गुरुवार, 13 नवंबर 2014

प्रमोद यादव का हास्य - व्यंग्य -- बाल दिवस स्वर्ग में...

बाल-दिवस स्वर्ग में.../ प्रमोद यादव

‘ पापा...पापा..उठिए भी...कितना सोते हैं आप ? कई-कई दिन सोते आपको बोर नहीं लगता ? मैं तो तीन दिन में ही उब जाती हूँ..उठ जाती हूँ..’ स्वर्ग के भव्य भवन में आनंद से सोते पापा  को इंदु ने झिंझोड़ते कहा.

‘ ऊँ..ऊँ ऊँ..क्या बात है इंदु ? क्यों हल्ला मचा रही हो ? क्या फिर से चीन ने देश में हमला कर दिया ? इस बार तो उसे छोड़ेंगे नहीं...’ बिस्तर से आँखें मलते पापा ”इन्कलाब जिंदाबाद” के नारे की तरह उठ बैठे.
‘ अरे पापा..आप सो-सो के सठिया गए हैं..कहाँ तो वहां आप “ आराम हराम है ” का नारा देते थकते नहीं थे और यहाँ...यहाँ “बड़े बाप के बेटे हैं , जब से जन्मे लेटे हैं” के अंदाज में दिन-रात लेटे ही रहते हैं..’

‘ ऐसा है इंदु..यहाँ कुछ काम-धाम भी तो नहीं..वहां था तो बैठे-बिठाए और कुछ नहीं तो पुस्तक ही लिख लेता था- ‘ एन आटोबायोग्राफी’..’ ग्लिम्पसेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’.. ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ आदि-आदि..’
इंदु ने तुरंत बात काटते कहा- ‘ तो यहाँ -‘डिस्कवरी आफ हेवेन’ लिख लो न..किसने मना किया है ? कम से कम व्यस्त तो रहेंगे...दिमाग तो दुरुस्त रहेगा..’
‘ अरे भई..मेरे दिमाग को क्या हुआ है ? अच्छा भला तो है ..’
‘ अच्छा-भला होता पापा तो आप चीन की बात नहीं करते.. गया वो जमाना.. जरा नीचे झांककर देखिये.. नए पी.एम.भी आपकी तरह पड़ोसियों से मधुर सम्बन्ध रखने की कवायद में उनसे हाथ मिला रहे हैं..अभी-अभी चीनी प्रेसीडेंट यात्रा कर वापस लौटे हैं.. ’ इंदु बोली.

‘ अरे उनसे कहो..मैंने जो गलती की ,उसे न दोहराए..हिंदी-चीनी भाई-भाई न कभी थे न होंगे..! उन्हें फोन करो..फैक्स करो..’ पापा ने आदेश के लहजे में कहा.
‘ पापाजी..ये स्वर्ग है..आपका दिल्ली वाला आफिस नहीं..यहाँ सुविधा तो सब है पर आप उसका उपयोग नहीं कर सकते.. सब वर्जित है..सिवा देखने-सुनने और समझने के आप और कुछ नहीं कर सकते..न फोन न ईमेल न फैक्स न चैट..आप नीचे लोक की सारी बातें अक्षरशः फुल वाल्यूम में सुन सकते हैं..सब कुछ “लाइव” देख सकते हैं..समझ सकते हैं..पर इधर का एक शब्द भी उधर नहीं भेज सकते ..समझिये “वन वे” है सब कुछ.. बस..चुपचाप बैठे नीचे देखते रहो..और देखकर खुश होओ या फिर सिर धुनों.. ’ इंदु ने पापाजी को समझाया.

‘ अरे हाँ इंदु..मैं तो भूल ही गया था..कई-कई दिन सो जाओ तो ऐसा ही होता है..अच्छा बताओ..तुमने मुझे जगाया क्यों ? ‘ पापा ने पूछा.
‘ दरअसल पापाजी..परसों आपका “बर्थ डे “ है....बाल-दिवस..भारत के करोड़ों भतीजे इसे सेलिब्रेट करते हैं. इस दिन का इन्तजार करते हैं...इसलिए..’
‘ गुड..अच्छा याद दिलाया..इस दिन तो बच्चों को हम गुलाब बांटते हैं..चाचा जो ठहरे..हमें आज भी बच्चों से अपार प्यार है ..स्नेह है....इस बार चाहता हूँ कि नीचे जाकर भतीजों से रूबरू मिलूँ..क्या एक दिन के लिए हमें स्वर्ग से छुट्टी (मुक्ति ) मिल सकती है ? ‘ पापा ने इंदु को निहारते पूछा.

