बुधवार, 12 नवंबर 2014

इस्माइल खान की कहानी - खुशी

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खुशी

मदन थके-थके कदमों से घर में दाखिल हुआ तो उसके आने की आहट पाकर पार्वती फौरन तेज कदमों से पति के पास आई। हाथ से छोटा लटकाने वाला टिफिन लिया, टिफिन पास की छोटी मिट्टी की मुन्डेरनुमा दीवार पर रखकर, फौरन खटिया बिछा दी और पानी का लोटा लेने चौके में चली गई। मदन धम् से खटिया में धस् गया, दोनों हाथों को खटिया की पिछली लकड़ी पर टिकाकर सुस्ताने लगा। इतने में पार्वती पानी का लोटा ले आई। मदन ने एक ही साँस में लोटा खाली कर पार्वती के हाथों में थमा दिया और अपने कन्धे पर पड़े गमछे से मुँह पोंछा।
पार्वती बोली-बहुत थक गये हो, मैं चाय बनाकर लाती हूँ और वो छोटी दीवार के उस तरफ चौके में चाय बनाने लगी।


शहर से तीन मील दूर मदन का छोटा सा गाँव था और उसका छोटा सा कच्ची मिट्टी का मकान। धूलभरी सड़क के किनारे, छोटा देहाती मकान। पहले आँगन, फिर एक ढाली छान पीछे एक कोठड़ी और खपरैल की छत।
मदन वही छान में खटिया पर लेट गया, उसने दोनों हाथों को मोड़ कर सर के नीचे रख लिया और छान में ही छोटी दीवार के उस पार पार्वती को चाय बनाते देखा फिर छप्पर की आड़ी-तेढ़ी लकड़ियों में नज़रें जमा दी।
शहर में मदन एक खाद के कारखाने में काम करने रोज पैदल जाता और शाम को वापस घर आता। दिन भर कारखाने में काम करता। कारखाने का मालिक जो शहर में एक अमीर कॉलोनी में रहता था, मदन को अपने घर के काम के लिये भी भेज देता। दिन भर काम करता, फिर पैदल तीन मील घर आता तो बहुत थक जाता, एक ढाली छान के एक छोटे हिस्से को एक छोटी दो-तीन फुट ऊँची मिट्टी की दीवार से अलग कर रसोई घर बनाया था उसमें काम करते वह पार्वती को देखता कि वह गरम चाय का गिलास लेकर आते हुए उसके लिये परेशान सी है।
चाय का गिलास मदन को देते हुए बोली-आज कुछ ज्यादा ही परेशान लग रहे हो, क्या बात है ?
मदन ने कहा-यहाँ से तीन मील पैदल जाना, फिर आना, शहर में दिन भर कारखाने में काम करना, थका तो देता ही है। आज मालिक ने घर भेज दिया। उसकी औरत और लड़की परेशान कर देती है। दयाभाव तो जैसे उनके हिस्से में आया ही नहीं है। पहले मेम साहब सामान लाने बाजार भेजेंगी, सामान लाकर दो तो फिर भेजेगी अरे ये और ला दो। दो तीन चक्कर लगवायेगी। फिर बेटी बोलेगी मदन मेरा भी ये सामान ला दो। फिर उसकी सेवा करो। एक ही बार में दोनों नहीं बोलेंगी। फिर कोई चीज़ पसंद नहीं आई तो वापस करो।
पार्वती बोली-बड़े लोगों के बड़े चोंचले


अरे काहे के बड़े लोग, मदन बोला-माँ, बेटी में, मियां बीवी में, बाप बेटी में छत्तीस का आँकड़ा। हर बात पर लड़ाई। हमेशा घर में किचकिच। माँ को कोई चीज पसन्द है तो बेटी को नहीं। मालिक कोई चीज ले आयें तो बीवी को पसन्द नहीं। अरे भगवान ने सबकुछ दिया, महल जैसा घर, नौकर चाकर, मोटरें, पैसे सब कुछ पर खुशी नहीं दी। कुछ दिन पहले सेठजी बम्बई गये। एक से एक साड़ी, कपड़े, सामान क्या नहीं खरीदकर लाये। खुश होना, तारीफ करना तो दूर उल्टे सेठजी को बकने लगीं। साड़ियों के रंग पसंद नहीं, ये अच्छा नहीं वो अच्छा नहीं।
कई दिनों से मालिक की बेटी कह रही थी कि अब पुरानी कार में कॉलेज नहीं जाऊँगी। मुझे सिल्वर कलर की मारूती चाहिये। मारूती आई पर सिल्वर कलर नहीं था, तो चाबी उठाकर बाप के मुँह पर दे मारी। मालिक बेचारे ये कहते रह गये कि इस रंग की गाड़ी शोरूम में थी ही नहीं। पर वो क्या सुनती! तीन लाख मी मोटर भी बेटी को खुश न कर सकी। चीख-चीखकर सारे घर को सर पर उठा लिया। भगवान ने सब कुछ दिया उस घर में पर सुख शान्ति, खुशी नहीं दी।


