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कुलदीप ठाकुर की कविताएँ

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कुलदीप ठाकुर   जन्म तिथि- 4 सितंबर 1984 शिक्षा- एम.ए. प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित सम्प्रति- हिमाचल सरकार के महिला...

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कुलदीप ठाकुर
 

जन्म तिथि- 4 सितंबर 1984
शिक्षा- एम.ए.
प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्प्रति- हिमाचल सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत 


विशेष- 100 प्रतिशत दृष्टिहीन, संगीत में विशारद


पता: गाँव बानसा [मचोदी], तहसील रोहड़ू जिला शिमला
ई-मेल- kuldeepsingpinku@gmail.com


प्यार कभी मरता नहीं है।
प्यार कभी मरता नहीं, जीवित रहता है, मरने के बाद भी
प्यार तन से नहीं होता, प्रेम प्यास है आत्मा की।
शायद इस दुखयारी की, आस्था नहीं है भगवान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
वृक्ष के नीचे पूजा करके, दीपक वहाँ जलाती है,
फिर नैनों के जल से उस दीपक को बुझाती है,
जाते हुए कुछ सूखे फूल, बिखेरती उस स्थान में।
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
उस के जाने के बाद वहां कोई, रोता हुआ आता है,
उन सूखे हुए फूलों  को, सीने से लगाता है।
फिर बुझा हुआ दीपक जलाकर, उड़ जाता है आसमान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
 

सपने।
मेरी आंखों में जब देखे सपने,
मुझसे बोला  मुझे दे दो सपने,
पैसा चाहे जितना भी ले लो,
बेच दो मुझे अपने सपने।
पैसे नहीं है तुम्हारे पास,
क्यों सजाये है सुनहरे सपने,
नहीं कर पाओगे पैसे बिना,
पूरे तुम अपने सपने।
क्रोधित होकर बोला  मुझसे,
ले ले  पैसे, दे दे  सपने।
 
नहीं नहीं मैं नहीं दूंगा,
अपनी आंखों के सपने,
मैं कंगाल हूं, नहीं है पैसे,
मेरे पास है केवल सपने,
चन्द पैसों में  बेच दूं  अगर,
अपनी आंखों के सुनहरे  सपने,
कल पैसों में भी नहीं मिलेंगे
ऐसे सुन्दर प्यारे सपने।
कभी सोता हूं राज महल में,
कभी देखता हूं गाड़ी के सपने।
करता हूं विवाह अप्सरा से,
देखता हूं कई रानियों के सपने।
 
नहीं नहीं मत छीनो मुझसे,
रहने दो मेरी आंखों में सपने,
हम गरीब हैं, हम तो बस,
देख सकते हैं केवल  सपने।
धन नहीं है, दौलत नहीं है,
हमारे पास है केवल सपने।
 

मैं तो तेरी जननी हूं।
खोल  गेट का ताला बेटा,  मैं सड़क पे, तू बिस्तर पे लेटा?
मत मुझ पर अत्याचार कर, मैं तो तेरी जननी हूं।
नौ मास तक कोख में पाला, हाथ पकड़ के चलना सिखाया,
पढ़ा लिखाकर शोहरत दिलायी, मैं तो तेरी जननी हूं।
सब कुछ है तेरा कुछ न मेरा, मांग लेता, सब कुछ दे देती।
क्यों घर से मुझे निकाल दिया, मैं तो तेरी जननी हूं।
कल भूखी  रही मैं तेरे लिये,  तू रोटी न देता मैं चुप रह जाती,
ये घर है मेरे प्यार का मन्दिर, मैं तो तेरी जननी हूं।
सोचा था बेटा राम होगा, रावण ने भी मां की पूजा की,
लोग गैर  पीड़ितों की पीड़ा हरते हैं, मैं तो तेरी जननी हूं।
 
कल तुझ पर हंसेंगे सब, मुझे सड़क पर देखकर,
कोई मां बेटा न चाहेगी, मैं तो तेरी जननी हूं।
 
 

मैं कहना चहाता हूं।
मैं कहना चाहता हूं, इक बात दीवाने से,
कुछ भी हासिल न होगा, व्यर्थ में आँसू बहाने से।
उसे तुझ से प्यार होता, तेरा जीवन तबाह न करती,
पत्थर दिल नहीं पिघलते, किसी के रोने और  मिट जाने से।
सूख रहा है एक गुल, बुलबुल की याद में,
हस्ती तेरी मिट जायेगी, गुल तेरे मुरझाने से।
शमा को तुझसे प्यार नहीं, मत जा तू उसके पास।
जलाकर राख कर देगा, कहता हूँ परवाने से।
भोली भाली एक चकोरी, चाँद को पाना चाहती है,
दिल नहीं है चाँद के पास, क्या लाभ है उसे चाहने से।
किसी को भी इतना मत चाहो, जी न पाओ उसके बिना,
जीवन नहीं मरा करता है, किसी के दूर जाने से।
 

