शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

दिव्या यादव की कविताएँ

कुछ कविताएं

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दिव्‍या यादव

 

“मन की व्यथा”

रीत गया है
मन का घट अब
शेष नहीं
कुछ और विकार
खाली घट में झाँका मैंने
तो देखी एक दरार
एक समय था
जब मन का हर कोना महका था
बची नहीं कोई दरकार
अब तो अन्तर्मन में
छाया रहता है अन्धकार
जितना घट में भरते जल को
रिसता जाता बारम्बार
जाने कितनी चोटें खाकर
मन करता था अब प्रतिकार
माटी का घट बना सहज था
सह नहीं पाया ठसक अपार
मात्र एक छोटे झटके से
करने लगा वह हा-हाकार
मन की प्रकृति और सहज थी
उडता फिरता था चहुँ ओर
बहुत तेज थी उसकी रफतार
समय ने कुछ करवट ली
छीन लिए सारे अधिकार
घट से अब जल रुठ गया था
पाता नहीं था विस्तार
और अन्त में वही हुआ था
जिसका था कब से इन्तजार
घट भी उतर गया अब मन से
फेंका गया समझ निष्प्राण
किन्तु टूटकर सिसक रहा था
मानो पूछ रहा हो जग से
ये कैसा अन्याय?
जब तक मैं भी नया नया था
जल से मैं भी भरा भरा था
प्यास बुझाता था इस जग की
चाह नहीं थी मेरे मन की
किन्तु आज मैं हुआ निरर्थक
व्यर्थ हुआ सब आज परिश्रम
ये कैसी अनहोनी प्रभु की
समझ न पाया रीत जग की
मुझे इस तरह व्यर्थ न पाते
पत्थरों के बीच न फिंकवाते
भरते माटी मेरे अन्दर
और रोपते पौधा सुन्दर
मैं उसका आश्रय बन जाता
मोक्ष किन्तु मैं फिर भी न पाता
रिसकर भी जीवन दे जाता
मुक्ति इस तरह पा जाता
मन भी इसी तरह कराहता
पाना मुक्ति वह भी चाहता
रीते मन की यही व्यथा है
पहचानी सी यही कथा है
टूटा है फिर भी जीता है
मरकर भी जीवन देता है

 

“अन्तर्मन”

अन्तर्मन के गूढ रहस्य
फिर भी कोई जान न पाया
मरने के आगे क्या है
कोई भी पहचान न पाया
ईश्वर ने भी अब हार मान ली
बोला - कैसे मैं आश्वासन दे दूँ
अब क्या होगा इसके आगे
समय आज तक कहाँ रुका है
चाहे कोई कितना भागे


अभिमान
.
फौलाद बन गई हैं अभिमान की शिलायें
पाले हैं बैर उसने कैसे उसे मनायें
मगरुर है वो इतना, टूटेगा चाहे जितना
आहें नहीं भरेगा, सहे चाहे दर्द जितना
आपस के फासले अब बढते चले जायें

फौलाद बन गई है अभिमान की शिलायें
उसकी हर अदा थी मदहोश करने वाली
पीकर बहकना उसका करना जाम खाली
बेचैनियों के आलम कैसे उसे बतायें
फौलाद बन गई हैं अभिमान की शिलायें
जिन्दगी में उसका आना जादू सा कर गया था
हजारों ख्वाहिशें मेरी पूरी भी कर गया था
मायूसियों के ये पल अब कैसे उसे दिखायें
फौलाद बन गई है अभिमान की शिलायें
उसके बिना तो हर पल लगता है खाली खाली
सुलगते हैं अरमां, रहती है बदहाली
उसके बिना हम जी भी न पायें.

“सन्नाटा”

रात की खामोशी
और झकझोरता है सन्नाटा
दिन में है शोर
दब जाता है सन्नाटा
उदास है शाम
लेकिन गूँजता है सन्नाटा
तपती है दोपहर
फिर छिप जाता है सन्नाटा
ताजगी है सुबह
मुस्कुराता है सन्नाटा
लम्बी है सहर
खिलखिलाता है सन्नाटा.

