सोमवार, 15 दिसंबर 2014

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का एक यादगार उपन्यास - दूसरा ताजमहल (4था भाग)

 

उपन्यास : दूसरा ताजमहल

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

- संदीप प्रिन्टर्स, मेरठ द्वारा मुद्रित आरती पाकेट बुक्स मेरठ : 250001

लखनऊ : '

  (---पिछले भाग 3  से जारी)

 

जब बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते महीना हो गया तो चांदी के थाल में विलासराय ने अपने सेवक से सौ रुपए मंगवाए। स्वयं थाल नजीर के सम्मुख करते हुए कहा था-'पण्डित नजीर साहब। आप अपना महीना खुद तय करें -जो तय करें वह लें। '

नजीर ने थाल में से दस रुपए गिनकर उठाए।

-'सिर्फ दस ?'

-'जी.. .।'

-'कम से कम पांच और उठा लीजिए। हम कहते हैं, हमारी बात रखने के लिए।'

तीन वर्ष बाद जब नजीर के बड़े शिष्य का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तो उस्ताद को पगड़ी, पांचों कपड़े और एक सौ एक रुपए की भेंट भी प्राप्त हुई। साथ ही महीना पन्द्रह से सत्रह रुपए हुआ।

फसल पर विलासराय एक गाड़ी अनाज नजीर के यहां भिजवाते। गेहूं, चना, जौ और मटर। हर महीने घी और तेल भिजवाते। हर सप्ताह अपने बगीचे की सब्जी भिजवाते।

नजीर बच्चों को कविताएं सुनाते थे। उन कविताओं के कारण घर की महिलाओं में भी वह लोकप्रिय हुए। पर्दे के पीछे वह भी सुनती। जब वह बच्चों को पढ़ाकर चुकते तब विलासराय भी दुकानों की देखभाल के लिए जाने को होते।

नाश्ते में विलासराय दूध और हलुआ लिया करते थे। पहले कभी .नित्य ही दूध और हलुआ नजीर के लिए भी आने लगा।

एक बार नजीर ने उस सेवक से कहा भी जो दूध और हलुवा लाया था- 'भाई आज घर से कुछ ज्यादह डटकर चले हैं, गुंजाइश नहीं है।‘

सेवक ने कहा-'रानी जी का हुक्म है।'

-'रानी जी से कहो कि आज माफ फरमा दें।'

कुछ देर बाद नौकर फिर हलुए की तश्तरी और दूध का कटोरा लेकर हाजिर हो गया।

-'लेकिन भाई..।'

पर्दे के पीछे से आवाज आई -'भाई से नहीं हमसे बात कीजिए।'

नजीर उठकर खड़े हुए। बोले -'ओह, भावज रानी तशरीफ लाई हैं, आदाब बजा लाता हूं।'

--'जीते रहो, लेकिन रियायत नहीं होगी। दूध पीना होगा, और हलुआ खाना होगा। वर्ना दूध नाक के जरिए मुंह में डलवा दूंगी और हलुआ पेट से बंधवा दूंगी।

-'आपकी रैयत हूं भावज रानी। ऐसा जुल्म न करें।'

-'हमारा हुक्म नहीं माना जाएगा तो जुल्म जरूर किया जाएगा।.. .हम यही खड़े हैं और देख रहे हैं।'

 

उस दिन के बाद नजीर ने कभी इन्कार नहीं किया। दोनों वस्तुएं समाप्त करते और बड़े लड़के से कहते. भावजरानी से हमारा आदाब कह देना भाई।'

विलासराय का एक नौकर था रामसगुनवा। दूर प्रताप- गढ़ का था। एक दिन जिद पकड़ गया।

-'उस्ताद हमहूं पढ़ी--तीन रुपया तनखा पावत हैं। सौ महीना का दक्षिणा भी देही।'

