सोमवार, 24 नवंबर 2014

भूपेन्द्र मिश्रा की ग़ज़लें : भाग –२

"भूपेन्द्र मिश्रा की ग़ज़लें" भाग –२

 

भाग 1 यहाँ पढ़ें : -
http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_39.html


औरों की नहीं है , ये सूफी की ग़ज़ल है।

बादल की कड़क इसमें , बिजली की तड़प है।।

मेरे तार -तार दिल की आवाज ग़ज़ल है।

मेरी आन ,मेरी शान , मेरी जान ग़ज़ल है।।

clip_image002

प्रोफेसर भूपेन्द्र मिश्रा “सूफी”

कवि - परिचय

जन्म - विजयादशमी १९३९ को मुजफ्फरपुर जिला के मानपुरा ग्राम में। पिता का नाम स्वर्गीय रामदेव मिश्रा तथा माता का नाम स्वर्गीया रामपरी देवी

बाल्य परिवेश -शिक्षक परिवार एवं ग्रामीण परिवेश में पालन-पोषण। प्रारंभिक शिक्षा - दीक्षा राजकीय बुनियादी विद्यालय , बखरा में संपन्न एवं माध्यमिक शिक्षा मारवारी हाई स्कूल , मुज़फ्फरपुर में।

उच्च शिक्षा- लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर से इन्टर (कला ), अर्थशास्त्र में स्नातक (प्रतिष्ठा ) एवं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर।

ब्यवसाय - १९६२ से १९८० तक श्री राधा कृष्णा गोयनका महाविद्यालय , सीतामढ़ी में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक। १९८० से बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के श्री राघव प्रसाद सिंह महाविद्यालय , जैन्तपुर में अर्थशास्त्र के विश्वविधालय प्राध्यापक के पद पर कार्यरत। वर्ष १९९५ से प्राचार्य बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के श्री राघव प्रसाद सिंह महाविद्यालय , जैन्तपुर में। सन २००० में सेवानिवृत।

साहित्यिक अभिरुचि - बाल्यकाल से ही साहित्यिक विधाओ विशेष कर काव्य रचना में गहरी अभिरुचि , अनेक पत्र- पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।

अन्य महत्वपूर्ण क्रिया कलाप - समाज सेवा में गहरी दिलचस्पी , मार्क्सवाद के ख्यातिप्राप्त समालोचक , बाद में जीवन के अध्यात्मिक पक्ष की ओर उन्मुख।

जय जीव दर्शन के प्रतिपादक एवं जय जीव संस्थान के संस्थापक।

अन्य रचनायें - "तुम्हारे लिए " (काव्य संग्रह ), बहार -ए -गजल (गजलों का अनूठा संग्रह ), स्वान सांग (हंस गीत ), साम्या (प्रबंध काव्य ) , "दिल में बस आप हैं ", आदि।

जय जीव- दार्शनिक विचारों से सम्बंधित निबंध संग्रह।

 

(११)

दिल बेकरार क्यों है ?

ये इंतजार क्यों है ?

मालूम हैं मुझे कि आना नहीँ तुम्हें है,

फिर भी समझ न आता वादे हजार क्यूँ है

मुझे याद मत दिलाओ बीते हुए दिनों की,

दिल हैं बुझा- बुझा सा, फिर ये बहार क्यूँ है ?

इकरार भी बहुत था, इजहार भी बहुत था,

जाहिर भले नही़ हो पर प्यार वो बहुत था

clip_image006

उस दिन तो हम मिले थे ,

इनकार आज क्यों है ?

दिल बेकरार क्यों है ?

ये इंतजार क्यों है ?