“बुढ़ापा”

माँ जब जब भी दर्द से कराहती है
अजीब सी बेचैनियाँ मुझे घेरती ;नकारती हैं
असहाय सी हो जाती हूँ मैं भी
माँ की आवाज जब पुकारती है
बढ गया है शीत में माँ के घुटनों का दर्द
रातें हो गई हैं बेहद सर्द
माँ-बाबा की बेचैनी धिक्कारती है
नहीं रुकती माँ की खाँसी
जैसे खाँसती हो बूढी काकी
अपने ही घर में माँ किसे पुकारती है
हर पल विदेश में बसे बेटे का रास्ता निहारती है
माँ की ऑंखों का पक गया है मोतियाबिन्द
न जाने कबसे रेशम की कढाई करना कर दिया है बन्द
सूनी दृष्टि से हर पल ऑंगन बुहारती है
अपने ही घर में माँ किसको पुकारती है
खाँस खाँसकर माँ हो जाती है बेदम
बाबा के रुक जाते हैं बाहर जाते कदम
असहाय बने दोनों लेकिन ममता पुकारती है
बीते दिनों की यादें उनको पुचकारती हैं
आपसी संवाद के सहारे दोनों हैं जिन्दा
बेटे की उपेक्षा से स्वयं हैं शर्मिन्दा
अजनबियों के आगमन से होते हैं खुश
पडोसियों से छिपाते हैं अपनों के दुःख
जमीन अपने गाँव की छोडी नहीं जाती
विदेश में बसने की बात झेली नहीं जाती
रह रह कर हर वक्त यही बात उन्हें सालती है
माँ जब जब दर्द से कराहती है
अजीब सी बेचैनी मुझे धिक्कारती है


“बेटी का जन्म”

बेटे से जुडा था माँ का सम्मान
पैदा हुई बेटी तो खो गये अरमान
बेटे की चाह थी हुआ बेटी का आगमन
एक बारगी बुझ गये माँ बाप के मन
किन्तु बेटी की किलकारी ने मोह लिया मन
भूल गये बेटे की आस कुछ दिन, बेमन
बेटी बडी हुई, पढाई नहीं गई
घर के काम काज में हो गई वो अर्पण
बेटे की आस फिर लहलहाई
माँ की जान मुट्ठी में थी आई
अगर अबकी बार भी बेटी ने लिया जन्म
कैसे दिखाउँगी मुँह मैं हरदम
माँ ने किये उपवास और भी जतन
रहने लगी इस बार थोडी सी वह मगन
किन्तु भाग्य को कुछ और था मंजूर
बेटी ने लिया जन्म, सपना था चकनाचूर
रंज कुछ इस तरह बढा, छोड दी साँस
न और सह सकी बेटे की आस
टूटकर बिखर गया उसका सम्मान
सह न सकी अपनों का अपमान..
जन्म दे बेटी को, माँ थी इतराई
कहती थी माँ, मेरे घर लक्ष्मी है आई
बिटिया के जन्म पर गूँजी थी शहनाई
माँ ने इस जग में नई रीत चलाई
बेटी को जन्म दे, माँ थी इतराई
बेटी ने जब पहली मुस्कान बिखराई
माँ खुशी से फूली न समाई
बिटिया जिन्दगी में नई बहार ले आई
पूरे हुए थे स्वप्न अब, ममता थी गहराई
बेटी को जन्म दे, माँ थी इतराई
बडे ही जतन से माँ, बेटी को सिखलाई
तूने ही लौटाया है बचपन, मैं थी घबराई
बेटी का मोहक रुप देख माँ थी मुस्काई
बेटी ही नया जीवन लेकर के थी आई
बेटी को जन्म दे, माँ थी इतराई
बडी हुई बेटी माँ कर्तव्य निभा आई
स्कूल में पढने के लिये दाखिल कर आई
बेटी थी होनहार, सफलता हर कदम पर पाई
स्कूल के इतिहास में नव स्वप्न रच आई
बेटी को जन्म दे, माँ थी इतराई
ईर्ष्या से भर गये पडोसी और सभी भाई
बेटी ने हर क्षेत्र में सफलता जो पाई
बेटे थे निठल्ले करते न पढाई
माँ बाप की तो बस जान पर बन आई
शरमाये थे बेटी के जन्म पर अब देते हैं बधाई
धन्य है वह माँ, जिसने बेटी पाई..

