गुरुवार, 13 नवंबर 2014

सपना मांगलिक की कविताएँ

 

मात्र देह नहीं औरत

नहीं एक हाड मांस की पुतली

उसमे भी है प्राण बसे

वो भी है उस परमात्मा की रचना

है सजीव वो भी जाने हंसना रोना

क्यों समझते हो उसे एक भोग्य वस्तु

लपलपाते हो जीभ उसकी सुकोमलता पे

एक इन्सान समझ करो उसकी इज्जत

क्यूंकि मात्र देह नहीं है औरत

उसके अन्दर भी है आत्मतत्व

बोध शोध करने हेतु मस्तिष्क

चाहतें करने का है उसे भी हक़

तुम्हारी तरह उसके पास भी तो है मन

सही गलत का फर्क करने हेतु दिमाग

कर्म करने के लिए मिले उसे भी तो दो हाथ

फिर क्यों छीनते हो उससे बराबरी का दर्जा

एक इंसान हो क्यों दूसरे को करते बेइज्जत

बात समझो, मात्र देह नहीं है औरत

उसके भीतर भी है तुम सम जान

मत कुचलो उसका अस्तित्व और स्वाभिमान

कमजोर नहीं वो है अदभुत एक शक्ति

लो उसकी सहनशीलता और ममता से प्रेरणा

मात्र औरत नहीं वो है तुम्हारी जन्मदात्री

दो सम्मान झुको उसके आगे हो नतमस्तक

क्यूँकी मात्र देह नहीं है औरत

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जीवन एक रंगमंच

सबकी अपनी अलग एक कहानी

चाहे मुनिया हो या बूढी नानी

कहीं खुशी कहीं है रंज

ये जीवन है एक रंगमंच

कहीं स्वानों को बिस्कुट खिलाते

गरीब कहीं रोटी को बिलबिलाते

किसी का जीवन अमृत तुल्य

किसी का है दन्श

ये जीवन है एक रन्गमन्च

जनम के साथ ही उठता है परदा

म्रत्यु से पटाक्षेप उस नाट्यकथा का

आंसू और मुस्कान के साथ ही

पल-पल द्रश्य बदलता मंच

ये जीवन है एक रंगमंच

कभी शिकारी कभी शिकार का

कभी हरियाली कभी उजाड़ का

कलरव करते आजाद पक्षी का मन्चन

दिखाये कभी मोती चुगता हंस

ये जीवन है एक रन्गमन्च

सबके अलग किरदार यहां पर

अलग पहनावा अलग संबाद

परमात्मा के निर्देशन में हम सब

निभाते अपना अपना अभिनय अंश

ये जीवन है एक रंगमंच

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इंसा

इंसा कहता तो है बहुत कुछ

मगर करने से डरता है

मांगता है रिहाई जिंदगी से

और रिहा होने से डरता है

रहता है हरदम ही घिरा सा

उलझनों की भी उलझनों में

संभालना चाहता तो है

मगर गिरने से डरता है

है ये अहसास उसे कि

क्या सही है और क्या गलत

दिल तो मानता है उसका

पर दिमाग से मुकरता है

 

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स्वंय हो

माना जीवन डगर अँधेरी

ना घबराना अंधेरों से मेरे बच्चे

टिमटिमाते जुगनू तुम स्वंय हो

माना मंजिल दूर बहुत है

ना घबराना तन्हाई से मेरे बच्चे

तुम ही राही कारवां तुम स्वंय हो

माना दुःख की छाएंगी घटायें

जीवन में क्षण –प्रतिक्षण

ना घबराना दुखों से मेरे बच्चे

सुख का ओजस्वी सूर्य तुम स्वंय हो

रखो याद बाद वसंत के पतझड़

आता अवश्य ही जीवन में

ना घबराना पतझड़ से मेरे बच्चे

खिलता-महकता उपवन तुम स्वंय हो

जीत –हार पहलू दो उन्नति सिक्के के

ना घबराना हार से मेरे बच्चे

जीत के आगामी कीर्ति स्तंभ

भी तुम स्वंय हो

ना दोष मडना गलती का अपनी

सुनो कभी दूजों के सर

शर्मिन्दा भी होना ना मेरे बच्चे

गलतियों के जिम्मेदार भी तुम स्वंय हो

और उनसे सीखा अनमोल सबक

मेरे बच्चे तुम स्वंय हो

 

