रविवार, 30 नवंबर 2014

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का हास्य व्यंग्य : बुद्धुमल का ब्याह

बुद्धुमल का ब्याह

बुद्धु शब्द शायद बुद्ध शब्द ही का कोई विकृत क्लोन हो सकता है,यह शब्द किसी जुबां के किसी लुगत में चाहे मिले या न मिले मगर इस शब्द के संबोधन के भावों को चरितार्थ करने वाले राष्ट्र,जाति पांति, धर्म, पंथ और संप्रदाय के दायरे से परे दुनिया के हर कोने में बहुतायत में मिल ही जायेंगे,इनकी नफरी को देखते हुए ये दूसरे ग्रहों पर भी मिल जाये इसकी भी प्रबल सम्भावनाये हैं। जो प्रबुद्ध होते हैं वो तो पुरजोर प्रयास करके इनको इसलिए ढूंढते हैं ताकि उनसे अपनी तुलना कर खुद ही अपने आप पर गर्व कर सकें और जो बुद्धुमल होते हैं वो कुम्भ के मेले में भी अपना जोड़ीदार बड़ी आसानी से तलाश लेते हैं कई सज्जन तो इस बुद्धुमल का लेबल चिपकाए सरेआम इस मकसद से घूमते रहते हैं ताकि जरूरतमंदों को उन्हें तलाश लेने में जरा सहूलियत हासिल हो सके। हां इसमे कई बार अपवाद भी सामने आ जाते हैं कि शिशु के नामकरण संस्कार के दिन पंडित महाशय तो यजमान के सामर्थ्य के अनुरूप अच्छी खासी दक्षिणा लेकर कई देर तक अपना पञ्चांग उलट पलट कर,काफी सोच विचार करने के बाद बालक का नाम बुधदेव रखते हैं मगर निक नेम की बीमारी और घरवालों का प्यार बोधक सम्बोधन उसे बुधदेव से बुद्धु बना देता है अगर दुर्भाग्य से वो किसी राजस्थानी भाषी की चपेट में आ गया तो वो कभी भी बुद्धु से सीधा बुध्द्या भी बन सकता है। इतना कह कर चाचा दिल्लगी दास ने थोड़ी सांस ली और एक छोटे से ब्रेक के बाद फिर बोल पड़े।

    चाचा ने ठीक से कुछ याद करने का एक उपक्रम सा किया और बोले,हुआ कुछ यूं था कि ऐसे ही एक शख्स मुझे भी एक दिन सिटी बस में मिल गये थे ।पहली ही मुलाकात में अपने परिचय के साथ साथ ही उसने मुझे कुछ ऐसे संकेत भी दे दिये थे कि वो पूरा बुद्धु हैं,मगर मुझे अब अह्सहास हो रहा है कि मैं भी बुद्धु ही था जो उसको तब बुद्धू नहीं समझा। चार दिन बाद ही अगली मुलाकात में जब वो फिर मिले तो उन्होंने  दुआ सलाम के साथ ही बताया कि चाचाजी आजकल मैं जरा मशरूफ हूं,मेरा ब्याह होने वाला हैं। मैंने उनकी उम्र आंक कर पूछा कि ब्याह कौन सी बार हो रहा है तो उन्होंने बड़ी शर्मिंदगी के साथ नज़रें झुका कर कहा सिर्फ पहली बार और अपनी मशरूफियत की वजह भी वैसे ही बयां की जैसे कि कोई गूंगा पहली बार गुड़ चख कर के उसके स्वाद का वर्णन अपने ढंग से करने का एक असफल सा प्रयास करता हैं।

   ठीक हैं वो तो मुझे अपना परिचय पत्र दिखा कर चलते बने मगर वो मेरे लिए बेवजह ही मशरूफ होने का काफी सामान छोड़ गये,इतने सवालात दे गये कि पूछो मत और मैं सोचने को मज़बूर हो गया कि लो फिर एक और बुद्धु का ब्याह होने जा रहा हैं,क्या ब्याह वो ही करते हैं जो बुद्धु होते हैं, क्या कोई भी बुद्धु कभी ब्याह से वंचित नहीं रहा,क्या ब्याह के बाद सभी को एक श्रेष्ठ बुद्धु बन कर के व्यवहार करना पड़ता हैं,या जो जन्म जात ही बुद्धु होते हैं उनकी तो खुदा ही जाने कि ब्याह के बाद बेचारों की क्या गत बन जाती होगी। जरा बताना तो कि इन बुद्धुमल जी ने अपने ब्याह की बात मुझसे ही क्यों बताई,क्या नको मेरे सिवाय और कोई दूसरा बुद्धु मिला ही नहीं था अपने जैसा। वैसे उनका ब्याह ही तो हो रहा हैं कोई गिनीज बुक में दर्ज होने जैसा तो कुछ नहीं ।क्या वो अब तक अपना ब्याह होने के प्रति बिलकुल निराश हो चुके थे जो इस कदर बौराए से फिर रहे थे,आदि आदि। वो निरा बुद्धु हैं तो क्या हुआ उनको इतना तो पता होना ही चाहिए था कि ब्याह तो संस्कारों की एक कड़ी है जो मुंडन संस्कार से शुरू होती हैं और अंतिम संस्कार पर ख़त्म होती हैं,सो ब्याह तो एक न एक दिन हो सबका हो कर ही रहना हैं,अक्सर लोग इसे विधाता का ही लेख मान कर कोई ज्यादा फिक्र नहीं करते। हां इससे जो बच जाते हैं वो आगे चल कर वो कर दिखलाते हैं कि ब्याह कर चुकने वाले उनका मुंह ताकते रह जाते हैं।

    अगर वो मुझे अगले फेरे में फिर मिल गये तो मैं उनको तुमसे जरूर मिलवाऊंगा क्यों कि वो एक भिन्न प्रकार के बुद्धु हैं जो कि बुद्धु के अब तक के स्थापित मूल्यों से काफी परे हैं,मसलन वो कहते फिर रहें हैं कि उनका ब्याह होने वाला हैं। अगर वो इस किस्म के बुद्धुमल नहीं हुए होते तो मैं उनके चहरे से ही पता लगा लेता कि वो ख़ुशी के मारे पगलाए फिर रहें हैं या मेरे से सहानुभूति के दो शब्द जुटाने की फिराक में हैं। खुदा करे बुद्धुमलजी का दाम्पत्य जीवन सुखी रहे ,वैसे सुख और दाम्पत्य दो अलग अलग विकल्प हैं। तुम्हें इतना तो पता होगा ही कि जब कोई किसी लम्बी यात्रा पर जाता है तो यात्रा के दौरान अमंगल से रूबरू हुए उसके फिक्रमंद उसको विदा करते समय कहते हैं कि ‘आपकी यात्रा मंगलमय हो’ ठीक उसी प्रकार से दाम्पत्य जीवन को भुगत रहे मित्र और परिजन नया नया ब्याह होने वाले को बधाई स्वरूप कहते हैं कि ‘आपका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो ‘,जबकि उन्हें पक्का मालूम होता है कि उनकी ये दुआए क्या असर करने वाली हैं ।बस इतना कह कर चाचा रुसखत हुए ।

                 पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------