“सूर्य बनाम दीपक”

सूर्य है अहंकारी
रोशनी फैलाने का अधिकारी
ताप से जल रहा है
किन्तु फिर भी खिल रहा है
अचानक ग्रहण ने तोडा
उसका अहंकार
ढँक लिया तिमिर ने
कर दिया अंधकार
सूर्य ने उजाला चहुँ ओर फैलाया
किन्तु सम्पूर्ण अंधेरा फिर भी न मिट पाया
अंधकार मन का जस का तस रहा
ईर्ष्या, द्वेष जग में फिर भी शेष रहा
दीपक है सूक्ष्म सूर्य के सम्मुख
किन्तु फिर भी जल रहा होकर विमुख
दे रहा प्रकाश सबको जल रहा निष्कंप
फैला रहा उजियारा लेकर विश्वास
जब तक है आस फैलाउँगा उजास
नहीं है कोई बाध्यता दीपक के साथ
संध्या के समय डूबना और उगना सुबह के साथ..


बीता कल, अतीत हुआ अब
आने वाले कल को आज सँवारें हम
नये सपनों की नींव रखें हम
हकीकत को जमीन पर उतारें हम
आलस और वैमनस्य त्याग दें
नव भारत निर्माण करें हम
बीते वर्षों की खलिश मिटा दें
नव वर्ष का आग़ाज़ करें हम
समय असमय को न विचारें
भविष्य का निर्माण करें हम
अधिकारों की बात बिसरायें
कर्तव्यों की बात करें हम
बहुत हुए अब विरोध भावना
सद्भावना की बात करें हम..

“गुलाब”

सुन्दर एक गुलाब खिला था
स्वाभिमान से इतराया था
पवन वेग के एक झोंके ने
आकर उसको सहलाया था
पहले दिन अपनी सुन्दरता पर
मन ही मन वह मुस्काया था
संघर्षों की इस दुनिया में
कब तक यूँ ही जी पाया था
तेज धूप और तूफानों से
फूल न ज्यादा लड पाया था
हरियाला के उस उपवन में
वह भी कितना भरमाया था
उसे अन्त का नहीं पता था
प्रकृति ने ही सब समझाया था
चार दिनों के सुख यों बीते
आखिर में वह कुम्हलाया था
लाल पल्लवों के झडने से
उसने दुःख को अपनाया था
जग में नियति का चक्र यही है
मन ही मन ये दोहराया था 

 

‘विद्युत और सूर्य”

सूर्य उदास था
उसका सब कुछ
उजास था
किन्तु ये अधिकार
उसका छिना था
बिजली ने विश्वास
उसका छला था
सूर्य को अपनी प्रतिष्ठा
दाँव पर लगना खला था
रोशनी ने छीन लिये थे
उसके ये अधिकार सारे
जो कि उसके थे सहारे
उगते सूर्य को नमन करते
गुम गये इन्सान सारे
सूर्य की निश्चेतना में
चाँद तारे बिन सहारे
सुबह हो, शाम छाये
लोग बैठे हैं घरों में
सूर्य आराधना के ढह
गये अरमान सारे
घट रहा था प्रताप सारा
सूर्य ने अपमान धारे
किन्तु यूँ भी तप रहा है
सूर्य का सम्मान सारे
दिग्भ्रान्त जग को है संभलना
न भूले सूर्य के एहसान सारे
बिजली का है क्या भरोसा
कब छोड दें साथ सारे
सूर्य के निश्चित क्रम ने
छोडा नहीं है साथ जग का
जब भी छाया है अंधेरा
सूर्य लाया है सवेरा
आभासित कृत्रिम सी
रोशनी से
प्रकृति के न नियम तोडें..

 

“छोटे बच्चे की आत्म-कथा”

