सोमवार, 10 नवंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख -- आंसू, आक्रोश और आभार के बीच 'एकता' का अनोखा उत्सव 

आंसू, आक्रोश और आभार के बीच 'एकता' का अनोखा उत्सव 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन  

पच्चीस साल पहले 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरी थी। जर्मन संसद बुंडेसटाग ने शुक्रवार को एकीकरण को संभव बनाने वाली इस घटना की याद की। इस मौके पर जीडीआर से निकाले गए गायक वोल्फ बीयरमन को बुलाया गया। 155 किमी. लंबी और 3.6 मीटर ऊंची बर्लिन की दीवार 28 सालों तक जर्मनी को पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में बांटती रही। याद रहे कि 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार का गिरना इतिहास की यादगार घटना थी। यह दिन शीत युद्ध और यूरोप के विभाजन के खात्मे का दिन था,लेकिन सच यह भी है कि आज भी दुनिया भर में देश, धर्म, जाति, राजनीतिक विचारधारा की दीवारें बनी हुई हैं। 

टुकड़ों में दिखाया पूरा सच 

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खास मौकों पर अपने लोगो के स्थान पर डूडल के जरिए नए प्रयोग करने वाले  गूगल ने आज बर्लिन की दीवार के तोड़े जाने का जश्न मनाया। इस विडियो में बर्लिन, लंदन, सिओल, केप टाउन, मैड्रिड, आइलैंड ऑफ लैंगलैंड, मॉस्को, ब्यूनस आयर्स, बुडापेस्ट, ईन होद, माउंटेन व्यू, स्ट्रॉसबर्ग, कीव, सोफिआ, वॉशिंगटन डीसी और न्यू यॉर्क समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गिरी हुई दीवार के टुकड़ों को लाज़वाब अंदाज़ में दिखाया गया। नेट की दुनिया के एक मशहूर सर्च इंजन की यह वैश्विक जवाबदारी निभाने का तरीका सचमुच सराहनीय ही नहीं अभिनंदनीय है। आज भी दुनिया में न जाने कितनी दीवारें हैं। लेकिन,दीवारों के उठने के अफ़सोस से ज्यादा अहम है किसी भी देश में मानवता की भलाई के लिए उनका गिरना। और ऐसी ही एक महान घटना को इस तरह सेलिब्रेट करना भला आम बात कैसे कही जा सकती है। लिहाज़ा, गूगल के डूडल को साधुवाद। 

इसलिए बनी थी बर्लिन की दीवार 

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द्वितीय विश्वयुद्ध में नाजी जर्मनी की हार के जर्मनी पूर्व और पश्चिम दो भागों में बंट गया। शीत युद्ध के दौर में पश्चिमी जर्मनी में पश्चिमी देशों की सहयोगी सरकार थी, जबकि पूर्वी जर्मनी पर सोवियत यूनियन का प्रभाव था। लोकतांत्रिक सरकार, पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली, आजाद चर्च और लेबर यूनियन के चलते पश्चिमी जर्मनी तरक्की की राह पर था। वहीं, पूर्व जर्मनी मार्क्स-लेनिन प्रभाव वाली सोशलिस्ट तानाशाही सरकार से प्रभावित था। खराब हालत के चलते ज्यादा पैसे कमाने के लिए पूर्वी बर्लिन से सैकड़ों कारीगर और व्यवसायी प्रतिदिन पश्चिमी बर्लिन जाने लगे। लोग सीमा पार न कर पाएं, इसलिए दीवार बनाने का विचार किया गया। 80 के दशक में सोवियत यूनियन के बिखराब के साथ ही पूर्वी जर्मनी की सोशलिस्ट सरकार का पतन हो गया। 9 नवंबर 1989 को सीमा पर आवागमन पर से रोक हटा दी गई है ओर दीवार को तोड़ने का आदेश दे दिया गया। 

जब मिलीं जर्मनी की दो दिशाएँ 

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बहरहाल ये जान लें कि बुंडेसटाग ने बर्लिन दीवार के गिरने की 25वीं वर्षगांठ को आंसुओं, आभार और आक्रोश की भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ मनाया. शनिवार और रविवार को बर्लिन में दीवार के खुलने के मौके पर ढेर सारे आयोजन हुआ। शुक्रवार को उस रास्ते पर 8000 गुब्बारे लगाए गए हैं जहां से होकर पहले दीवार गुजरती थी। उस बीच ज्यादातर जगहों पर दीवार के निशान हटा लिए गए हैं. रविवार को इन गुब्बारों को छोड़ दिया गया जो पूरब और पश्चिम जर्मनी के अलावा यूरोप तथा दुनिया को बांटने वाली दीवार के गिरने का संकेत था। जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार के दौर में मारे गए लोगों की याद में समारोह में हिस्सा लिया। समारोह की शुरुआत ब्रास बैंड की प्रस्तुति से हुई। चांसलर मार्केल और दूसरे अन्य अधिकारी दीवार के बचे हुए अंश पर गुलाब के फूल रखे। लोगों से बात करने के बाद उन्होंने कहा कि यह बात हमेशा समझना जरूरी है कि दीवार के कारण पूरे जर्मनी ही नहीं, बल्कि पूर्वी यूरोप पीड़ित रहा है। इस दीवार के गिरने के बार जर्मनी की तरक्की के कई बंद दरवाजे खुल गए थे। 

शांतिपूर्ण क्रांति का यादगार दिन 

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9 नवंबर 1989 एक जादुई लमहा था. शाम को कहा गया कि यात्रा की आजादी तुरंत लागू हो रही है. इस घोषणा से ले कर रात में दीवार के गिरने तक, कुछ घंटों के अंदर जर्मनों और यूरोप की जिंदगी बदल गई. इतिहास बन गया। सुधारवादी गोर्बाचोव के नेतृत्व वाले सोवियत संघ और पूर्वी बर्लिन के साम्यवादी शासकों ने बल का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया। बीजिंग के तियानानमेन चौक पर हुए नरसंहार जैसा चीनी समाधान टल गया था। 

9 नवंबर का दिन खुशियों की रात और आंसू लेकर आया. इसने जर्मनों को भावुक कर दिया। उसने दोनों हिस्सों में एकीकरण की इच्छा और पूरब में आजादी की भूली दबी भावनाओं को उभार दिया। एक ऐसा उबाल जिसने जर्मनों और बर्लिन वालों को अपने आगोश में ले लिया। हर्षोल्लास की ऐसी भावना जिसने उस समय हम सबको अचंभित कर दिया था। भावनाओं की व्याख्या न की जाने वाली रात ने साफ कर दिया कि विभाजन ने भी एक होने की भावना को नहीं तोड़ा था और इसने हममें से ज्यादातर लोगों को आश्चर्यचकित भी किया,और पूर्व चांसलर विली ब्रांट की शास्वत उक्ति भी आई कि अब वह साथ बढ़ेगा जिसे साथ होना चाहिए। यह एक ऐसा एकीकरण था जो किसी के खिलाफ नहीं था, खासकर पड़ोसियों के खिलाफ नहीं. शांतिपूर्ण क्रांति ने जर्मनी को यूरोप के बीच में ला दिया। 

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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय पीजी

कालेज,राजनांदगांव.


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