कई दिन नजीर उसे टालते रहे। नहीं माना तो पट्टी पुजवाई। अलिफ से लेकर फारसी वर्ण माला के सभी अक्षर लिख दिए।

लेकिन रामसगुनवा का दिमाग मोटा था। अलिफ वे, पे से आगे न लिख सका। न पढ़ सका।

-'जाने का वात रही उस्ताद जी। अलिफ, ये, पे से आगे याद न होवत रही। आगे सब तरफ हौवा दिखाई पड़त हैं।'

नजीर बोले -'तो यूं ही याद करो। अलिफ, बे, पे हौवा .।'

हौवा तो याद हुई गया रहा.. .आगे.. .।'

-'अलिफ, वे, पे, होवा, मां चील बाप कौवा.।'

 

बात आसान थी। रामसगुनवा ने याद कर ली। कई महीने बाद इस बात का मजाक वना।

शाम का वक्त था। विलासराय बैठक में थे। कुछ मित्र भी थे।

मिठाई मंगाने के लिए विलासराय ने अपने एक और सेवक चेतन को आवाज दी। चेतन किसी काम से गया था। रामसगुनवा आया। बोला -'मालिक ऊ तो बाजार गए रहा। हुकुम करि -हम हाजिर हैं।'

- 'अरे भाई, तुम रुपए के बाकी का हिसाब कैसे करोगे। बे पड़े लिखे हो.. .मिठाई मंगवानी थी.. .।'

-'हम पड़े भी रहे सरकार और लिखे भी रहे। उस्ताद नजीर के सागिर्द रहे.. .।'

--.'अच्छा। क्या पढ़ा-लिखा हूं तुमने उस्ताद नजीर से?' -'हम पढ़ि रहे सरकार, अलिफ वे पे हौवा, मां चील बाप कौवा।'

बात इतनी सरलता और सहजता से कही थी रामसगुनवा ने कि उसकी बात पर, उसके भोलेपन पर सभी हंस-हंसकर दोहरे हो गए। हंसी का दौर था कि रुक ही नहीं पा का था।

बेचारा रागमगुनवा नहीं समझ पा रहा था कि हंसने की क्या बात है.।

 

तो नजीर विलासराय की हवेली से चलते थे तो मटरगश्ती की मौज में होते थे। घर की तरफ भूखा भागता है.. उनका पेट भरा होता था।

यह भी बहुत पहले की बात है। तब की जब' नजीर ताज- गंज में नहीं शहर में ही रहते थे। बलदेव मन्दिर के प्रधान पुजारी पण्डित लल्लन के घर के बाहर बहुत बड़ा चबूतरा है, नीम का पेड़ छांव के लिए है। जाड़ों में जब सूर्य दक्षिणायन होता है तो खूब धूप आती है, गरमी में सूर्य उत्तरायण होता है तो नीम छांव देता है।

बताया न, कई वर्ष पहले की बात है। शिवरात्री का व्रत था। लल्लन के चबूतरे पर खूब भीड़ थी। भांग का चरणामृत बना था। भोलेनाथ की चर्चा थी।

संयोग ही था कि नजीर उधर से गुजर रहे थे। एक पहचानता था, उसने आवाज कसी-'मियां साहब शिवरात्री का बरत है। बिना चरणामृत लिए जा रहे हो?'

नजीर रुक गए। जितने छोटे बडे बैठे थे सबसे दुआ सलाम की। कुल्हड़ भर कर भांग उन्हें थमा दी गई। नजीर, मुस्कराए। बोले-'बोल महादेव जी की जय।' फिर एक ही सांस में कुल्हड़ खाली। जो परिचित वहां बैठा था उससे कहा -'अब इजाजत दीजिए ठाकुर साहब। हम एक काम से जा रहे हैं।'

वह परिचित बोला---हमसे कुछ नाराजगी है मियां साहब?'

नजीर ने तब दोनों कानों को हाथ लगाया था -'क्या मुझ से कोई गलती हुई ठाकुर साहब।'

--शिवरात्री का बरत है। बिना कुछ महादेव जी के बारे में कहे ही चले जाओगे?'

