रविवार, 30 नवंबर 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - दौरों का दौर

दौरों का दौर / प्रमोद यादव

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कार्टून-साभार-हरिभूमि,रायपुर

 

‘ गुरूजी...नमस्कार...’

शेविंग करने खिड़की पर दर्पण धरे गुरूजी बैठे ही थे कि सामने एकाएक गजोधर का कद्दुनुमा चेहरा उभर आया..

‘अरे गजोधर...नमस्कार..कैसे हो ? क्या हालचाल है ? ‘गुरूजी ने दाढ़ी में ब्रश से साबुन पानी फिराते पूछा.

‘ बस गुरूजी..दया आपकी..’ गजोधर बोला.

‘सबेरे-सबेरे कैसे भई ? कोई विशेष बात ? ‘ गुरूजी अन्दर से ही पूछे.

‘ नहीं गुरूजी..कोई ख़ास तो नहीं..पर एक-दो बातें पूछनी थी..’ गजोधर ने झिझकते कहा.

‘ अरे एक-दो नहीं..चार पूछो..लेकिन अन्दर आकर पूछो..बाहर खिड़की से ही सवाल-जवाब करोगे तो लोगबाग “ अद्धा-पौवा “ वाली खिड़की समझ..तुम्हारे पीछे लाईन लग जायेंगे..’ गुरूजी ने मजाक करते कहा.

‘ क्या गुरूजी..आप भी मजाक करते हैं..पूरे शहर वाले जानते हैं कि ये एक बुद्धजीवी की खिड़की है..यहाँ दूसरी तरह के नशे का सेवन (और उन्मूलन) होता है..’

‘ तो बताओ गजोधर..तुम किस नशे में अलसुबह गिरते-पड़ते यहाँ पहुँच गए ? ‘

‘ वो क्या है गुरूजी कि ...’

बात को बीच में ही काटते गुरूजी बोले- ‘ अरे पहले अन्दर तो आओ..दरवाजा खुला है..’

गजोधर दरवाजा धकेल अन्दर घुसते ही एक चिरपरिचित स्टूल को खींच गुरूजी के समीप बैठ गया.

‘ गजोधर...हर बार तुम ही पूछते हो...इस बार मैं पूछता हूँ..फिर तुम पूछना..’ गुरूजी बोले.

‘ क्या गुरूजी ? ‘ गजोधर सकपकाया.

‘ यार..पूरे दिन इस पानठेले से उस पानठेले...इस होटल से उस होटल..तरह-तरह के कई अखबार तुम पढ़ते हो..फिर भी दुनिया-जहान की सारी बातें मुझसे ही आकर क्यों पूछते हो ? ‘

‘ वो क्या है गुरूजी कि हर अखबार का हम केवल हेड लाईन भर पढ़ते हैं..इससे हमें प्रमुख और शीर्ष समाचार का ज्ञान हो जाता है..बस उसे याद रखते हैं और नीचे का मैटर आपसे पूछने के लिए रख लेते हैं...’

‘ अरे बंधू..जब इतना पढ़ लेते हो तो थोड़ा परिश्रम कर नीचे का डिटेल्स भी पढ़ लिया करो..’ गुरुजी ने मशविरा दिया.

‘ गुरूजी..इससे केवल टाईम ख़राब होता है...कई बार कोशिश की पर पल्ले कुछ नहीं पड़ा..लेकिन आप जब समझाते हैं तो सब कुछ अक्षरशः समझ आ जाता है..’

‘ अच्छा..पूछो..क्या पूछना है ? ‘

‘ गुरूजी..जब से नई सरकार बनी है, नये पी.एम.साहब धुंआधार विदेश दौरा कर रहे हैं..भूटान..नेपाल..ब्राजील..जापान..अमेरिका.. म्यामार.. आस्ट्रेलिया..फिजी..और अब फिर नेपाल..यह सिलसिला कब थमेगा ? ‘ गजोधर ने चिंता जाहिर की.

‘गजोधर..सिलसिला चले या थमें ..इससे तुम्हें क्या ? देश के प्रधान मंत्री हैं..वे जब जहाँ जी चाहे जा सकते है..’ गुरूजी ने कहा.

‘ नहीं गुरूजी मेरा मतलब था कि देश के भीतर अनेक समस्याएं हैं और वे ताबड़तोड़ दौरा कर रहे..सैर-सपाटा तो बाद में भी हो सकता है..पहले वो सब तो करे जिनका चुनावी दिनों में वादा किया था ..न कहीं महंगाई कम हो रही .. न विदेशों से काला धन आ रहा..न ही अच्छे दिन के कोई आसार दिख रहे ..अच्छे दिन तो केवल उनके ही दिखते हैं...’

‘ नहीं गजोधर...ऐसा नहीं कहते..तुम्हें याद नहीं..किस तरह छः-छः महीने वे पागलों की तरह रात-दिन भूख-प्यास तज चुनाव के दिनों रैली और सभाएं करते रहे..लगातार विमान में उड़ते रहे.. आदत छूटने में थोडा समय तो लगेगा भई ...और फिर थकान उतारने थोडा सैर-सपाटा कर ले तो क्या हर्ज है ?

‘ लेकिन गुरूजी..आपको लगता नहीं कि पी.एम.साहब कुछ ज्यादा ही सैर-सपाटा कर रहे ? इनके पहले भी तो कई पी.एम. हुए..उन्होंने कभी इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई.. नये तो छः महीने के कार्यकाल में पूरे एक महीने हवा में.. ( विदेश यात्रा में..) ‘

‘ अरे भई..तुम राजनीती नहीं समझोगे..उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार है..उन्हें किसी दल या घटक का कोई खतरा नहीं..वे महीनों विदेश घूम सकते हैं.. सालों घूम सकते हैं..’ गुरूजी ने समझाया.