पार्वती ने लम्बी साँस भरकर कहा-अपनी अपनी किस्मत है। ये तो दुनिया है, नसीब में सुख नहीं तो कहाँ से मिले। फिर बोली-हाँ सुनो जी एक बात मेरे मन में आई है, कहो तो कहूँ। मदन ने स्वीकृति भरी नज़रों से पार्वती की ओर देखा। पार्वती बोली-देखो तुम मेरी बात पूरी सुनना और मना मत करना।
ऐसी क्या बात है जो वचन ले रही हो, कुछ चाहिये क्या ?
मेरी मानो तो तुम एक सायकल ले लो-पार्वती ने करीब-करीब घिघियाते हुए कहा-रोज तीन मील पैदल जाते हो, दिनभर काम करते हो फिर इतना ही चलकर वापस आते हो। शहर में दस चक्कर लगते हैं सो अलग। देखो कैसे थक जाते हो आने के बाद घन्टाभर तो सुध ही नहीं बनती। मेरी मानो तो .................
सायकल क्या धेले पैसे में आती है, पाँच छः सौ से कम में आती होगी। इतने पैसे हैं अपने पास-मदन बोला।
पार्वती बोली-सौ डेढ़ सौ मैंने जमा किये हैं, बाकी भी इकट्ठे कर लेंगे।
मदन ने एक लम्बी साँस भरी और कहा-हाँ जब पैसे हो जायेंगे ले लेंगे और बेपरवाही से फिर छत की लकड़ियों को देखने लगा। पार्वती अपने काम में लग गई। संजू और मुन्नी मदन के दोनों बच्चे पड़ोस की देवकी काकी के घर से खेलकर घर में आये।


बाबा आ गये-बाबा आ गये चिल्लाते हुए मदन की चारपाई पर चढ़ गये। छोटी चार साल की मुन्नी मदन के पेट पर घोड़ा बनाकर बैठ गई। फिर गंभीरता से बोली-बाबा पानी पिया, चाय पी, अरे कितना पसीना आया बाबा को-और अपने नन्हें हाथों से मदन का माथा सहलाने लगी। संजू अपने बाबा के पैर दबाने लगा।
दूसरे दिन मदन जब काम से लौटा तो संजू दौड़कर आया और बोला-बाबा-बाबा माँ क्या लाई है। फिर कोठड़ी की तरफ भागा और हाथ में एक मिट्टी का गुल्लक लिये बाहर आया। बोला-माँ कह रही थी इतमें पैसे जमा करेंगे फिर बाबा के लिये साइकिल लेंगे।
मदन के थके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई। वो बोला-हाँ बेटा हाँ चलो अब अन्दर।
पार्वती ने रोज़ की तरह आज भी मदन को पानी पिलाया, फिर साड़ी के पल्लू से पकड़कर चाय का गिलास लाई। चाय पीकर मदन फिर सुस्ताने, खटिया पर लेट गया। संजू गोद में मिट्टी का लाल गुल्लक लिये मदन के पास बैठ गया। पार्वती झट अन्दर कोठड़ी में गई और कुछ मुड़े तुड़े नोटों को सीधा करती बाहर आई और मुस्कुराते हुए गुल्लक की दराज में उन्हें खोंसने लगी। सभी कोतुहल और खुशी से देखने लगे।
संजू ने फौरन गुल्लक माँ के हाथों में देकर, दौड़कर खूटी से अपनी बस्ते की थैली उतारी और दोनों हाथों से पकड़, उल्टा कर झटकने लगा। टप कर एक रूपया गिरा। फौरन उठाकर गुल्लक में डाल दिया। सबके चेहरों पर आत्मविश्वास और प्रसन्नता थी।


