शनिवार, 8 नवंबर 2014

सपना मांगलिक का व्यंग्य -- नॉन बटर सेन्स

नॉन बटर सेन्स

पिछले कई वर्षों से या यूँ कहें कि हमने तो पैदा होते ही साहित्य साधना का दृढ़ संकल्प ले लिया था। दूध के दांत टूटते ही पहली कविता भी लिख डाली। और लिखते लिखते अपना यह हाल भी कर लिया कि लोग हमसे सहानभूतिपूर्ण तरीके से पूछते हैं कि -क्या हाल बना रक्खा है ? साहित्य छोड़ क्यूँ नहीं देती?.मगर कहाँ जी यह तो अफीम से भी बुरी लत है एक बार लग जाए तो मरने के बाद ही छूटती है। खैर इतनी मगज मारी के बावजूद भी हमें कोई राजकीय या सरकारी सम्मान से अब तलक नहीं नवाजा गया। जब भी किसी प्रशासकीय अधिकारी या बड़े नेता के दर्शन होते हैं तो उनकी शाबाशियों से आत्मा तो भर आती है लेकिन जेब अब तक नहीं भरी। हमसे कम योग्यता बाले आये दिन जुगाड़ लगाकर हजारों,लाखों के सम्मान पा रहे हैं मीडिया में तसवीरें भेज चेहरे चमकाके सेलिब्रिटी बन चुके हैं मगर अपने राम तो जहाँ थे ,जैसे थे वैसे ही रहे गुमनाम और नाकाम। जब हमने ऐसे ही एक सेलिब्रिटी से इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने खींसे निपोरते हुए कहा -मेडम जी इसकी वजह सिर्फ एक है और वह है आपका नॉन बटर सेन्स "उनका नॉन बटर सेन्स का जुमला सुनकर हम कुर्सी से मानो उछल पड़े। क्योंकि हमने नॉन सेन्स तो सुना था मगर नॉन बटर सेन्स पहली दफा सुन रहे थे। इस अनोखे शव्द की परिभाषा जानने और समझने को मन मयूर बैचेन हो उठा। हम उन सेलिब्रिटी महोदय से विनम्र बिनती करने लगे कि-कृपया हमें यह नॉन बटर सेन्स का फंडा सविस्तार समझाएं।

सेलिब्रिटी महोदय हमारी विनती सुन फूल कर कुप्पा हो गये उनका छत्तीस इंच का सीना चौड़कर बहत्तर इंच का हो गया। और वह देने लगे हमें अपनी चालबाजी प्लस धोखेबाजी प्लस लाफ्देबजी का अचूक मन्त्र। आराम की मुद्रा में वह एक उपदेशक की भांति आलथी-पालथी मारकर सोफे पर विराजमान हुए। उस समय उनकी मुख मुद्रा और भाव भंगिमाएं बोधिवृक्ष के चबूतरे पर बैठे गौतम बुद्ध कि तरह लग रही थी। एक पल को तो हम चौंक गए कि अंगुली काटने वाला अंगुषटक डाकू गौतम बुद्ध पार्ट -२ कैसे बन गया। खैर हमने अपनी एकाग्रता उन सेलिब्रिटी साहित्यकार के नॉन बटर सेन्स प्रवचन पर टिका दी। गला खंखारते हुए वे बोले "देखिये सपना जी नॉन बटर सेन्स से पहले आप बटर सेन्स को जान लीजिये "फिर उन्होंने काव्य में बटर सेन्स को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया –

अंधे से अन्धो कहो

अन्धो जाएगो रूठ

हौले धीरे पूछ लेयो

भैया तेरी काई से गयी है फूट

इसका मतलब है मेडम जी खरी खरी भूलकर मधुर वचनों में मतलब की बात करना या मतलब साधना। इसे ही समझदार और गुणी जन बटर सेन्स कहते हैं। हम समझ गए कि देसी भाषा में मक्खन लगाना ही आधुनिक समाज का बटर सेन्स है। विदेशी भाषा में तो भिन्डी भी लेडी की फिंगर का दर्जा पा जाती है। थोड़ी देर उन्होंने जीभ को आराम दिया और फिर बोलना शुरू किया -मेडम जी अब नॉन बटर सेन्स समझो -"आपका अपने काम से काम रखना बड़े साहित्यकारों,नेताओं संस्था अध्यक्षों से दूरी रखना यह सब आपके नॉन बटर सेन्स को दर्शाता है जो करियर के लिए अत्यंत घातक है। "हमने उनकी बात बीच में ही काटते हुए फ़रमाया-मगर यह तो एक अच्छे और सच्चे इंसान की पहचान है "