‘ गुरूजी..पूर्ण बहुमत क्या होता है,मैं भी जानता हूँ..नेहरु,इंदिरा राजीवजी के पास भी तो स्पष्ट बहुमत की सरकारें थी..वे तो कभी इतना नहीं घूमे ? ‘ गजोधर ने ज्ञान बघारते कहा.

‘ हाँ गजोधर..ठीक कहते हो..मोरारजी भाई की भी सरकार ऐसी ही थी पर इन सब के दौर में ब्रिक्स,इब्सा,और पूर्व एशियाई सम्मलेन..शिखर सम्मलेन जैसे बहुस्तरीय अंतर्राष्ट्रीय मंच मौजूद नहीं थे..इसलिए इन सबको स्वदेश - यात्रा कर ही संतोष करना होता था..कभी-कभार ही इनका किसी रास्ट्राध्यक्ष की ताजपोशी या किसी पी.एम.- प्रेसीडेंट की मैय्यत में विदेश जाना होता था..’

‘ गुरूजी..इसके बावजूद भी इंदिरा,नेहरु ने काफी विदेश यात्राएँ की..इंदिरा जी ने तो लगभग दो सौ देशों की यात्राएं की थी ..’

‘ हाँ गजोधर..लेकिन लम्बे समय तक पी.एम. भी तो रही..इसलिए..’

‘ पर गुरूजी..नए पी.एम. जिस स्पीड से उड़ रहे हैं,उससे तो लगता है कि वे पांच साल में सारे पूर्व प्रधान मंत्रियों का रिकार्ड तोड़ देंगे..’

‘ वैसे गजोधर ..देखा जाए तो उनके सारे काम अभी “ रिकार्ड तोडू “ ही हैं ..चाय बेचने से पी.एम. बनने तक.. चुनाव-प्रचार से लेकर जीतने तक... विदेश-यात्राओं का रिकार्ड तो तोड़ ही रहे.. जहाँ बरसों से कोई भारतीय पी.एम. नहीं गए वहां-वहां जा रहे..28 साल बाद आस्ट्रलिया...33 साल बाद फिजी..ऐसा लगता है जैसे वे अटलस खोले बैठे हैं.. आज तक किसी पी.एम. ने गणतंत्र-दिवस में किसी अमेरिकन प्रेसीडेंट को आमंत्रित नहीं किया, वे कर रहे..ऐसा लगता है जब तक वे सारे रिकार्ड नहीं तोड़ेंगे, देश में नहीं बैठेंगे.. ’

‘ गुरूजी..गिनीस बुक वालों को खबर है कि नहीं ? ‘ गजोधर ने भोलेपन से पूछा.

‘ अरे भई.. 2012 से उनका नाम विधान सभा चुनाव में उनके भाषणों की थ्री-डी.रिकार्डिंग के लिए आलरेडी दर्ज है..’ गुरूजी ने बताया.

‘ गुरूजी..लेकिन ये सरासर गलत है कि खुद तो स्वक्छंद घूम-फिर रहे और देशवासियों पर एक से एक लगाम कस रहे..इतने नए-नए नियम कानून बना रहे कि आदमी पागल हो जाए..कहीं गैस सब्सिडी पर तो कहीं जन-धन पर..कुछ सरलीकरण भी हो रहे पर ऊंट के मुंह में जीरा जैसे..सरकारी कर्मचारियों को तो सांप ही सूँघ गया है..काम के घंटों और बंदिशों को देख कहने लगे हैं-अब सरकारी नौकरी में मजा नहीं...’

‘हाँ गजोधर..लेकिन फिर भी देश तो चल ही रहा है..पूर्व सरकार को दस साल झेले तो इन्हें दस महीने तो झेलो..’ गुरूजी बोले.

‘ इससे क्या होगा गुरूजी ? ‘ गजोधर ने भोलेपन से पूछा.

‘ होगा क्या ? फिर आदत पड़ जायेगी और तब तक दूसरे आम चुनाव का वक्त भी आ जाएगा..’ गुरूजी ने समझाया.

‘ फिर क्या होगा गुरूजी ? ‘

‘ अरे वही सब..जो अभी हो रहा है..कोई और सरकार काबिज हो जायेगी..’

‘ लेकिन रिकार्ड-तोड़ पी.एम. तो नहीं आयेंगे न ? ‘ गजोधर ने पूछा.

‘ हो सकता है कोई आ भी जाये-इनका रिकार्ड तोड़ने.. ‘

‘ तो साफ़ कहिये न..देश की तस्वीर नहीं बदलने वाली..’ गजोधर बोला.

‘ अरे हाँ भई..नहीं बदलने वाली...अब मुझे दाढ़ी बनाने दो..अपनी तस्वीर तो बदलने दो..जय राम जी की.’ गुरूजी ने थोड़े गुस्से से कहा.

गजोधर को समझ नहीं आया कि गुरूजी अचानक क्यों नाराज हो गए ? चुपचाप वह स्टूल से उठा और बड़े बेआबरू हो तेरे कूचे से निकले जैसे बाहर निकल गया.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

3 blogger-facebook:

  1. सामयिक सन्दर्भों में प्रभावित करती है ये रचना ,बधाई
    सुशील यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद सुशील...प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं

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