बुधवार, 12 नवंबर 2014

बलवन्त का आलेख - ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन क्यों

गायों को ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन क्यों ?

आधुनिक मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पालतू पशुओं के साथ सहअस्तित्व की भावना का निर्वाह न करते हुए जो दुर्व्यवहार कर रहा है, प्रकृति उसे कभी माफ नहीं कर सकती। सर्वविदित है कि माँ के दूध पर संपूर्ण अधिकार उसके बच्चे का होता है। हालांकि मानव अपने व्यावसायिक हितों का ध्यान रखते हुये गायें पालता है। यह भी सच है कि सम्पूर्ण दूध उसके नवजात बछड़े को पिलाना उपयुक्त या सम्भव नहीं है किन्तु उसके पोषण के लिए जितने दूध की आवश्यकता है, उससे उसे वंचित कर देना कहाँ की मनुष्यता है? कहा गया है कि गोपालन हमारा धर्म और कृषि हमारी संस्कृति है, किन्तु इन मान्यताओं से मुख मोड़कर हम अपने धर्म और संस्कृति की जड़ें अपने हाथों ही काट रहे हैं।

प्रायः देखा जाता है कि गोपालक गाय के बछड़े या बछड़ी का उपयोग पवास (पेन्हाव) के साधन के रूप में करते हैं। बछड़े द्वारा स्तन चूषणोपरान्त प्राकृतिक दुग्ध निष्कासन की प्रक्रिया जैसे ही प्रारम्भ होती है, बछड़े को जबर्दस्ती गाय से दूर हटा दिया जाता है। उस समय माँ तथा उसके दुधमुंहे बच्चे पर क्या बीतती है, इसे मनुष्य न समझे तो भला कौन समझ सकता है? इस स्थिति में कोई गाय यथावत बनी रहती है। अनिच्छापूर्वक ही सही मगर दूध निकालने देती है। दूसरा व्यक्ति उसके चारे पर आटा या चोकर-भूसी छिड़कता रहता है, ताकि उसका ध्यान बच्चे की ओर न जा सके। अगर पैर उठाती है तो प्रताड़ित करते हुए दूध निकाल लिया जाता है। किन्तु कोई गाय अत्यधिक संवेदनशील होती है। बच्चे को थन से दूर करते ही उसकी संवेदना प्रभावित हो जाती है और गाय उत्तेजित हो जाती है, जिससे दूध निकलना बन्द हो जाता है। गाय के स्तन में अवरोधिनी मांसपेशी होती है, जिससे गाय अपनी इच्छानुसार दूध का बाहर आना रोक लेती है। जिसे कहा जाता है कि गाय ने दूध चुरा लिया या गाय ने दूध चढ़ा लिया। बछड़े को दूसरी बार पास आने पर उसके स्पर्श से गाय का ममत्व जाग उठता है, वह बछड़े को चाटने-चूमने लगती है और पवास (पेन्हा) जाती है या मनुष्य की नियति भांपकर बछड़े को थन से लगने ही नहीं देती और इधर-उधर हटने लगती है।

व्यावसायिकता की अंधी भूख ने मानव को इतना निर्मम बना दिया है कि वह गाय के बछड़े को उसके मूलभूत अधिकारों से ही वंचित कर देता है। गोपालक के इस दुर्व्यवहार से बछड़े या बछड़ियाँ कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। कभी उनकी मृत्यु भी हो जाती है। उस स्थिति में बच्चे के मृत शरीर में घास-भूसा भरकर पुतले के रूप में गाय के थन के पास ले जाया जाता है ताकि गाय उसे अपना बच्चा समझकर पेन्हा (पवास) जाये। गाय उस पुतले को देखती है, सूँघती है और मन मसोस कर रह जाती है, क्योंकि गाय इतना नासमझ नहीं, जितना मनुष्य समझता है। इतना ही नहीं, यदि पुतले से बात नहीं बनती या दूध निकालने का कोई उपाय नहीं सूझता तो ऑक्सीटोसीन हार्मोन का इंजेक्शन लगाकर उसे दूध छोड़ देने पर विवश कर देता है। इस प्रकार गाय के न चाहते हुए भी उसके थन से पूरा दूध निकाल लिया जाता है। गाय के दूध पवासने (दूध उतारने) की यह कृत्रिम पद्धति कितनी भयानक और विनाशकारी है, इस बात का हम विचार नहीं करते।

गाय के शरीर में इसकी अनावश्यक मात्रा पहुंचाने से यह स्तन और गर्भाशय की प्राकृतिक प्रक्रिया को नष्ट कर देता है। सगर्भा गाय का गर्भ गिर जाता है। डिम्ब अपरिपक्व अवस्था में टूट-टूटकर नष्ट होने से गाय बांझ हो जाती है। ऐसा दूध पीनेवाले व्यक्ति के शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ता है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। हार्मोन ग्रन्थियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है क्योंकि एक हार्मोन की अन्य हार्मोन पर सहज ही क्रिया होती रहती है। अतः दूध पीने से पहले इस बात का ध्यान दें कि वह ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन देकर न उतारा गया हो।

बलवन्त,  विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस
450, ओ.टी.सी. रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर.-560053
 Email- balwant.acharya@gmail.com

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