राम शरण महर्जन के हाइकु - बुढ़ापा का दर्द - 3

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बुढ़ापा का दर्द-३
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दुवा ही देता
रोता भी अंतर्मन
संतान प्यारा |१|

थोड़ा ख़ाता वो
बचा लाते बच्चों को
सुखका क्षण |२|

लोरी सुनाती
पोतीको सुलाती वो
चाँदसा मुंह |३|

नींद ना आए
टटोलते जीवन
दंग रहते |४|

बच्चें चिल्लाते
बृद्ध मौन रहते
पुस्तोंका दूरी |५|

एक लिहाज
चाहत सन्ततिसे
बृद्धका खुसी |६|

अकेला रहें
सब गये काम पे
क्या नहीं पाया! |७|
                   - राम शरण महर्जन
                     कीर्तिपुर, काठमांडू  

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