फिर दिन बीतते रहे। पार्वती और मदन गुल्लक में पैसे जमा करते रहे। संजू और मुन्नी को रूपया आठ आने कभी मदन देता तो कुछ खाने को न लाते, सीधे गुल्लक में डाल देते।
एक दिन गर्मी की दोपहर थी। बच्चे स्कूल से आ गये थे। तभी बाहर से कुल्फी बेचने वाले ने हाँक लगाई-कुल्फी मलाई, मलाई बर्फी। संजू ने झट अपना बस्ता उल्टा कर झटका एक रूपये का सिक्का गिरा। फौरन मुन्नी की उँगली पकड़ कर बाहर आया। कुल्फी बेचने वाला सायकल पर पीछे कुल्फी की पेटी रखे, बच्चों को देखकर रूक गया। कुल्फी-मलाई-बर्फी-उसने फिर हाँक लगाई।
संजू की आँखों में चमक थी। मुन्नी मासूम सा चेहरा लिये कुल्फी की पेटी को देख रही थी, जिस पर रंग बिरंगे फूलों के बीच हरी, नीली, लाल, पीली कुल्फियों के चित्र बने थे।
संजू ने हाथ बढ़ाया ही था कि रूक गया। उसने सिक्के को अपनी मुट्ठी में भींच लिया और बोला-नहीं मुन्नी चलो, कुल्फी से खाँसी आती है। दोनों वापस पलटकर घर में आ गये। मुन्नी बिना कुछ समझे बूझे संजू के पीछे आ गई। दोनों बच्चे आले में रखे गुल्लक के पास गये। संजू बोला-मुन्नी ये पैसे गुल्लक में डाल देते हैं। बाबा की साइकिल जो खरीदनी है।
मासूम मुन्नी कुल्फी को भूल चुकी थी। बोली-मैं डालूंगी, मैं डालूंगी। संजू ने रूपया मुन्नी के हाथ में दिया। मुन्नी ने बहुत खुशी खुशी, 'टप' से रूपया गुल्लक में डाल दिया। उस 'टप' की आवाज़ पर दोनों बच्चे झूम उठे। मुन्नी नन्हे हाथों से ताली बजाने लगी।

करीब एक वर्ष गुजर गया : एक रोज शाम को मदन उसी तरह थका हुआ घर आया। पानी और चाय पीकर मदन फिर चारपाई पर लेट गया। पार्वती उसके पैताने बैठकर पैर दबाते हुए बोली-सुनो जी गुल्लक अब भारी लगती है, मेरा मन कहता है कि आज उसे तोड़ ले, शायद सायकल के पैसे हो गये हों।
मदन ने हूँ भर की।


इतने में संजू और मुन्नी खेलकूदकर आ गये। पार्वती ने संजू से कहा संजू आज गुल्लक तोड़ते हैं, तुम्हारे बाबा की सायकल के पैसे निकल आयेंगे। दोनों बच्चे, जो पिता से चिपके खटिया पर लेटे थे, फौरन उठे-हाँ माँ चलो गुल्लक तोड़ेंगे। पार्वती आले से गुल्लक उठा लाई और चारपाई के पास नीचे बैठ गई। दोनों बच्चे भी कौतूहल का भाव लिये उसके पास बैठ गये। मदन जो चारपाई पर लेटा था, वहीं लेटे-लेटे पार्वती की ओर करवट लेकर देखने लगा। पार्वती ने नीचे हाथ से जमीन साफ की, नज़रें उठाकर मदन की ओर देखा और बोली "तोड़ दूँ।"
मदन से सहमति में सर हिलाया।