-..ऐसा हुक्म है?

-'हम तो अरज कर रहे हैं मियां साहब. .।'

 

चबूतरे पर दी कोई एक ढपली और एक सारंगी लिए बैठा था।

घोड़ा छोड़कर नजीर ऊपर आए। ढपली वाले से ढपली लेकर ताल दी। जयकार की -'बोल महादेव जी की जय। लो भाइयों आपको सुनाता हूं महादेव जी का ब्याह, पूरे ब्याह की कथा न सुनाकर जाऊं तो मैं कमअसल और कोई बीच उठकर जाए तो वह भगत नहीं बगुल भगत.. सुनिए. .।'

 

पहले नाम गनेश का लीजे शीश नवाय,

जा से कारज सिद्ध हो सदा महूरत लाय।

बोल वचन आनन्द के प्रेम प्रीत और चाह,

सुनियो चारों ध्यान धर महादेव का ब्याह।

जोगी जंगम से सुना, वह भी किया बयान,

और कथा में जो सुना उसका भी परमान।

सुनने वाले भी रहे, हंसी खुशी दिन रैन,

और पढ़ें जो याद कर उनको भी सुख चैन

और जिसने इस बियाह की महिमा कही बनाय

उसके भी हर हाल में शिवजी रहें सहाय।

खुशी रहे दिन रात वह कभी न हों दिलगीर,

महिमा उसकी भी रहे जिसका नाम 'नजीर'।

 

सौर फिर महादेव के ब्याह की पद्य कथा आरम्भ हो गई। श्रोता ऐसे विभोर हुए कि जैसे समय की गति रुक गई। और कथाकार ढपली की ताल पर महादेव के ब्याह की कथा गाते नजीर भूल गए कहां से आ रहे थे,. और कहा जा रहे थे।

जब यह कथा समाप्त हुईं तो पण्डित लल्लन उठे। श्रद्धा विभोर पण्डित की आँखें नम थी। वह बाहें बढाकर नजीर की ओर बढ़े--वाह बेटा वाह। कमाल किया। तुम धन्य हो। तुम पण्डित हो।'

परन्तु नजीर आदमी थे, आदमी ही रहे, इतना जरूर था कि अब पुजारी जी उनके बुजुर्ग दोस्तों में से हो गए थे। कोई भी त्यौहार तब तक न मनता जब तक नजीर न आ जाते।

. गणेग चौथ पर नजीर ही ने गणेश जी की स्तुति की। जन्माष्टमी पर नजीर ने ही कन्हैया जी का जन्म सुनाया। नवरात्रि में दुर्गा जी के दर्शन नज्म की खूब धूम मची।

यह तो कई वर्षों से नियम था कि विलासराय की हवेली से नजीर सवार होकर चलते तो पहुंचते पण्डित लल्लन के यहां। आवाज लगाते-'मियां पुजारी होत.. .।'

हुक्का गुड़गुड़ाते तभी पण्डित लल्लन चबूतरे पर था जाते। पण्डित जी के ठीक सामने वाला मकान मीर साहब का था। उनका नौकर नजीर के लिए हुक्का ले आता।

चबूतरे पर चर्चा शास्त्रों की। कुरान की। ऋषियों और सूफिओं की।

 

यह भी कई वर्ष पहले की बात है। जब शिकायत के स्वर में पण्डित लल्लन ने कहा था-पण्डित नजीर।'

-‘जी हुजूर।'

-'भई हमने कुछ सुना है, आपसे आपकी ही शिकायत करेंगे।'

नजीर हंसे थे। कहा था -'मैं समझ गया। आज जरूर मोती के बारे में कहेंगे।'

-'माना कि जादूगर भी हो। लेकिन भाई तुम महापुरुष हो। ऐसे इन्सान हो जो देवता बन रहे हो। ऐसी बात कीर्ति में कलंक लगाती है।'

-'देवता बनने की चाह नहीं है। इन्सान हूं, इन्सान बना रहना चाहता हू।' '

-'लेकिन.. .।'

-‘कहिए-कहिए। रुक क्यों गए?'