‘ पापाजी..छुट्टी तो मिल सकती है.. छुट्टी का प्रावधान है यहाँ..वी.आई.पीस को पचास साल में एक बार मनचाहे जगह जाने की अनुमति है..आपको पचास साल भी हो गए..पर वी.आई.पी. बनकर नहीं जा सकते बल्कि एक सामान्य नागरिक की हैसियत से जाना होगा..वैसे आप मेरी माने तो भारत न ही जाएँ तो ज्यादा अच्छा होगा..’ इंदु ने सलाह दी.

‘ अरे.. मेरे देश की धरती मुझे बुला रही है और तुम जाने से रोक रही हो..और वो भी मेरे जन्मदिन पर..बिना चाचा के भतीजों को बर्थ डे मनाते पचास साल बीत गए..देखूं तो सही बच्चो का प्यार.. मुहब्बत..जूनून का जज्बा क्या आज भी वही है जो उन दिनों हुआ करता था ?’

‘ पापा..फिर आप फ्लेशबेक में जा रहे हैं..पिछले दिनों आपके राष्य्रपति डा राधाकृष्णनजी का जन्मदिन 5 सितम्बर को था....शिक्षक-दिवस...बेचारे वो भी आपकी तरह यही सोच कर चले गए थे कि छात्रों व गुरुओं से रूबरू होंगे पर वे “बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले” जैसे लौट आये... बच्चो से..गुरुओं से रूबरू होने की साध धरी की धरी रह गई.. उन्होंने आपको बताया नहीं क्या ? ‘ 

‘नहीं इंदु..बहुत दिनों से उनसे भेंट ही नहीं हुई..क्या हुआ था उनके साथ ? ‘ पापा ने पूछा.
‘ क्या नहीं हुआ पूछो पापा..जन्मदिन तो उनका था पर केक काट रहे थे पी.एम.साहब..गुरुओं और छात्रो से रूबरू हो रहे थे पी.एम. साहब.. बच्चों से सवाल-जवाब का दौर चल रहा था. देश,दुनिया के विकास के चर्चे हो रहे थे और शिक्षकगण घबराये-घबराये से बगलें झाँक रहे थे.. भयभीत थे कि प्रसारण में कहीं  कुछ भी उल्टा-सुलटा हुआ कि गए काम से.. डा. साहब को पहली बार लगा कि वे किसी और के बर्थ डे में आ गए..वे उलटे पाँव लौट आये.. ’ इंदु ने बताया.

‘ अरे इंदु..हमारे साथ ऐसा नहीं होगा..हम पार्टी वाले जो ठहरे..हमारे जन्मदिन में भला वो क्यूँ बच्चों से रूबरू होंगे ? ‘
‘ पर पापा..वे तो आपका जन्मदिन मनाने पर तुले हैं..हाँ बल्कि मुझे तूल नहीं दे रहे..’ इंदु बोली.
‘ क्या मतलब ? ‘ पापा पूछे.
‘ मतलब ये कि मेरी पुण्यतिथि में सब दिग्गज आये..वे नहीं आये..कह दिए- हमें पार्टी का आमंत्रण नहीं मिला..जबकि उनके पहले के पी.एम. बिना आमंत्रण के आते रहे ..खैर छोडिये ..ये बताइये क्या आपने उन्हें अपने बर्थ डे में इनवाईट किया है? ‘
‘ नहीं तो...? ‘ पापा बोले.

‘ तो फिर इस बार बाल-दिवस मनाने वे क्यों इतने आतुर हैं ? उनके चलते हमारे लोगों को न बस मिल रही है न सम्मलेन के लिए स्थान..सब किंकर्तव्यमूढ़ हैं कि क्या करें ? सोच रहे कि  14 को मनाएं कि 15 को..या फिर 16-17 को.. आपके सारे नन्हे भतीजे तो अभी से इस नतीजे में पहुँच गए हैं कि बर्थ डे भले “चाचा” का हो पर पधारेंगे तो “दादा” ही.....गुरुजन फिर भयभीत हैं कि इस बार न जाने क्या होगा ? ‘

‘ अरे इंदु..मेरे देश में ये हो क्या रहा है ?..मैं तो हैरान हूँ सब सुनकर..मुझे नहीं मनाना वहां  अपना बर्थ डे.. नहीं जाना मुझे भारत.. छुट्टी एप्लाई मत करो....इस बार बाल-दिवस स्वर्ग में मनाऊँगा ....रूबरू होने के चक्कर में आबरू नहीं गवाऊंगा ... जाओ.. सबको सूचित कर दो... देखता हूँ..गार्डन में कितने गुलाब खिले हैं.. ’ और उठते-उठते हड़बड़ी के चलते वे पलंग से नीचे  गिर पड़े..

नींद खुली तो मैं पलंग के नीचे पड़ा था.. आसपास न इंदु थी न पापाजी उर्फ़ चाचाजी..कुछ था तो बस मैं और मेरी तनहाई...

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                                             प्रमोद यादव
                                     गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़   

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