गुल्लक जोर से नारियल की तरह पटक कर तोड़ दी। कुछ मुड़े तुड़े नोट, कुछ सिक्के, रूपये, दो रूपये, पचास पैसे, पच्चीस पैसे, दस पैसे और पाँच पैसे, गुल्लक की मिट्टी और ढीकरियों के साथ जमीन पर बिखर गये।
संजू तुम एक, एक और दो,दो रूपये उठाकर अलग रखो, फिर अठन्नी, चवन्नी अलग करना-पार्वती बोली। वो मुड़े तुड़े नोटों को इकट्ठा कर इन्हें सीधा कर जमाने लगी।
मुन्नी भी गंभीरता से काम करना चाहती थी, उसने पैसे उठाने चाहे तो संजू ने उसे रोका-रहने दे तू अभी छोटी है।
जब सब पैसों की ढेरियाँ बन गई तो पार्वती उन्हें गिनने लगी। मदन भी खण्टिया पर लेटे-लेटे कौतूहल से देखने लगा। सब यों देख रहे थे जैसे कोई लाटरी का नतीजा निकलने वाला है।
सारे पैसे गिने गयें पांच सौ अढ़सठ रूपये हैं, कुछ दस पैसे, पांच पैसों के सिक्के अलग-पार्वती मुंशी की सी शक्ल बनाकर बोली।
फिर आशा भरी नज़रों से मदन को देख बोली-आ जायेगी न साइकिल इतने में।
मदन ने कहा-कल शहर जाऊँगा तो पूछूँगा।
पार्वती से सारे पैसे मदन ने गमछा लेकर उसमें बान्धे। झाड़ू लाकर सारी मिट्टी और ठिकरियां समेटी और अपने काम में लग गई।
दूसरे रोज़ मदन काम पर जाने लगा तो सबने उसे एक सुर में याद दिलाया कि वो सायकल की जानकारी लेना न भूले।
शाम को चार बजे से ही घर में मदन के आने की राह देखी जा रही थी। बच्चे भी आज खेलने नहीं गये थे, वे दोनों भी बाबा के आने का इन्तजार कर रहे थे और मन ही मन सायकल के सुनहरे सपने देख रहे थे।
शाम को हर दिन से कुछ ज्यादा ही देरी से, भारी करमों से मदन घर के आँगन में दाखिल हुआ। चेहरे पर उसके कोई खुशी नहीं थी। आकर "धम" से चारपाई पर बैठ गया, हताश और निराश।
पार्वती ने पूछा - क्या हुआ।
पहले पानी तो पिला।


पार्वती पानी का लोटा लाई। मदन ने घूँट घूँट पानी गले के नीचे उतारा और लोटा नीचे रखने लगा तो झट पार्वती ने उसके हाथ से लोटा ले लिया। चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ, लोटे को अपने सीने से लगाये, व्याकुलता से उस पर हाथ फेरते हुए मदन की ओर जवाब की प्रतिक्षा भरी नज़रों से देखने लगी।
मदन धीमी आवाज में बोला-साइकिल चार-छः महिनों बाद ले लेंगे पारो अभी जल्दी क्या है ?
पार्वती बोली-बाजार से पूछी, सायकिल कितने की आती है? अरी जब लेनी होगी तो कीमत भी पूछ लेंगे-मदन ने बात टालने की कोशिश की। फिजुल परेशान मत हो, जा अपना काम देख। और दो बच्चों से बात करने की कोशिश करने लगा।


पार्वती के चेहरे पर मायूसी झलक आई।
मुझे बताओ तो मैं कुछ न कहूँगी-पार्वती बोली।
अच्छी सायकल बाजार में सात सौ रूपये की है-मदन पार्वती की ओर बेबस नज़रों से देखकर बोला। अरे जी काहे छोटा करती है बावली, मैं अभी जवान हूँ, मजबूत हूँ। इतने दिन चले और चल जावेंगे। छः-आठ महिनों की बात है, फिर ले लेंगे।


पार्वती बोली-मुझे बहलाते हो, पहले चार-छः महिने और अब छः आठ महिने!
उसने बड़े मिन्नत वाले लहजे में कहा-सुनो जी, मेरी गृहस्थी, मेरी और मेरे बच्चों की खुशी तो तुम से है। रोज-रोज तुम्हें यूं टूटता नहीं देख सकती। चेहरा कैसा काला पड़ गया है। नहीं-नहीं अब मेरी मानो वो बोली-अब की पगार मिले तो सौ-सवासौ मिलाकर साइकल ले आना, मुझे उतनी पगार कम दे देना, मैं थोड़ा दाल में पानी, सब्जी में तेल कम घोल घालकर महिना पूरा कर लूंगी। तुम चिन्ता मत करना ये मेरा मामला है, घर चूल्हे का मै निपट लूंगी। पर तुम सायकल जरूर ले आओ।


