बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अशोक गुजराती की 4 लघुकथाएँ

।।लघुकथा।।

अपना-अपना सच

 

   वे हमेशा के चाक़-चौबंद. सिग्नल मिलते ही अपनी स्कूटी बढ़ा ले गये. अचानक मोड़ लेकर एक ऑटो उनके सामने आ गया. उन्होंने बमुश्किल ब्रेक लगाये और बोले, 'सिग्नल तो देख लिया करो !'

   उस ऑटो वाले ने उन्हें गंदी-सी गाली दी और निकल पड़ा. उनके मुंह से अनचाहे उससे भी भयंकर ग़लीज़ गाली फिसल पड़ी, जो ऑटो वाले ने निश्चित ही सुन ली होगी.

   ऑटो वाला तो अपना काम निपटा कर- और शायद दारू पीकर -निश्चिंत घर जाकर सो गया होगा.

   लेकिन वे... देर तक अचम्भा करते रहे कि मैंने गाली दी... ऐसी अश्लील गाली... ऐसा कैसे हो गया ?...

   वे रात भर विकल बने करवटें बदलते रहे...

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।।लघुकथा।।                                  

झांसा

 

 

   मेरे घर आती थी वह, बर्तन-पोंछा करने. उम्र होगी यही कोई सोलह-सत्रह साल. सीधी-सादी, भोली-भाली. सुबह-सुबह आते ही मेरी पत्नी से बोली, 'मैंने उसे पैचान लिया था- आमिर ख़ान थी वो...' एक तो उसकी बोली, जो हिन्दी के स्त्री लिंग को पुल्लिंग और पुल्लिंग को स्त्री लिंग बना देती थी; दूसरे उसका देसी लहज़ा. पत्नी कुछ समझ नहीं पायी. पूछा उससे, 'क्या कह रही है तू ?'

   उसने ऐसी नज़र से देखा, जिसका मतलब था- कैसे बुद्धू हैं आप पढ़े-लिखे लोग, शुद्ध हिन्दी समझ नहीं पाते... फिर थम-थमकर कहा, 'वो रात में टीवी पर दिखाता है न आधा तसबीर, मैंने तड़ाक से जान लिया कि ये तो अपनी आमिर ख़ान है...' पत्नी के ज्ञान-चक्षुओं ने फ़ौरन उसका रहस्य ताड़ लिया...

   रात में नौ बजे के क़रीब एक चैनेल पर किसी जानी-मानी शख़्सियत के चेहरे का कुछ भाग दिखाकर फ़ोन नंबर दिये जाते हैं कि इस व्यक्ति से आप निश्चित ही परिचित हैं, बूझिए और फ़ौरन फ़ोन करके बताइए कि यह है कौन... कोई युवती- सजी-धजी, थोड़ी-बहुत आकर्षक लगातार बोलती रहती है कि कम समय बचा है, यदि आप इस आधे-अधूरे फ़ोटो को पहचान रहे हैं तो मोबाइल हाथ में उठाइए और हमारे नंबर पर बताइए और लाखों के इनाम जीतिए... आप उनको फ़ोन करेंगे तो प्रतीक्षा करने को कहते रहेंगे. इसी बीच काफ़ी देर बाद किसीका फ़ोन उनके स्टुडियो में लगेगा, जो बेहिचक आमिर ख़ान को सलमान ख़ान बताने की ज़ुर्रत करेगा. वही ऐंकर, खुली-खुली देह और लुभावनी सूरत को मटका-मटकाकर बतायेगी कि यह जवाब ग़लत है... और कोशिश कीजिए! आप उस फ़ोन करने वाले को बेवक़ूफ़ करार देकर सोचेंगे कि मुझे पक्का मालूम है कि यह कौन है और भिड़े रहंगे. इस दरमियान आपके मोबाइल का मिटर चलता रहेगा...

   महरी ने मेरी पत्नी को बताया कि उसके मोबाइल में सिर्फ़ बीस रुपए थे और वह अपने प्रिय नायक की पहचान बताकर एक लाख रुपए जीतने से वंचित रह गयी... डेढ़ सौ रुपए होते तो यह हो जाता... मेरी पत्नी ने उसे समझाया कि जो बीच-बीच में ग़लत जवाब देते हैं, उन्हीं के लोग होते हैं. फ़ोटो इतने सरल होते हैं कि कोई मूरख भी बता सकता है कि किसका है... यह दूर-संचार कंपनियों और इनकी मिलीभगत है जबकि सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती... सारा पैसा लूटने का नाटक है... पता नहीं उस ग़रीब लड़की को कितना समझ में आया क्योंकि वह अविश्वास भरी दृष्टि से देख रही थी...