(१२)

तेरी महफिल में बैठा है इसी अन्दाज में ‘सूफ़ी’,

नजर तेरी हो मुझ पे तो मेरी तकदीर बन जाए ।

न मिल सकता कभी है आदमी को आदमी से कुछ,

नजर उसकी जो हो जाए तो रे क्या – क्या न मिल जाए ।

उसी की रौशनी से तो यहाँ हर बात रौशन है ,

करिश्मा क्या न हो जाए अगर वो नूर मिल जाए ।

इसी के वास्ते उसको ये ‘सूफी’ प्यार करता है ,

ये दुनिया क्या न हो जाए नजर उसकी जो हो जाए।

clip_image008

(१३)

आ चुका हुँ तंग इस बदबू भरे माहौल से ,

ला दो जरा कही से खुशबू गुलाब की ,

clip_image010

‘सूफ़ी’ गुलाब है तेरे बागे – बहिश्त का ,

जिसे पाया न हँस- हँस के ,उसे रो –रो के पाया है ।

clip_image012

(१४)

न बदली कभी है, न बदलेगी दुनिया,

जहाँ थी , वहीं आज भी है ये दुनिया।

न मेरी , न तेरी किसी की न दुनिया,

ये दुनिया है सूफी, रहेगी ये दुनिया ।

वो कहते थे कि हम बदल देंगे दुनिया,

पर बदल गए वही जो बदलते थे दुनिया ।

काहे को तू ने बनायी थी दुनिया

जरा आ के देखो कि कैसी है दुनिया।

इधऱ जलजला है , उधर है कयामत,

किधर खो गई मेरे ख्वाबों की दुनिया।

clip_image014

(१५)

है बहुतों और लेकिन उसके जैसा कौन है ?

फीकी है सारी रौशनी उस रौशनी के सामने,

clip_image016

ऐ ; शमा महफ़िल की तेरी लौ न बुझ पाए कभी,

ताकि हमें मिलती रहे हरदम तुम्हारी रौशनी।

clip_image018

(१६)

छोड़िये भी बात मेरी ,

मैं तो हूँ बदनाम ही ,

clip_image020

पर मचल गए आप भी

जलवा –ए-शाकी देखकर,

clip_image022 

फर्क इतना है कि मैं ,

पीता सभी के सामने ,

और डरते आप है ,

पाबन्दियों को देखकर।

clip_image026 

(१७)

देख ली दुनिया की रंगत ,

हर हकीकत देख ली ,

तौबा तुझे है ऐ खुदा,

तेरी खुदाई देख ली ।

clip_image030

क्या न देखा ? क्या न समझा ?

असलियत सब देख ली ;

आदमी से आदमियत ,

की जुदाई देख ली ।

 clip_image034

देख ली दुनिया की रंगत ,

हर हकीकत देख ली।

(१८)

था हमें जिन पर भरोसा ,

सब निकल गये बेवफा।

अब समझ आता नहीँ,

किस पर भरोसा हम करें।

clip_image036

ये रहें या वो रहे,

कुछ फर्क भी पड़ता है क्या ?

असलियत तो बस यही कि ,

हम कहीँ के ना रहे ।

किस तरह लूटा हमें है ,

इन ठगों ने क्या कहे ?

कुछ समझ आता नहीँ ,

इनके लिये हम क्या करें?

clip_image038

(१९)

काजल की कोठरी है ,

अन्दर न जाइये।

clip_image040

नाजुक बहुत समय है ,

खुद को बचाइये।

clip_image042

क्या किजीयेगा आखिर,

इतना बटोर कर।

आए थे जैसे खाली,

वैसे ही जाइयेगा।

बस एक है गुजारिश,

बलमा जी आपसे।

इस दिल को छोड़ करके ,

दिल्ली न जाइये।

(२०)

दिल्ली का नशा अब तो सब पे सवार है,

उतरेगा ये नशा भी जल्दी ही देख लेना।

तूफान उठ रहा है रहना जरा सँभल के ,

हर दल बनेगा दलदल, जल्दी ही देख लेना।

जो आग लग चुकी है , सबको जलाएगी ही ,

कोई नही बचेगा जल्दी ही देख लेना ।

दल्लाल, दिल्ली, दौलत, दल कुछ नहीं रहेंगे,

 

आयेगा वक्त वो भी जल्दी ही देख लेना।

ये मुल्क पड़ गया है दौलत के फेर में,

आयेगा याद ‘सूफी’ जल्दी ही देख लेना।

(२१)

clip_image046

हस्ती मिटा दे हिन्द की ,

ऐसी कोई हस्ती नहीं।

आजमाना हो जिसे ,

वो आजमा कर देख लें ।

हम न वो किश्ती कि,

clip_image048

जो डर जाएगें तूफान से ,

देखे बहुत तूफान है,

कुछ और देखेंगे अभी ।

क्या नहीं थे , क्या नहीं है ?