-'बह कोठे वाली है।'

-'सो मैं जानता हूं।'

-'मुझे खुशी तब होगी जब उसका उद्धार करोगे।

--उद्धार करने वाला मैं नहीं हूँ। मैं तो पण्डित जी सिर्फ आदमी हूं। मोती मुझे आदर से बुलाती है, बैठाती है। मैं उसका दोस्त तो हूं लेकिन उसका तमाशबीन नहीं हूँ।'

तब पुजारी जी मुस्करा दिए -'दिल में जो बात थी सो कह दी। अब तुम जानो। '

-'मैं खुशकिस्मत हूं पण्डित जी। भला दिल की बात कोई परायों से कहता है। एक भेद जान लिया. यह नाचीज नजीर आपका अपना है।‘

तबसे कभी-सभी पुजारी जी उलाहना देते। मोती का नाम लेकर कहते उसने नजीर को देवता नहीं बनने दिया।

लेकिन इससे क्या...।

 

एक बार नजीर को ताप चढ़ा। पहुंच नहीं पाए तो पुजारी जी पूछते-पूछते ताजगंज आ पहुंचे। जब देखा नजीर बुखार में है तो आगरा के वैद्य शिरोमणि कृष्णधन की पालकी को उठवा लाए।

पुजारी जी ने वैद्य शिरोमणी से कहा -'सिर पर ताज नहीं तो क्या हुआ। नजीर साहब ताजगंज के बेताब बादशाह हैं। बुखार तुरन्त उतरे। स्वर्णभस्म का इलाज हो।'

सुनकर वैद्य शिरोमणी बहुत हंसे थे -'धरम-करम में तो आपकी बात मान रकना हूँ__ लल्लन पण्डित। लेकिन साधारण मौसमी बुखार में स्वर्णभस्म का इलाज नहीं मानूंगा। क्या दवा देनी है, यह मैं जानता हू।'

वर्षों से यही दिनचर्या थी। जब नजीर पुजारी जी के यहां से उठते तो तीसरा पहर समाप्त हो रहा होता था। बलदेव जी के मन्दिर में छोटी सी वाटिका भी थी। पंडितानी नजीर के लिए अन्दर से मौसमी फल भेजती थी। कभी-कभी सब्जी की डलिया भी.. घर ले जाने के लिए।

ठीक चौक में कलन भटियारे की खूब सजी संवरी रोटीओं की दूकान थी।

कल्लन की दूकान के ठीक ऊपर मोती जान का कोठा था। वर्षों से यहीं मंगतू घसियारा घास का छोटा सा गट्ठर लिए खड़ा रहता था। घोड़े को भी तो भूख लगती है। माहाना हिसाब था। यहां नजीर का थोड़ा घास खाता था। इसीलिए कल्लन भटियारे से भी खासी पहचान हो गई थी।

यह भी कई वर्ष पहले की बात है। मंगतू ने घोड़े के आगे घास डाल दी थी।

यह समय ऐसा होता था जब कल्लन भटियारे को फुरसत होती थी। उसके नौकर शाम के कारोबार के लिए तैयारी में होते थे।

 

वह भयानक शीत के दिन थे। दूकान के आगे ढलती धूप थी। कल्लन भटियारा वहीं चारपाई डाले, चारपाई पर जाजम और गाव तकिया सजाए बैठा था।

उसने कहा था-'मियां साहब.. .।'

-'जी साहब।

-'आइए तशरीफ रखिए।'

-‘शुक्रिया।'

-'मियां साहब हमें आपसे शिकायत है।'

-'फरमाइए।'

-'आकर जरा इत्मीनान से बैठें तो अर्ज करें।'

नजीर बढ़े तो भटियारा उठकर खड़ा हो गया। आग्रह पूर्वक उन्हें सिरहाने गाव तकिए के सहारे बैठाया।

-'तो अर्ज करें हुजूर।' भटियारे ने विनयपूर्वक कहा।

-'जी, फरमाइए।'

-'आपकी बहुत सी चीजें हमने सुनी हैं। लेकिन माफ फरमाइए, एक खास चीज पर आपने कुछ नहीं कहा।'

-'यानि?'