फूट पड़ी है गीत बनकर।
कन्ठ में मेरे, स्वर है तेरे, गीत हैं प्रेम के अधरों पर,
नैनों में है जो  छवि तुम्हारी,  फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
 
तन सुन्दर मन सुन्दरतम,सुन्दर हो तुम जग में सबसे,
तन की पावनता, मन की सुन्दरता,  फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
तुम रति हो या मेनका, या किसी  नव लोक से आयी हो,
तुम्हारे अधरों की मधुर मुस्कान, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
कालीदास के नैनों में भी, तुम सी सुन्दर कोई छवि होगी,
जो दिखती  होगी हर शै में, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
मधुर वाणी, पुष्प सा  स्वभाव, नैनों से छलकता  प्रेम,
तुम्हारी आहट मेरी प्रतीक्षा, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 

मैं खड़ा इस पार।
    मैं खड़ा इस पार, तुम हो उस पार प्रिय,
मुद्दतें  हो गयी मिले नहीं, बुलाता है मेरा प्यार प्रिय।

    वसन्त आया फूल खिले, देता था सुनायी कोकिल का गान,
झूम रही थी प्रकृति सारी, न थी जीवन में बहार प्रिय

।    घिर आये नब में बादल देखो, आया है सावन तुम भी आओ।
 
कई वर्ष  हो गये दूर रह कर, क्या कहेगा संसार प्रिय।

    मौसम बदला, रस्में बदली, वक्त के साथ हर चीज बदली,
तुम कभी न बदलना,तुम हो जीवन की धार प्रिय।

    कोई रोके तुम्हें तो रुकना न, आना पवन की तीव्र गति में,
जो तुम्हे आने से रोके, गिरा देना वो दीवार प्रिय।

 

15 अगस्त।
मैं 15 अगस्त हूं कहता हूं तुम से, सोचो  हम क्यों गुलाम हुए,
वो सब कुछ हम फिर न करें, जिस कारण हम गुमनाम हुए।
मैंने खुद रोते देखा था,  अपनी प्यारी भारत मां को,
राम कृष्ण के वंशज होकर भी,  हम जग में  बदनाम हुए।
हर हिन्दुस्तानी का जीवन था केवल,  पिंजरे में बन्द पंछी सा,
नारी का अस्तित्व, पुरूष का पौरुष, हमारे  ख्वाब तक भी  नीलाम हुए।
कुछ महापुरूषों ने सपना देखा, खुशहाल स्वतंत्र भारत का,
इस सपने को पूरा करने, कई देश भक्त महान हुए।
मैं साक्षी हूं हर कुर्बानी  का, मैंने हर शहीद  पर सुमन चढ़ाये,
शव गिनते गिनते थक गया था,  असंख्य वीर कुर्बान हुए।
मैं 15 अगस्त करता हूं आवाहन, भ्रष्टाचार को जड़ से  मिटाओ,
देखो हमारी उन पुरानी भूलों के, क्या क्या  भयानक परिणाम हुए।

 


प्रकृति की तरह...


मुझे लगता है
अब पंछियों की चहचाहट भी
कम हो रही है
...मानवीय  संवेदना की तरह...

अब तो बसंत में भी
मुर्झा कर   गुल
बिखर रहे हैं इधर उधर
...हमारे सपनों की तरह...

अब तो पिंजड़े में बंद
पंछियों को भी
स्वीकार है बंधन में रहना
....हमारे बच्चों की तरह...

नहीं सुनाई देती है अब
कहानियों में परियां
उन्हें भी मार दिया होगा
...अजन्मी बेटियों की तरह...

कहीं 21वीं सदी में
हमारा अस्तित्व भी
खतरे में तो नहीं है
प्रकृति की तरह...

...जीने के लिये तुम्हारे शब्द ही काफी हैं...


   
    उस दिन जब
मेरा वहां अंतिम दिन था
मुझसे कहा था तुमने
लबों की इस प्यारी मुस्कान को
....कभी मिटने न देना...

आशीषों भरा
आप का कहा हर शब्द
याद रहेगा
जीवन भर मुझे
...हालात भी न छीन सकेंगे  मुझसे...

पर वो मुस्कान
अब लबों पर नहीं है
जो बहुत पहले
भेंट चढ़ गयी हालात की
...जीने के लिये तुम्हारे शब्द ही काफी हैं...

