गुरुवार, 27 नवंबर 2014

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - इतनी जल्दी भी क्या है?

हिंदुस्तान में हर बच्चे को बचपन में खरगोश और कछुए की कहानी सुनाई जाती है। जिसमें खरगोश और कछुए के बीच रेस होती है। खरगोश जल्दी-जल्दी फुर्ती से चलता है और अंततः हार जाता है। तथा कछुआ धीरे-धीरे रेंगते हुए चलता है और अंततः विजयी हो जाता है। हिंदुस्तानियों के मन-मस्तिष्क में यह कहानी बसी हुई है। तथा इसके असर से हिंदुस्तानियों की सारी फुर्ती गायब हो गई है। हर कोई हर काम में यही सोचता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’ ?

यदि उपरोक्त कहानी का कोई दोष नहीं है तो हिंदुस्तानियों के डीएनए में ही जरूर कोई न कोई ऐसा दोष है जो हमेशा इनके मष्तिष्क को संदेश देता रहता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’? इसलिए ही यहाँ के लोग नम्बर एक के कामचोर और आलसी होते हैं। ये या तो काम करते ही नहीं या फिर मस्ती से इतना धीरे-धीरे करते हैं कि लगता है कुछ हो ही नहीं रहा है।

सुबह सोकर उठने के लिए पत्नी दस बार भी कहे तो लोग यही कहते हैं कि इतनी जल्दी भी क्या है ? अभी तो पाँच ही बजे हैं। जब तक आठ न बज जाय अधिकांश हिंदुस्तानियों की नीद नहीं जाती। जो लोग सुबह समय पर उठ भी नहीं सकते वे कोई काम समय पर कैसे करेंगे ? लेकिन सुबह जल्दी उठने वाले समय पर सारे काम करेंगे, इसकी कोई गारंटी थोड़े है। फर्क तो हिंदुस्तानी होने से पड़ता है।

हिंदुस्तानी विद्यार्थी सोचता रहता है कि पढ़ाई करने की इतनी जल्दी भी क्या है? जब परीक्षा आएगी तो पढ़ लेंगे। अध्यापक सोचता है कि अभी तो पूरा सत्र पड़ा है। पढ़ा देंगे, इतनी जल्दी भी क्या है ? डॉक्टर कहता है कि अरे भाई अभी तो केवल चार विजिट किए हो। ठीक हो जाएगा, इतनी जल्दी भी क्या है ? परेशान होने की जरूरत नहीं है। वकील लोग तारीख पर तारीख दिलाने को सोचते रहते हैं। मुवक्किल को समझाते रहते हैं कि इतनी जल्दी भी क्या है ? अमुक का चालीस साल का केस अभी कल फायनल हुआ है।

इसी तरह जब किसी को किसी नोटिस का जबाब देना होता है तो वह सोचता हैं कि दे देंगे अभी दस दिन शेष है , अभी पाँच दिन शेष है और अभी कम से कम दो दिन तो शेष है ही, इतनी जल्दी भी क्या है ? और उसके बाद समय सीमा बढ़ाने की अपील लगा देते हैं। यह हिंदुस्तानियों की दिनचर्या में शामिल है।

इसी तरह आधुनिक प्रेमिका अगर भूल से कभी शादी का नाम ले भी लेती है तो शातिर प्रेमी बोलता है कि सब कुछ वैसा ही तो है फिर इतनी जल्दी भी क्या है ? इसी तरह से हमारे नेता भी यही सोचते रहते हैं कि अभी चुनाव हुए दो साल ही हुए हैं। अभी तीन साल शेष हैं तो इतनी जल्दी भी क्या है ? यही सोचते-सोचते जब आधा साल शेष रह जाता है तो साढ़े चार साल का बाकी काम छे महीने में कैसे हो ? फिर आनन-फानन में थोड़ा-बहुत हो पाता है और फिर चुनाव ही नजर आता है।