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वो वक्त कभी तो आएगा

कोहरे की गिरफ्त से निकलकर

कुछ पल के लिए आज़ाद हो जाएगा

बिखरा के सुनहरी किरणें सूरज

जग में उजियारा फैलायगा

वो वक्त कभी तो आएगा

सूखी धरती तपती रेतों पर

बदली को रहम तो आएगा

उमड़-घुमड़ फिर गरज गरजकर

बादल सावन बरसायेगा

वो वक्त कभी तो आएगा

अमावस की रात से बचकर

चाँद भी चांदनी विख्ररायेगा

भूल अन्धेरा पूर्णिमा के दिन

पूर्ण चाँद बन जाएगा

वो बक्त कभी तो आएगा

ऐसे ही एक हारा हुआ आशिक

कठिन प्रेम तपस्या करके

रूठी प्रेमिका को मनाएगा

प्रेम के ढाई आखर पढके

अपना नाम अमर कर जाएगा

वो वक्त कभी तो आएगा

जव निजहित भूलके जन-जन

राष्ट्रहित को धर्म बनाएगा

दूर होगा भ्रष्टाचार ओ आतंक तब

सही तौर पे देश आज़ाद हो जाएगा

वो वक्त कभी तो आएगा

वो वक्त कभी तो आएगा

 

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सच्चे ईश्वर का निवास

तीर्थस्थानों पे जाकर क्या करना तुमको

वहां नहीं मिलेंगे चाहे कितना ढूंढो भगवान्

पूजा और आडम्बरों को भूल कर तुम

परहित सेवा का धर्म अब अपनाओ

पाप और पुण्य की अवधारणा बकवास है

मानव हो मानव से प्रेम करो ओ लोगो

प्रेम में ही सच्चे ईश्वर का निवास है

मानसिक रोगी और अपंगों ,बेसहारा की करो सेवा

हवस की शिकार युवतियां और लाचार बेवा

सहारा दो कांपते हाथों और अर्धविकसित अंगों को

मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारा में प्रार्थना सेवा

तो बस एक दिखावा और बेहूदा लोकाचार है

मानव हो मानव से प्रेम करो ओ लोगो

प्रेम में ही सच्चे ईश्वर का निवास है

परसेवा में सुकून बहुत धर्म है ये सबसे बड़ा

फिर काहे को शांति तलाशे यहाँ वहां भटके क्यूँ फिरा

गरीबों और असहायों की सेवा में ईश्वर का आभास है

सक्षम हो तुम दूसरों को भी बनाओ सक्षम

कल्याण करो उनके कल्याण में ही तुम्हारा कल्याण है

मानव हो मानव से प्रेम करो ओ लोगो

प्रेम में ही सच्चे ईश्वर का निवास है

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समय बड़ा बलवान

चलता ही रहता यह निरंतर

बिना किसी व्यवधान

जानकर भी इससे हम

क्यों रहते हैं अनजान

समय बड़ा बलवान रे भैया

समय बड़ा बलवान

कभी नवाजे बल से धन से

देता रुतबे का साज ओ सामान

धन में रमके इंसा भूले जब

खुद ही खुद की पहचान

दे पटकनी मिट्टी मिलाए तब

कर देता है यह हलकान

समय बड़ा बलवान रे भैया

समय बड़ा बलवान

समय से कोई बच ना पाया

पीछे भागे हरपल इसका साया

हो जाए कब कुछ का कुछ

पहेली अजब कोई बूझ ना पाया

कभी उदित कभी अस्त

भाग्य विधाता समय तटस्थ

 

परिवर्तन का पाठ पढाए ये “सपना”