पत्नि के ऐसे आग्रह के सामने मदन कुछ न कर सका, बोला ठीक है कल शहर जाउँगा तो शायद सायकल पर ही आऊँ। कल ही तो पगार का भी दिन है।
अरे बावली अब तो खुश हो जा। मदन ने पार्वती की ठोड़ी को हाथ लगाना चाहा। पार्वती बचकर मुस्कुराती हुई उठ गई।
पारो मुझे कल देर हो जाय तो चिन्ता मत करना।
क्यों होगी देर भला। सायकल से आओगे तो जल्दी न पहुंचोगे। अरे सायकल जो लेनी है, काम की छुट्टी के बाद देखभाल कर लूँगा। पार्वती लोटा हाथ में लिये ऐसे खुशी-खुशी चौके की तरफ जाने लगी जैसे उसका पति कल उसके लिये जड़ाऊ हार लाने वाला हो।
संजू और मुन्नी पड़ोस की देवकी काकी के घर से खेलकर घर में आये और बाबा-बाबा कहकर मदन से लिपट गये।
शाम बिलकुल ढल चुकी है। इक्का दुक्का तारे आसमान में नज़र आने लगे हैं। मदन आँगन में अपनी चारपाई पर लेटा है। संजू उसके पास सटकर बैठा है। मुन्नी रोज़ की तरह मदन के पेट पर घोड़ा बनाकर बैठी है। आंगन के दूसरे कोने में पार्वती बर्तन माँझ रही है, उसके चेहरे पर खुशी साफ झलक रही है। सामने रखी लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा कुछ ज्यादा ही चमकदार दिख रहा है। उसने संजू और मुन्नी को सायकल वाली बात बता दी है। बच्चे मदन से सिर्फ सायकल के बारे में ही बातें कर रहे हैं।
आठ साल का संजू बोला-बाबा मेरे पैर भी साइकिल के पैडल पर पहुंच जायेंगे ना।
मदन - हां बेटा पहुंच जायेंगे।


अगर नहीं पहुंचे तो मैं कैंची चला लूंगा।
मुन्नी बोली-पर सायकल तो बाबा रोज शहर ले जायेंगे, और तुझे आती भी है चलाना ?
छुट्टी के दिन चलाया करूंगा और रोज शाम को भी बाबा के आने के बाद।
मुन्नी - नहीं नहीं तुम शाम को मत चलाना। शाम को सायकल थक जायेगी। माँ कह रही थी, बाबा दिन भर थक जाते हैं इसलिये सायकल ले रहे हैं न। अब बाबा नहीं थकेंगे, अब सायकल थक जायेगी।
संजू - बाबा कौनसे रंग की सायकल लोगे? हरी लेना।
मदन - हां बेटा, हरी लेंगे।


मुन्नी बोली-बाबा पहियों में गजरे भी लगवाना और ट्रिन ट़्रिन - ट्रिन घन्टी भी। कुल्फी वाले की सायकल कितनी गंदी है। गजरे भी गन्दे और घन्टी तो है भी नहीं उसकी जगह भोपू और खिलखिलाकर हसने लगी।
सन्जू बोला - बाबा उसमें आगे सीट भी लगवाना मुन्नी के लिये।
मुन्नी बोली - और आगे छोटे बच्चे को बैठाने वाली डलिया भी।
तू सीट पर बैठ जाना, फिर डलिया किसलिये- सन्जू बोला।


मुन्नी मासूमियत से बोली - कभी छोटा भयया् अपने घर भी आ गया तो। अभी जैसा देवकी चाची के घर आया है न ......................छोटा सा भय्या .................इतना छोटा सा ................और हाथ से बताने लगी।
मुन्नी की यह बात सुन कर, बर्तन माँझते पार्वती का चेहरा शर्म से लाल हो गया। बच्चों की शरारत भरी बातों से मुस्कान उसके चहेरे पर आ गई और उसने, साड़ी जो उसके सर पर थी, उसकी किनारी से अपना मुँह छिपाना चाहा।
मदन भी लेटे-लेटे बच्चों की बात पर मुस्कुरा दिया और वहीं से प्यार भरी नज़रों से पार्वती को देखने लगा। पार्वती ने कनखियों से मदन को देखा तो और लजाकर दोहरी हो गई। सोचने लगी, कभी मौका आया तो मैं भी सायकल के पीछे केरियर पर बैठ कर मदन के साथ कहीं चली जाया करूँगी। उसके ख्यालों में स्कूटर पर पीछे बैठी स्त्री की तस्वीर आई, और मदन के इतना करीब होने के अहसास ने उसकी शर्मिली लाली को दुगना कर दिया।


सायकल अभी घर में आई नहीं है, पर मदन का कच्ची मिट्टी का बना घर सारा का सारा ढ़ेर सारी खुशियों से भर गया है, क्या पता आज रात किसी को इस घर में नींद आयेगी भी या नहीं।

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