 

 

देश की इस धुंधली तसवीर को।

मैंने अपना मत
दिया था जिसे,
मतगणना में
उसे शिकस्त मिली।

न क्षेत्र देखा
न  जाती
न हवा की तरफ
अपना मत बदला।

दल को मैं
महत्व नहीं देता,
आश्वासन,  भाषण
बहुत सुन चुका।

देखा था मैंने
व्यक्तित्व उसका
वो बदल सकता था
देश की इस धुंधली तसवीर को

 

हम कहां व्यस्त हैं?
मैं सोचता हूं कि
हमारा अधिकांश काम
आज  होता है मशीनों से
फिर भी हम
व्यस्त हो गये
मशीनों  से भी अधिक।

आज हमारे पास
किसी के लिये ही
यहां तक की खुद के लिये भी
वक्त नहीं है।

बिलकुल भी संदेह नहीं
मशीनें हम से अधिक
और अति शीघ्र काम करती है।
फिर सोचिये जरा
हम कहां व्यस्त हैं?

 

ये क्रांति लाना चाहता हूं...

तुम दे दो अपने शब्द मुझे,
मैं गीत बनाना चाहता हूं,
सोए हैं जो निद्रा में,
उन्हें जगाना चाहता हूं...

नहीं मिलती, मजदूर को मजदूरी,
कर रहा है किसान आत्महत्या,
गांव गली के  हर बच्चे को,
स्कूल भिजवाना चाहता हूं...

प्रताड़ित हो रही   है औरत घर में,
लड़कियों के लिये   पग-पग पे खतरा,
गर्भ में पल रही बेटियों का,
जीवन बचाना चाहता हूं...

मृत हो गया है यौवन आज,
नशे से अनेकों होनहारों का,
नशे के सभी   गिरोह को,
फांसी पे चढ़ाना चाहता हूं....

शोषण न हो किसी का,
सभी को न्याय मिले,
अंजान न हो   अधिकारों से कोई,
ये क्रांति लाना चाहता हूं...

 

दीवार...
ये दीवार
जो सहारा देती रही
हर उस आदमी को
जिसे आवश्यकता थी
इसके सहारे की...
आज ये दीवार
गिरने वाली है,
जिसे सहारा देने को
कोई भी तैयार नहीं है...

इसके पत्थर भी,
जिन्हें छुपा रखा था,
प्रेम से अपने आगोश में
भी अलग होना चाहते हैं...

 

बापू...
बापू
मैंने सुना है
किताबों में भी पढ़ा है
तुम भारत के सब से
निर्धन आदमी की तरह
जीवन जीते थे।

मैं ये भी जानता हूं
तुम अपना  हर  काम
स्वयं करते थे।
तुम तो
पहनने के लिये कपड़ा भी
अपने हाथों से बुना करते थे।
तुम्हारा चरित्र तुम्हारी लिखी
किताबों के दर्पण में
देखा है मैंने।

 

इस लिये आज
मैं महसूस कर सकता हूं कि
तुम्हारी आत्मा भी
आहत होगी
जब हर नेता की
प्रतिमाएं बनाने के लिये
हो रहा है खर्च
वो पैसा जिससे
देश के कई जनों को
रोटी,
फुटपातियों को
घर,
अभागों को
शिक्षा,
मिल सकती थी।


आवारा न कहें...
हर उत्सव,  त्योहारों पर,
होती थी मेरी पूजा,
हर पूजा, यज्ञ   के भोग का,
प्रथम अंश  खिलाते थे मुझे।
तुम कहते थे अक्सर
33 करोड़ देव बसते हैं,
होता है जहां मेरा वास,
भूत पिशाच भी नहीं आते वहां
जहां  मिलता है  मुझे मान।

बस में था तब तक मैंने,
जीवन भर अपना दूध पिलाया
पर आज दूध देना मेरे बस में नहीं।
तुम्हारे घर को सदा ही
मैंने अपना घर समझा।
सदा ही  तुम्हारे घर में
खुशहाली लाई,
आज मैं बूढ़ी हूं,
केवल घास फूस तो खाती हूं,
कल लगता था मेरा गोबर भी पावन,
आज बोझ मैं ही लगती हूं।
जब आज    मुझे घर से निकाला,
रोई मैं भी मां की तरह,
इससे तुम्हारा कहीं अहित न हो,
मांगती हूं ईश्वर से  ये मन्नत बार बार।
मैं दूध का कर्ज नहीं मांग रही,
न ही  चाहिये मुझे तुमहारे हिस्से की
कोई भी  चीज।
तुम मेरे लिये बस इतना करो,
मुझे भय है कहीं लोग,
  मुझे भी आवारा न कहें...

