बुधवार, 12 नवंबर 2014

अनिल कुमार पारा का आलेख - डीकरी बचाओ अभियान

गर्भ से लेकर ससुराल के स्वर्ग तक बिलखती जिंदगियां !

दोस्तों भारत की पावन भूमि पर जन्म लेने वाली उन जिंदंगियों से आप भली भॅाति परिचित होगें। जिन्होंने भारतीय संस्कृति को अपने संस्कारों से सजाकर हर घर का आंगन महका दिया है और अपनी तेजस्वनी बुद्धि के बल पर अपनी कामयाबी का परचम देश और दुनिया में पहरा दिया।  कहते हैं कि ‘‘जिस घर में मासूम बेटी नहीं होती उस घर की दीवाली रोशन नहीं होती।‘‘ फिर हम क्यों भूल गये हैं कि भारतीय संस्कृति को अपने संस्कारों से सजाने बाली उस बेटी को गर्भ से लेकर ससुराल के स्वर्ग तक बक्सा क्यों नहीं जा रहा है? यदि हम मध्यप्रदेश सहित देश में दर्ज कन्या भ्रूण हत्या सहित दहेज हत्या अथवा घरेलू हिंसा से जुडे उन अपराधों पर नजर डालें तो सभ्य समाज की सांसें थम जाती है। भले ही  भारत सरकार ने कन्या भ्रूण हत्या या दहेज हत्या या घरेलू हिंसा की रोकथाम हेतु कड़े  कानून बनाये है। फिर भी इन धटनाओं से जुडे अपराधों का ग्राफ गिरता दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में सवाल इस बात का है कि क्या समाज पर समाज के सामाजिक बंधन टूट चुके हैं? या फिर आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों का गला घोंटने की कसम खा बैठें हैं हम लोग? या फिर सभ्य समाज का अस्तित्व पूर्ण रूप से गुमनाम हो चुका है? कई तरह के सवाल इन घटनाओं से अपने आप जन्म लेते हैं। जिनके जवाब सभ्य समाज के उन ठेकेदारों के पास भी नहीं हैं, जो लोग रोज सामाजिक सरोकार के उन कार्यक्रमों में बड़ चढ़कर हिस्सा लेते और शाम को घर की चौखट पर कदम रखते ही बेटे की चाह में  मासूम बेटी को भूलकर कभी कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्‍य अपराधों को अन्जाम दे देते हैं तो कभी दहेज के लालच में दहेज हत्या या घरेलू हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य को अंजाम दे देते हैं।

कन्या भ्रूण हत्या से लेकर बेटी के ससुराल में हुई हत्याऐं यह साबित जरूर करतीं हैं, कि इस परंपरा के वाहक अशिक्षित तथा निम्न वर्ग ही है बल्कि उच्च शिक्षित समाज भी है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की बालिका बचाओ योजना(सेव द गर्ल चाइल्ड) हो या गुजरात में ‘‘डीकरी बचाओ अभियान‘‘ हो या मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में संचालित बेटी बचाओ अभियान,  जैसी सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं को बलाय ताक पर रखकर बेटी से जुडे अपराधों में कन्या भ्रूण हत्या और बेटी के ससुराल में हुई हत्याओं का ग्राफ गिरता दिखाई नहीं दे रहा है, क्या इन घटनाओं पर नियंत्रण करने का काम मात्र सरकार और शासन का है? या फिर सभ्य समाज के उस वर्ग का भी जो सीधे तौर पर घर के आंगन से जुड़ा हुआ है? क्या उस बेटी की किलकारियों को गुमनामी का कफन पहनाने की कसम खा बैठे हैं। हम लोग? या ज्यादा दहेज पाने और बेटी की जगह बेटा पाने की चाहत की आकांक्षाओं के बीच उस मासूम की जान को गर्भ से लेकर ससुराल के स्वर्ग तक मारने की कसम खा बैठे है हम लोग?

यह वही बेटी है जिसने अपने बुद्धि और बल से भारत और विश्‍व में नये-नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं, बडे-बडे पदों पर रहकर देश और समाज के हितों की रक्षा के साथ-साथ रिश्तों को भी निभाने के लिये जानी जाने वाली उस मासूम बेटी का कसूर आखिर क्या है? इसका जवाब सभ्य समाज से आज भी अनुउत्तरित है? कन्या भ्रूण हत्या हो या दहेज लोभियों द्वारा दहेज के लिए की गई हत्या ये समाज की ऐसी बुराई है जिनका उत्तरदायित्व लेने वाला कोई नहीं है, बेटी आज बेटी है कल किसी की पत्नी होगी, और परसों किसी की मां फिर हमें इन रिश्‍तों का गला घोंटने का अधिकार किसने दिया है, ये सभ्य समाज के समझ के परे है। भारत में घटी उन जघन्‍य घटनाओं का जिक्र करें तो जुबान पर मासूम बेटी से जुडे अपराधों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। फिर भी हम घर की चारदीवारी के बीच घट रहें उन जघन्य अपराधों से अनजान है। आखिर उस बेटी का कसूर क्या है? जिसकी बलि दुनिया में आने से पहले या फिर ससुराल में कम दहेज मिलने के कारण दे दी जाती है। परिणामस्वरूप देश में महिलाओं के लिंगानुपात में गिरावट बनी हुई है। हम लोग कब नींद से जागेंगे और सभ्य समाज को आगे लेकर बेटी से जुडे अपराधों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेंगे इसका जवाब भी सभ्य समाज से अनुत्तरित है? तथा समाज मूक और गूंगा एंव निःशक्त कहलाने का पात्र भी नहीं है? वह बेटी ही तो है जिसने अपने रिश्‍तों की कुर्बानी देकर अपने पति का घर सम्हाला है। अपने माता-पिता को भूलकर अपने ससुराल को ही अपना घर माना है। जिसने अपना पूर्ण जीवन लड़ते हुए बिताया है। कभी अपनों के लिए तो कभी अपने अस्तित्व के लिए तो कभी समाज और धर्म के लिए रिश्‍तों की कुर्बानी देकर हर घर को संवारा है। फिर क्यों सरकार और शासन द्वारा चलाई जा रहीं बालिका बचाओ अभियान, डीकरी बचाओ अभियान सहित बेटी बचाओ अभियान जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को नजरअंदाज कर बेटियों को गर्भ से लेकर ससुराल के स्वर्ग तक बक्सा नहीं जा रहा है, आखिर क्यों?

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अनिल कुमार पारा,

रामनगर जिला सतना म0प्र0

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