   और वही हुआ जिसकी आशंका थी. अगले दिन वह बिसूरते हुए आयी कि... 

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।।लघुकथा।।

मानुख

 

   सीमा पर गोलीबारी अनवरत जारी थी.

   वे भी कम नहीं थे, फ़ौजियों को छकाकर भारत की सरहद पार कर ही गये.

   लेकिन... वन की परिसीमा में दाख़िल होते ही जंगली कुत्ते झुंड की शक्ल में उनके पीछे पड़ गये. क्या भारतीय कुत्तों को उनकी पाकिस्तानी पहचान की बू लग चुकी थी...?

   कुत्ते उन्हें किसी क़दर चैन नहीं लेने दे रहे थे. वे तीनों जान बचाने की ख़ातिर अपना एक-एक अंग काट-काटकर उन भयंकर आदमखोर कुत्तों के आगे फेंकते जा रहे थे... शायद भुवनेश्वर की कहानी 'भेड़िया' कहीं पढ़-सुन रखी हो...

   बावजूद इसके वे भयावह भूखे कुत्ते फेंके गये मांस के टुकड़ों का भक्षण कर फिर-फिर उनकी जान की मुसलसल आफ़त बने हुए थे.

   हुआ यों कि ख़ुद को बचाने के फेर में उन तीनों के शरीर के लगभग सारे बाहरी अंग समाप्त-प्राय थे. अब वे लाचार दौड़ भी नहीं पा रहे थे. ऐसे में कुत्तों ने उन पर एक-मुश्त वहशियाना हमला बोल दिया.

   वे बेबस थे लेकिन अपने देह की एक चीज़ बचाने की कोशिश में अब भी लगातार मुब्तिला थे- वह चीज़ थी उनका दिल...

   क्या वे दहशतवादी थे ?...

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।।लघुकथा।।

हवा

 

 

   पत्नी से उसका तलाक़ हो गया था. अदालत के आदेश के अनुसार, कि उसको अभी मां के सामीप्य की ज़रूरत है, वह अपनी पांच वर्षीय बेटी को भी खो चुका था. 

   वह अकेला अपने ख़यालों में उलझा बैठा हुआ था. दरवाज़े के सामने उसे अपनी बेटी की समवयस्क और सहेली लता खेलती हुए दीखी.

   उसने उसे आवाज़ दी. वह आयी. उसने चाकलेट निकाल कर उसे देते हुए अपने क़रीब खींच लिया.

   लता ने चाकलेट खाते हुए सवाल किया- 'अंकल, प्रग्या कब आयेगी...'

   उसने उदास-सा जवाब दिया- 'बेटे, अब वह कभी नहीं आयेगी... अपने आंसुओं को रोकते हुए वह बोला, 'अब तू ही मेरी बेटी है... तू ही प्रज्ञा है...' और उसने उसका चुम्मा ले लिया.

   उसी वक़्त लता की मां ने, जो बिलकुल पड़ोस में ही रहती थी, आंगन में आकर उसे पुकारा- 'लता... ओ लता...'

   'आयी मम्मी...' कहते हुए लता दौड़ पड़ी. वह फिर अपने दुख में डूब गया.

   लता को लेकर उसकी मां अन्दर गयी. टीवी चालू था. उस पर पिछले दिनों बच्चियों के साथ हुए बलात्कारों पर चर्चा चल रही थी. मां ने उससे पूछा, 'बेटी, वहां क्या कर रही थी ?'

   लता ने बताया कि अंकल ने बुलाया और चाकलेट भी दी. मां सतर्क हो गयी- 'और क्या किया ? '

   लता ने असमंजस में पड़ते हुए सरलता से कहा, 'कुछ नहीं मम्मी.'

   मां ने संतुष्ट होना चाहा- 'तुझे अपने नज़दीक लेकर गोद में तो नहीं बैठाया...?'

   नादान लता ने तुरंत उत्तर दिया- 'हां... मेरी पप्पी भी ली...'

   'अरे! ऐसा किया उस शैतान ने... चल... चल मेरे साथ, उसकी ख़बर लेती हूं...' मां ग़ुस्से में थी.

   वह लता को लेकर उसके घर पहुंची. क्रोध से भरी वह चिल्लायी- 'कमीने, तेरे को शर्म नहीं आयी... अपनी बेटी जैसी लड़की को पास में लेकर चूमाचाटी कर रहा था... ठहर ज़रा... मैं अभी पुलिस को फ़ोन करती हूं...'

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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095.

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  1. "हवा" बहुत ही सामायिक और व्यवहारिक अनुभूति सी उपजी श्रेष्ठ कहानी है ,अच्छी कहन के लिए साधुवाद

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