यदि विश्व के सभी देशों में आलसियों का पता लगाने का अभियान चलाया जाय और आलसियों की संख्या के आधार पर सभी देशों की सूची बनाया जाय तो हिंदुस्तान का सबसे बड़ा नाम हो जाएगा। क्योंकि बड़े से बड़े यानी अजगर जैसे आलसी यहाँ पाए जाते हैं। यह यानी आलसी होने की विशेषता हिंदुस्तानियों को बड़ा से बड़ा पदक दिला सकती है।

कबीरदास जी ने हिंदुस्तानियों के इस विशेषता को देखकर ही कहा था-

काल्हि करे सो आज कर , आज करे सो अब।

पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब’।।

यह दोहा यहाँ के लोगों को रास नहीं आया। बिल्कुल ही नहीं जमा। क्योंकि इसमें केवल काम करने को ही नहीं कहा गया था बल्कि जल्दी अर्थात कल का काम आज ही करने की सलाह दी गई थी। और हिंदुस्तानी सोचता है कि आखिर इतनी जल्दी भी क्या है ? न हम भागे जाते हैं और न काम। कई तो यहाँ तक कहते हैं कि दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास काम ही नहीं है। और यदि हमारे पास काम है तो हम काम करके बेकाम क्यों बनें ? पता नहीं कल हो न हो। इसलिए धीरे-धीरे काम करना चाहिए। काम आता रहे, इकट्ठा होते रहे तो लोगों को भी पता चलता है कि इसके पास काम है। और बॉस यह कभी नहीं सोचता कि यह बेकाम है तथा दूसरा काम जल्दी देने के लिए सो बार सोचता है।

एक बार उपरोक्त दोहा सुनाकर एक आलसी से पूछा गया भाई पूरा का पूरा दिन ऐसे बात और मुलाकात में बिता देते हो कुछ करते ही नहीं हो। आलसी बोला बाबा डरा रहा है। प्रलय का डर दिखा रहा है। लेकिन हम इतना भी मूर्ख नहीं हैं, जब पल में प्रलय होनी है तो कुछ करने की जरूरत ही कहाँ है ? कई आलसी खुश थे कि २०१२ में प्रलय हो जायेगी लेकिन यह भी वैसे ही चला गया।

हिंदुस्तानी आलसियों को उपरोक्त दोहे से कहीं न कहीं शियाकत रहती थी तो सबने इसका इंतजाम करके अपने मनोकूल एक छंद कुछ इस प्रकार तैयार किया-

आज करे सो काल्हि कर, काल्हि करे सो परसों।

पल में प्रलय होयगी, मौज करो न तरसो।।

कबीरदास जी को ही नहीं हिंदुस्तानियों ने सभी संतो, महात्माओं, पूर्बजों और उनके उपदेशों को किनारे कर दिया। और खुद छंद रचना करने लगे, उपदेश देने लगे। अपनी-अपनी कथा कहने लगे। जन सभाएं करने लगे। परिणाम क्या हुआ रचनाकारों की बाढ़ आ गई। उपदेशक यहाँ-वहाँ घूमने लगे, पकड़-पकड़ कर उपदेश देने लगे। कथा कहने वाले चप्पे-चप्पे पर जम गए। जन सभाएं करने वाले लोग जो लोगों को बरगलाने में सफल हुए वे नेता कहलाये और देश की वागडोर हाथ में ले ली। सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया।

रचनाओं से रचना गायब हो गई, उपदेश में से सदुपदेश चला गया। कथा में से कथा चली गई। अपनी-अपनी व्यथा गाने लगे। आज का काम कल होने लगा, कल का परसों और परसों का वर्षों में होने लगा। फिर क्या था देर से ढेर ने जन्म ले लिया। दफ्तरों में फाइलों का ढेर, न्यायालयों में मुकदमों का ढेर यानी जहाँ देखो वही ढेर कारण एक ही- देर।

साठ साल पहले वाली समस्याएँ आज भी मुँह फैलाए खड़ी हैं। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, बिजली और पानी की समस्याएँ अब भी हटने का नाम नहीं ले रहीं हैं। इनको भी हिंदुस्तान से और हिंदुस्तान के आलसियों से मोह हो गया है और इन्हें भी लगने लगा है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’ ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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