 

तो हम कह सकेंगे कि नशा जहर है...
कौन कहता है
नशा जहर है,
जहर मारता है केवल  एक बार,
नशे से मरते हैं बार बार...

जहर  को पीकर,
मरते हैं केवल खुद,
नशा लेने वाला,
मारता हैं औरों को भी...

जहर पीना तो शायद,
किसी की मजबूरी भी  हो सकती है,
पर नशा करना तो,
केवल आदत है...

किसी का प्रिय  मित्र
कभी भी जहर पीने को नहीं देता,
पर खुशी खुशी से,
नशा करने को कह सकता है...

हमारी अपनी नादानी देखो,
हम जहर  को तो  बच्चों से दूर रख देते हैं,
  पर सिगरेट या शराब को
टेबल पर सजाते हैं...

जहर की तरह अगर हम और सरकार,
        इन नशीले पदार्थों को बिकने से रोकें,
बच्चों को ये देखने को भी न मिलें,
तो बचा सकते हैं हम  आने वाले कल को...

जब जहर की तरह नशे से भी,
भयभीत होगा हमारा समाज,
नशे को भी आत्महत्या माना जाएगा,
तो हम कह सकेंगे  कि  नशा जहर है...

 

ख्वाब देखने से डरता है...
हर एक आदमी
चाहे  छोटा हो या बड़ा,
अमीर हो या गरीब,
ख्वाब तो देख सकता है...

ख्वाब देखने के लिये,
न कहीं जाना पड़ता है,
न कुछ देना पड़ता है,
न किसी के आगे गिड़गिड़ाना पड़ता है...

न रिश्वत देनी पड़ती है,
न रूपये पैसे की जरूरत होती है,
डिगरी भी हो या न हो,
ख्वाब तो देखे जा सकते हैं...

पर ख्वाब पूरा करने के लिये,
ये सब कुछ करना पड़ता है,
फिर भी पता नहीं,
ख्वाब पूरा  हों या न हो...

इसी लिये आज भी
भारत का युवक,
अनेकों डिगरियां होने पर भी,
ख्वाब देखने से डरता है...

 

आंसू भी हैं...
ठेके पर बिकने वाली,
हर बोतल में,
केवल शराब ही नहीं,
आंसू भी हैं...
उस औरत के आंसू,
जो दिन भर परिश्रम करके,
शाम को घर में आकर,
हिंसा का शिकार होती है...
उस बच्चे के आंसू,
जिस की फीस के पैसे,
स्कूल में नहीं,
ठेके पर दे आये....
उस मां के आंसू,
जिस की दवा के लिये,
उस के बेटे के पास,
पैसे न होने का बहाना है...
ये आंसू,
शराब से भी अधिक
खतरनाक हैं,
इन से बचके रहना...

 

तुम तो खुद भी औरत हो
आयी थी मैं जब  इस घर में,
कहां था मैंने तुम को मां,
तुमने भी बड़े प्रेम से,
मुझे बेटी कहकर पुकारा था,
आज तुम्हीं कह रही हो,
क्या दिया तुम्हें,  क्या लाया।
समझो मेरे मन के दर्द को।
तुम तो खुद भी  औरत हो,

मेरी शिक्षा की खातिर,
पिता ने दिन रात एक किये हैं,
मेरे विवाह की खातिर,
उन्होंने कई कर्ज लिये हैं,
कहां से देंगे वो इतना दहेज,
ये सुन, मां मर जाएगी,
मां उन्हें  भी  जीने दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

7 फेरे लेकर मैं,
आयी हूं  इस घर में,
अर्थी मेरी जाएगी,
केवल अब  इस घर से।
रूप रंग मेरे गुण देखो,
आयेगी लक्ष्मी,  तुम्हारे घर चलकर,
मुझे स्नेह,  सम्मान दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

 

हमें है पथ बनाने की आदत...
हमें हैं धोखा खाने की आदत,
अपने गमों को छुपाने की आदत,
पथरीला  है ये  रास्ता,
हमें वहीं है जाने की आदत...

मांगा सूरज से प्रकाश,
पर सूरज ने दी तपिश,
होने वाली  है अब शाम,
न है दीपक जलाने की आदत...

कहती है अक्सर मां,
मैंने तुमको दिया सब कुछ,
भाग्य तो तुम्हारा अपना है,
उन्हें मंदिर जाने की आदत...

मंजिल मिले या  न मिले,
चलना है बस  केवल हमें,
काम है किसी का शूल बिछाना,
हमें है पथ बनाने की आदत...

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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कुलदीप ठाकुर की कविताएँ
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