बुधवार, 19 नवंबर 2014

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का हास्य-व्यंग्य - उपाधि आयी व्याधि लायी

उपाधि आयी व्याधि लायी

     चाचा दिल्लगी दास 'वैश्विक उदारिकरण के परिप्रेक्ष्य में भैंस के गोबर में रोजगार की संभावित संभावनाएं' विषय पर एक लम्बा चौड़ा लेख खासे तल्लीन हो कर बड़े धैर्र्य ही के साथ पढ़ रहे थे। पूरा लेख पढ़ने के उपरांत जब लेखक का नाम पढ़ा तो उन्होंने अपने सीने पर जोर से एक दुहत्थड़ मारा और कराहते हुए बोले कि ,काश मैं भी एक 'डॉक्टर' होता तो कम से कम कहीं छपने में तो बड़ी सहूलियत होती।भतीजे मेरा कहना मानो इस 'डॉक्टर' नाम की दुम के कई फायदे हैं। कुछ खुर्रांट किश्म संपादक तो किसी का लिखा हुआ कभी पढ़ते ही नहीं सिर्फ लेखक की लैटर पेड ही देखते है और छाप देते है शायद यह सोच कर कि आखिर है तो वो 'डॉक्टर'।इसने 'डॉक्टर' की उपाधि अगर कुछ शोध कर के ली है तब विद्वान् नहीं तो अगला मेहनती तो बेशक है और यदि उपाधि कहीं से जुगाड़ी भी है तो उसके पास और चाहे कुछ भी न सही पर तिकड़म बाजी का हूनरमन्द तो जरूर हैं।

      चाचा ने कहा कि मैंने देखा है कि अक्सर बड़े संपादकों के यहां तो दोनों ही प्रकार की उपाधियां समान महत्व की मानी जाती रही है।इसे संपादकों की लापरवाही समझो या अनुकम्पा कि वे इस 'डॉक्टर' के दुमछल्ले लगे लोगों को बेहिचक यह समझ कर छाप देते होंगे कि अगले ने डॉक्टरेट किया है तो लगातार लिखते रहने ले लिए ही तो किया है,जब डॉक्टरेट कर ही लिया है तो लिखते रहना अब उसकी मजबूरी है,इन डॉक्टर साहब ने कुछ न कुछ तो लिखा ही होगा और जो रोज रोज इतने बड़े बड़े लेख लिखता है तो फिर उसके लेखों में सारगर्भितता,सार्थकता व स्तरीयता जैसी कोई चीज होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।जो संपादक की कुर्सी पर जमा है इतना तो जानता ही होगा यह तो फिर भी आखिर एक लेखक ही तो है यदि कोई भैस भी अगर ज्यादा गोबर देती है तो वो भी पूर्णतया अनुपयोगी होता है 'एकदम पतला' न तो आँगन लीपने के काम का और ना ही उपले थापने में प्रयुक्त होने लायक। 

    कुछ रुक कर चाचा ने फिर बोलना शुरू किया,बोले कि मैं निहायत ही बेवकूफ था, अब तो मुझे भी बड़ा अफ़सोस हो रहा है कि मैंने बड़ी भारी गलती की जो पहले तो इस लेख का उन्वान पढ़ा,फिर पूरा लेख और इन सब के बाद में लेखक का नाम,जिनको मुझे व्युत्क्रम से पढ़ना चाहिए था। वैसे भी जो जरा घाघ किस्म के पाठक होते हैं वो तो सबसे पहले लेखक का नाम ही पढ़ते हैं,लिखने वाला अगर कोई डॉक्टर,प्रोफेसर,व्याख्याता, पूर्व या वर्तमान प्राचार्य,उप प्राचार्य आदि आदि कुछ हुआ तो उसकी गद्य रचना को तो क्या पद्य रचना तक को नहीं पढ़ते,क्यों कि उनको उनका हासिल तजुर्बा आगाह कर देता हैं कि रहने दे, आगे चल इसको रगड़ने वाला भी कोई दुमछल्ला धारक ही है,मालूम है क्या लिखा होगा ? क्यों अपना वक्त जाया करते हो।जिस तरह से चिकित्सा के क्षेत्र में कई प्रकार के डॉक्टर होते हैं जैसे कि बाकायदा एम.बी.बी.एस की डिग्री होल्डर, आर.एम.पी. का सर्टिफिकेट होल्डर,किसी कागजी विश्वविद्यालय का कागज फ्रेम में जड़वाए डॉक्टर और जो अपने अपने ढंग से मरीजों का इलाज कर रहें हैं ठीक वैसे ही साहित्य जगत में भी रुग्ण साहित्य का उपचार करने वाले ऐसी ही अनेक किस्मों के डॉक्टर बहुतायत से मौजूद हैं और साहित्य के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं ,जबकि इनको सहूर नहीं है साहित्यिक कम्पाउण्डर के जितना भी।

चाचा जाते जाते बोले कि भतीजे इनके रहते तमाम नॉन पी.एच.डी.होल्डर नॉन डी.लिट् होल्डर साहित्यकर साफ बच जाते हैं। अगर कोई इनके लेखन में कुछ मीन मेख निकलता है तो ये तपाक से कह देते हैं,बड़ा आया साहित्य में मीन मेख निकलने वाला,यदि साहित्य के बारे में इतना ही जानते हो तो फिर उनको छेड़ो जो डॉक्ट्रेट का तमगा लगाये फिर रहें हैं और साहित्य के नाम से अल्लम,बल्लम रगड़ रहे हैं। और अगर किसी गलती से इन साहित्य के कम्पाउण्डरों की कोई रचना जरा सी ही ठीक ठाक निकल गई तो ये बड़े फख्र से कहेंगे कि ,देखो मैंने कितनी अच्छी रचना लिखी है, डॉक्टर न होते हुए भी।अगर मुझे भी कहीं से ये 'डॉक्टर' का दुम छल्ला मिल जाए तो फिर देखो मेरी लेखनी के जलवे।          

                                          पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

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