मैं सदा सोचा करता था
मैं भी मानव जीवन पाऊँ
ईश्वर से पूछा करता था
मैं भी माँ को कैसे पाऊँ
और एक दिन मैंने था जीवन पाया
माँ के अन्दर पनप स्थान बनाया
मेरे जीवन का आरम्भ हुआ था
खुश था लेकिन डरा हुआ था
माँ से मैं तो जुडा हुआ था
जीवन अंश बना हुआ था
रक्त-माँस सब खींच रहा था
मैं अपने को सींच रहा था
जीवन कण द्विगुणित होते थे
आकार नया एक नित लेते थे
छोटे-छोटे अंगों से आकार बना था
नयन बन्द थे सोच रहा था
बीते माह एक दिन मैं कुलबुलाया
साँसों की गति से खुश हो आया
अब तो मुझे विश्वास हो गया
मैं भी निश्चित विजय पा गया
माँ के अन्तस का सुख पाकर
उनके सुख-दुःख का भागी होकर
माँ के प्रति आभार जताकर
जगत देखने को अकुलाकर
पूरी कर नौ माह अवधि
माँ से मैंने विनती कर ली
माँ अब मैं भी बाहर आऊँ
ऑंखें खोलूँ तुम्हारे दर्शन पाऊँ
माँ भी विहँस एक दिन बोली
बाहर आकर भर दो झोली
ममता का स्पर्श जो पाऊँ
मैं भी जीवन में तर जाऊँ
और एक दिन मेरा जन्म हो गया
किलकिलकारी सुनकर माँ का जीवन स्वर्ग हो गया
सब खुश होकर देने लगे बधाई
मैंने पैदा होकर वंश बेल बढाई
माँ मुझको लेकर जब घर आई
रीति रिवाजों से मेरी की अगुवाई
माँ के अन्दर जीवन कितना था सुखदाई
अब तो मुझको भूखा होकर आती थी रूलाई
माँ का कार्यक्रम अति व्यस्त था
घर काम-काज अति व्यस्त था
हर कोई खुद में ही व्यस्त था
मैं भी सोने का अभ्यस्त था
मैने धीरे-धीरे बढने की रफ्तार बढाई
मालिश नित करवाकर आने लगी लुनाई
सुन्दर कपडों में सजधज कर काया कंचन हो गई
खेल-खिलौने, संगी-साथी पाकर सारी खुशियाँ पाई
बीता समय लडकपन छूटा
मैं रहने लगा कुछ रूठा
माँ की सीख पिता की घुडकी
मुझे न लगती थी कुछ अच्छी
अब मुझे किया जाने लगा संस्कारित
सारी दुनिया लगने लगी अप्रत्याशित
कडे नियम अपनाकर होने लगा मैं अनुशासित
लेकिन मेरा तन-मन हुआ प्रभावित
हाथ में मेरे पट्टी लेकर
कलम और खडिया से लिखकर,
अक्षर ज्ञान घर पर ही पाकर
विद्यालय को हुआ अग्रसर
विद्यालय में थी अलग प्रणाली
हिन्दी भाषा को बिसराकर
अंग्रेजी में ओलम लिखकर
मेरा भण्डार कर दिया खाली
कैसे कहता मुझको तो हिन्दी आती है
माँ मेरी इसमें ही लोरी गाती है
मुझको नींद बडी आती है
दादी सुबह आरती गाती है
ए फॉर एप्प्ल बी फॉर बॉय
जॉनी-जॉनी यस पापा
ईटिंग सुगर नो पापा
मन से मैं नहीं सीख पाता
तारों से बातें करना अच्छा लगता है
चन्दा मामा का गाना सच्चा लगता है
लेकिन टीचर कितना धमकाती है
मुझको अंग्रेजी कविता नहीं आती है
अब मैं ये सोचा करता हूँ
पानी की एक नाव बना लूँ
और माटी का नया घरौंदा
मन ही मन तरसा करता हूँ
माँ कहती है मिट्टी में ना खेलो
हाथ रगड-रगड कर धोलो
जाकर पहले खाना खालो
फिर अपना होमवर्क कर डालो
लेकिन मैं कुछ समझ न पाता
जाकर कमरे में छिप जाता
माँ की टेर अनसुनी करता
कॉपी लेकर हल्ला करता
माँ मुझको अब कोसा करती है
शिक्षित बनूं रोज कहा करती है
लेकिन मैं नित करूं कल्पना
पढ लिखकर नहीं अफसर बनना
मैं तो एक पक्षी बन जाऊँ
नभ में डोलूँ, नाचूँ गाऊँ
या फिर मैं तितली बन जाऊँ
उडकर बच्चों को तरसाऊँ
बचपन के दिन बडे सलोने
संगी-साथी खेल-खिलौने
राज नये खुलते थे कितने
कितने अच्छे होते थे सपने
मैंने चाही थी मनमानी
लेकिन माँ ने एक न मानी
मेरी शिक्षा को दे सुअवसर
पिता लौट गये विदेश भेजकर
यहाँ सभी कुछ बदल गया था
भोजन पानी सभी नया था
देश छोडना मुझे खला था
लेकिन प्रकृति सौन्दर्य भला था
अपनी यादों को बिसराकर
शिक्षा में दिल को भरमाकर
नई रीतियों को अपनाकर
मैं बन गया था सभ्य मुसाफिर
देश लौटकर अपना हर अरमान सजाया
सुन्दर कन्या को अपनाकर घर-बार बसाया
मैं खुश था माँ का सपना पूरा कर पाया
पाकर जीवन सहज, सफल बन गया..

divya4yadav@gmail.com
केन्‍द्रीय विद्यालय 4
जयपुर

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