालित्य योजना, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, साहित्य का मर्म, प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद, मेघदूत : एक पुरानी कहानी, मध्यकालीन धर्म साधना, सहज साधना

उपन्यास : बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा, चारु चंद्रलेख

निबंध : कल्प लता, विचार और वितर्क, अशोक के फूल, विचार-प्रवाह, आलोक पर्व, कुटज

अन्य : मृत्युंजय रवीन्द्र, महापुरुषों का स्मरण

संपादन : पृथ्वीराज रासो, संदेश रासक, नाथ सिध्दों की बानियाँ।

हजारी प्रसाद जी की शेली का विवेचन किया जाए तो उसमे निम्न विशेषताएं नजर आएँगी-

आलोचनात्मक शैली – द्विवेदी जी के विचारात्मक तथा आलोचनात्मक निबंध इस शैली में लिखे गए हैं। यह शैली द्विवेदी जी की प्रतिनिधि शैली है। इस शैली की भाषा संस्कृत प्रधान और अधिक प्रांजल है। वाक्य कुछ बड़े–बड़े हैं। इस शैली का एक उदाहरण देखिए—

'लोक और शास्त्र का समन्वय, ग्राहस्थ और वैराग्य का समन्वय, भक्ति और ज्ञान का समन्वय, भाषा और संस्कृति का समन्वय, निर्गुण और सगुण का समन्वय, कथा और तत्व ज्ञान का समन्वय, ब्राह्मण और चांडाल का समन्वय, पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय, राम चरित मानस शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है।'

२. आम बोलचाल शैली – द्विवेदी जी की भाषा शैली अत्यंत स्वाभाविक एवं रोचक है। इस शैली में हिंदी के शब्दों की प्रधानता है, साथ ही संस्कृत के तत्सम और उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। वाक्य अपेक्षाकृत बड़े हैं लहजा आम बोलचाल का है आपको पढ़ते वक्त ऐसा महसूस होगा कि जैसे द्विवेदी जी आपसे आपसी वार्तालाप कर रहे हैं

३. हास्य –व्यंग्य शैली – द्विवेदी जी के निबंधों में व्यंग्यात्मक शैली का बहुत ही सफल और सुंदर प्रयोग हुआ है। इस शैली में भाषा चलती हुई तथा उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का प्रयोग मिलता है।

४. उपदेशात्मक शैली – द्विवेदी जी ने जहाँ अपने विषय को विस्तारपूर्वक समझाया है, वहाँ उन्होंने व्यास शैली को अपनाया है। इस शैली के अंतर्गत वे विषय का प्रतिपादन व्याख्यात्मक ढंग से करते हैं और अंत में उसका सार दे देते हैं।

साहित्य के लिए द्विवेदी जी योगदान हमेशा अजर अमर रहेगा अपने साहित्य के माध्यम से हजारी जी हमेशा ध्रुव तारे की तरह हमारे बीच में वह सदा विद्यमान रहेंगे और हम नव लेखकों का मार्ग अपने निबंधों ,आलोचना और उपन्यासों के माध्यम से प्रशस्त करते रहेंगे ।

 

साहित्यकार /कवि/स्वतंत्र पत्रकार

सपना मांगलिक (आगरा)up 282005

Sapna8manglik@gmail.com

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