-'रोटियां।'

-'ओह।'

-'हमारी शिकायत तो तभी दूर होगी जब आप रोटी जैसी नायाब चीज पर कुछ फरमाएंगे।'

मियां नजीर को बैठे देखकर आसपास कुछ राह चलते भी एकत्रित हो गए थे।

-'तो रोटी पर कहें.. न्'

भटियारे ने उत्तर दिया-'हमारी शिकायत बाजिव हो तो मानिएगा। गैर वाजिब हो तो हमें जवाब दीजिएगा।'

-.'शिकायत वाजिब है।'

-'तब हमारी यह मांग आप पर उधार रही।'

-'उधार रखना हमारी आदत नहीं है.. .सुनिए, रोटियों पर कुछ बन्द सुनिए।'

भटियारा चमत्कृत हुआ।

आस-पास खड़े व्यक्ति उत्सुकता से नजीर की ओर देखने लगे।

नजीर ने मुस्कराकर सभी की ओर देखा। फिर सुनाया-

 

जब आदमी के पेट में जाती हैं रोटियां,

फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियां।

आंखें परी रुखों से लड़ाती हैं रोटियां,

सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियां।

जितने मजे हैं सब ये दिखाती हैं रोटियां।

 

सुनकर भटियारा उछल पड़ा। वाह, वाह, वाद वाही गूंज उठी। नजीर ने अगला बन्द सुनाया -

 

रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो,

मेले की सैर ख्वाहिशें बाग-ओ-चमन न हो।

भूखे गरीब दिन की खुदा से लगन न हो,

सच है कहा किसी ने कि भूखे भजन न हो।

अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियां-

 

वाहवाही के दौर में नजीर उठकर चारपाई पर खड़े हो गए। कल्लन भटियारे के दोनों कंधे थपथपाते हुए कहा--मियां सुनो-

 

अशराफो ने जो अपनी ये जातें छिपाई हैं,

सच पूछिए तो अपनी ये शानें बढ़ाई हे।

कहिए उन्हों की रोटियां किस-किसने खाई हैं।

अशराफ सब में कहिए तो अब नानबाई- है।

जिनकी दुकां से हर कहीं जाती हैं रोटियां-

 

कल्लन भाटियारा खुश हो गया। यह बन्द तो उसी की शान में था। जात का भटियारा होकर सराए तो चलाता नहीं था। चूंकि सिर्फ रोटी की दुकान थी इसलिए सभी उसे कल्लन नानबाई ही कहते थे।

 

इधर वाहवाही हो रही थी।

उधर...!

यकायक नजीर की दृष्टि उठी तो देखा, उधर कोठे के बारजे में जरा सा घूंघट माथे पर डाले एक सुन्दरी खड़ी थी। यही थी मोती...!

यही थे मोती के प्रथम दर्शन।

नजीर तनिक जोर से बोले-'मियां सुनो.. .उधर कोठे की ओर देखकर सुनो।'

सभी की दृष्टि उधर घूम गई।

 

नजीर सुना रहे थे -

रोटी के नाच तो हैं सभी खल्क में पड़े,

कुछ भांड भगीते नहीं ये फिरते नाचते।

ये रंडिया जो नाचे हैं घूंघट को मुंह पै ले,

घूंघट न जानो दोस्तो तुम कभी भी उसे।

इस पर्दे में अपने, यह कमाती हैं रोटियां।

 

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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