और क्या होंगे नहीं ?

एक थे हम एक है हम,

 

' रहेंगे एक ही ।

! जहाँ वालो सुनो ,

आवाज हिंदुस्तान की ।

मर मिटेंगे हम भले,

पर झुक नहीं सकते कभी ।

clip_image052

 
(२२)

ये नहीं कहना कभी की ,

मर चुकी है शायरी।

दिल में जब तक दर्द है,

जिन्दा रहेगी शायरी ।

जान लो फिरकापरस्तों,

कह रही है शायरी ।

तोड़ा सियासत ने जिसे ,

जोड़ेगी उसको शायरी ।

बात क्या है , बात यह ,

कहते रहे सारे अदब।

बात क्या हो, बात

यह कहती रही है शायरी ।

वो और है जो तौलते

हर चीज को दिमाग से ,

सोच कर शायर कभी

करता नहीं है शायरी ।

हर कोई कुछ छोड़

जाता है ज़माने के लिए,

छोड़े जाता सूफी है ,

दुनिया की खातिर शायरी।

जब कभी रोया है 'सूफी'

दर्दे-ए -दुनिया देखकर,

आँसुओ की राह से

गुजरी है तब तब शायरी।

clip_image056

नाज दौलत पर उन्हें है ,

नाज ताकत पर इन्हें,

पर नाजे सूफी तो रही

हरदम है उसकी शायरी।

 

(२३)

जो जख्म मुल्क के थे,

नासूर बन गए

आता नहीं समझ में,

हम क्या दवा करे ?

हल ढूंढने की जिनसे,

हमको उम्मीद थी

 

वे सब तबीब आज

खुद बीमार बन गए

सोचा तो था यही की

हल होगा हर सवाल

पर जो जवाब देते ,

वे सवाल बन गए

 

ढूंढा तो है बहुत पर,

मिलती नहीं मशाल

जो थे मशाल थामे,

वे काल बन गए

'सूफी ' न कर तू चिंता,

अब ऐसे मुल्क की

हम देखते ही देखते

कंगाल बन गए

 

(२४)

दूर रहकर भी तुम्हारे पास हूँ,

हर मुसीबत में तुम्हारे साथ हूँ

हर कली मसली गयी जो रात में,

 

हर फूल जो कुचला गया जो राह में ,

clip_image072 

मैं उसी के दर्द की आवाज हूँ ,

हर बात कहने के लिए आज़ाद हूँ

जिस्म ही सब कुछ नहीं,

यह रूह भी कोई चीज है,

 

आँसमा सब कुछ नहीं ,

धरती भी कोई चीज है

जो तरस कर रह गए दो जून रोटी के लिए,

मैं उन्हीं अभिसप्त लोगों की नयी ललकार हूँ

clip_image080 

दूर रहकर भी तुम्हारे पास हूँ,

हर मुसीबत में तुम्हारे साथ हूँ

(२५)

मिलेगा क्या तुझे जालिम मुझे ऐसे रुलाने से ,

न दुनिया है बदल सकती महज आँसू बहाने से,

न भारत बन कभी सकता हवाले औ' घोटाले से,

यहाँ बातें बदलती है नया करतब दिखाने से

अगर मिल जाये कुछ तुमको तो मेरी जान भी ले लो ,

पसीना भी हमारा लो लहू तक भी मेरा ले लो,

मगर इतनी गुजारिश है कि भ्रष्टाचार अब छोडो ,

ये नंबर दो कमाई की समूची बात अब छोडो

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------