इसपर सेलिब्रिटी महोदय आक्रोशित स्वर में प्रवचन देने लगे -"सही गलत का मीटर आप नहीं समाज तय करता है। और आप समाज नहीं हैं एक अकेला व्यक्ति समाज के नियम कानून नहीं बना सकता। जो चीज़ मेजोरिटी तय करती है वाही माइनोरिटी को मानना पड़ता है। और ठीक वैसा ही आचरण करना होता है."

हम बोले-भाईसाहब लेकिन हम तो समाज का हिस्सा हैं फिर हमें आप जबरन माइनोरिटी में कैसे डाल रहे हैं ?अब हमारी

सवाल पर सवाल करने की आदत पर सेलिब्रिटी महोदय झल्लाते हुए बोले-"आपके जहाँ का तहां रहने कि वजह ज्यादा दिमाग चलाना है। फिर नसीहत देते हुए बोले "समझदार महिलाओं की तरह कान खुले और जुबान बंद रखो सफलता आपके कदम चूमेगी "फिर उन्होंने कुछ सफल महिलाओं के नाम गिनाते हुए प्रश्न पूछा -तुम्हें पता है यह महिलाएं सफल कैसे बनी ?हमने शतुरमुर्ग की तरह ना में अपनी गर्दन हिलाई। सेलिब्रिटी ने अब कमीनेपन के अंदाज में मुस्कुराते हुए अपना ज्ञान बघारना शुरू किया -क्योंकि यह सब महिलाएं बटर सेन्स का इस्तेमाल करती हैं। बड़े बड़े साहित्यकारों को गाहे बगाहे गिफ्ट भिजवाना ,त्योहारों पर शुभकामना देने धड़ल्ले से उनके घर पहुँच जाना ,फिर अपनी घरेलु समस्याओं का रोना रोकर अपने नाज और अदाओं से पुरुष नाम के जीव को जाल में फ़साना और अपना लक्ष्य साधना यानि बड़े पुरुस्कार झटकना। "अब वह हमें लगभग डपटते हुए बोले-लेकिन आप तो किसी को घास डालेंगी नहीं मेडम जी पुरुष प्रधान समाज में अपनी अलग जगह बनाना एक टेढ़ी खीर है यह टेढ़ी खीर सीधी ऊँगली से खाने वाला जीवन भर भूख भूख चिल्लाता रहता है । लेकिन खीर प्राप्त नहीं कर पाता. मैडम जी यह जमाना ऐडा बनकर पेड़ा खाने वालों का है शराफत का ढोल पीटने वालों का नहीं। हमने अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए उनसे कहा कि –आत्मा को मारकर सफलता प्राप्त करना कहाँ तक उचित है। और क्या यह सफलता खरी सफलता जैसा आनंद प्रदान कर सकती है ?इस बात पर थोड़ा सकपकाए मगर फिर संभलकर बोले “क्यों नहीं सफलता वह नशा है जो हर हाल में आनंद ही प्रदान करता है. हर आदमी नाम और दाम की इच्छा रखता है। दूसरों से अलग और प्रसिद्ध दिखने कि चाह भला किसे नहीं होती ?और जो साधक इसे पाने के लिए तन ,मन धन अर्पण कर देता है सफलता उसके कदम चूमती है। हम उनके तन,मन धन का अर्थ समझने में कोई तकलीफ नहीं हुई और अब तो नॉन बटर सेन्स एवं बटर सेन्स का कांसेप्ट भी क्लियर हो चुका था। साहित्यकार महोदय अपना उपदेश समाप्त कर प्रस्थान कि तैयारी में थे मगर जाते जाते रोकेट फेंकना नहीं भूले-मेडम जी सही गलत ,धर्म अधर्म की चिंता मूर्ख करते हैं याद रखो हमाम में सब वस्त्र विहीन होते हैं। ”

 

साहित्यकार

सपना मांगलिक

आगरा

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