रखे ना किसी संग जान पहचान

समय बड़ा बलवान रे भैया

समय बड़ा बलवान

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वक्त बदला है बदलने दो मुझे

थक चुकी हूँ देखकर रोज ही

आईने में बासी सूरत अपनी

ज़माने के हिसाब से ढलने दो मुझे

वक्त बदला है बदलने दो मुझे

कभी रिश्ते तो कभी धर्म

कभी नजाकत तो कभी शर्म

पहचानी गयी हूँ इन्ही से अब तक

हस्ती अपनी नयी गढ़ने दो मुझे

वक्त बदला है बदलने दो मुझे

कभी रस्मों की रूढियां कभी कसमों की बेडियाँ

बांधती रही पैरों में हमेशा ही दुनिया

झंझटों के मेले रास नहीं आते

पतली गली से अब निकलने दो मुझे

वक्त बदला है बदलने दो मुझे

आसमां की बांहे बुला रही हैं मुझे

चांदनी भी रस्ता दिखा रही है मुझे

खोल दो पिंजरा कि उड़ने दो मुझे

वक्त बदला है बदलने दो मुझे

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मेरा सन्घर्ष

जलाती है ओस की बूदें मुझे

जब भी छूती हूँ उन्हे अगुलियों से

चकोर की भातिं ही जन्मों की प्यासी

रूह मेरी तड़पती बूदं भर नेह को

दूर तक फैला नफरत का मरुस्थल

प्यार का सागर पट चुका रेत से

आकर्षक दिखती स्वर्ण कणों सी

सुनहरी रेत के अंगारों से तपते

एक-एक कण से सुलगता छटपटाता

जिस्म गुजारिश करता बादलों से

सूरज हंसता बेबसी पे मेरी

बढा लेता आकार और भी ज्यादा

जाज्वल्यमान किसी विशाल पर्वत सा

डपटकर दूर जाने को कहता बादलों से

मैं निरीह बेहाल स्त्री रह जाती देखती

करते हुए मनमानी हर एक शय को

सूरज को बादलों को ओस औ मरुस्थल को

पर ना मानती हार करती हूँ संघर्ष जिन्दगी से

 

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कभी पा सकोगे

विवाह के बंधन में कैद कर

डाल सिन्दूर मांग में ढेर भर

सबसे जुदा, महफ़िल में तन्हा करके

क्या सोचते हो इस तरह उसे

कभी पा सकोगे तुम

नहीं होती बेजुबां प्राणी एक नारी

रव ने उसे भी बख्शा जिस्म और जान

क्यूँ समझते हो उसे हाथ की पुतली

काबू कर भी लोगे जिस्म उसका

तो क्या मन से भी उसे

कभी पा सकोगे तुम

सपनों को तोड़ भावनाओं को रौंद

चाहे दिखाओ फिर कितनी ही चकाचौंध

मजबूर करो लाख उसे तुम

सिर्फ तुम्हें बस तुम्हें चाहने को

लेकिन हिमसम भावना शून्य मन में उसके

क्या प्यार का दिया कोई जला सकोगे

कभी पा सकोगे तुम

प्रेम का ना कोई नियम ना कोई हल

आपसी समझ विश्वास से होता ये सफल

जव्रण ना पा सकता कोई किसी से प्यार

करले चाहे फिर उसपे कितने ही अत्याचार

उसे विन जाने बिन समझे कर प्रताड़ित

क्या सोचते हो जीवन में इस तरह से

कभी पा सकोगे तुम

नहीं नहीं कभी नहीं कदापि नहीं

तन को गर पा लिया तो क्या

जतन करो कुछ भी मन से ना मुझे

कभी पा सकोगे तुम

 

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साहित्‍य-परिचय
नाम    ः    सपना मांगलिक
जन्‍मतिथि    ः    17 फरवरी 1981
जन्‍मस्‍थान    ः    भरतपुर (राज0)
शिक्षा    ः    एम0ए0, बी0ए0एड0, डिप्‍लोमा इन एक्‍सपोर्ट मैनेजमेंट
        (राजस्‍थान यूनिवर्सिटी)
व्‍यवसाय    ः    फ्रीलांस जर्नलिस्‍ट, साहित्‍यकार, मंचीय कवि, स्‍मंभकार ब्‍लागर (जागरण             जंक्‍शन, सारा सच, मथुरा लाईव) उप संपादिका पीपुल्‍स मैगजीन (मेरठ),         उपसंपादिका आगमन (हापुड)
लेखन    ः    कविता, कहानी, व्‍यंग्‍य, गीत, लेख/आलेख, संस्‍मरण, समीक्षा, आदि।
सम्‍मान    ः    विभिन्‍न प्रादेशिक एवं राजकीय सम्‍मानों द्वारा सम्‍मानित।
प्रकाशन    ः    विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं (प्रादेशिक-राष्‍ट्रीय) और साहित्‍यिक ग्रथों,             वार्षिकी, समाचार-पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रकाशित कृति    ः    प्रकाशित कृति - 13
        कल क्‍या होगा, बगावत, कमसिन बाला (काव्‍य), पापा कब आओगे, नौकी         बहू (कहानी संग्रह) सफलता रास्‍तों से मंजिल तक, ढाई अक्षर (ग्रन्‍थ             संग्रह), जज्‍वा ए दिल भाग 1, 2, व 3 (गजल संग्रह) टिम टिम तारे, द             जंगल ट्रीट, गुनगुनाते अक्षर (बाल साहित्‍य)
प्रकाशधीन (2)    ः    सही अंत (उपन्‍यास)
        धर्म (लघुकथा संकलन)

 

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साहित्यकार /कवि/स्वतंत्र पत्रकार

सपना मांगलिक (आगरा)up 282005

Sapna8manglik@gmail.com

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