बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (7)

पिछले अंक 6 से जारी..

थोड़ी देर आराम करने के बाद पटवारी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठा। उसकी ख़ैरियत जानने के लिए भोला, श्यामल का बाबू, बच्चू और काकी उसकी तरफ़ दौड़े। पटवारी ने हाथ के इशारे से कहा कि वह आराम से है, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, फिर धीरे से सबसे कहा- देखो, ये बाबू बहुत ही नालायक है। इसकी बातों में आप लोग न आना। इससे तो मैं निबट लूंगा। मुझे तो बाबू ने पीटा है- मैं यह कहता हूँ और आप लोगों ने उसे ऐसा करते देखा। लड़कों ने मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की- आप चिंता न करें- कहता वह खाट पर लेट गया। थोड़ी देर सिर थामकर उठने के बाद वह आगे बोला- देखो, आप लोगों से एक विनती करना चाहता हूँ। विनती इसलिए कि हम आप लोगों से वर्षों से जुड़े हैं- दुख-दर्द में साथ-साथ चलते रहे हैं। दुःख ही एक ऐसा मोड़ होता है जहाँ पर ठहर कर लोगों की पहचान होती है कि कौन अपने हैं और कौन पराए। मैं एक ऐसे ही मुकाम पर हूँ जहाँ से मैं आप लोगों को छोड़ना नहीं चाहता। आप के साथ रहना चाहता हूँ, क्योंकि मैं भी आप लोगों की जमात से उठकर थोड़ा आगे बढ़ा हूँ लेकिन हालत आप लोगों जैसी है। -एक क्षण के लिए वह रुका, फिर बोला- भोला से मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ऊपर के अफ़सरानों की नीयत ठीक नहीं, बहुत हरामी हैं वे, उनसे निपटना आसान भी नहीं। अगर आप मुझ पर थोड़ा भी भरोसा करें तो मैं आप लोगों को रास्ता सुझाता जाऊँगा। मैं पूरे मन से आपके साथ रहूँगा। अफ़सरान आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे क्योंकि मामले की कुंजी हमारे हाथ में है...

भोला ने लोगों की तरफ़ देखा जैसा पूछ रहा हो कि क्या किया जाए। जब भीड़ ने कहा कि पटवारी जैसा कह रहे हैं उसमें सार है, हमें उनकी बात पर भरोसा हो रहा है, तो भोला ने सिर हिला दिया, पटवारी से कहा- मालिक, हम ग़रीब-गुर्बा लोग, आप जानते ही हैं, किसी तरह बाल बच्चे पाल रहे हैं। अब आप हमारी नाव खेने वाले हो। जिसमें न्याय की आशा हो, वही करो- हम सब आपके पीछे हैं।

पटवारी अंदर ही अंदर आह्लादित हुआ, बोला- ठीक है, अभी मैं घर जाता हूँ, आप लोग और सोच-विचार लो, जैसा कहोगे, करूँगा। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। भगवान साक्षी है, मैं कुछ गड़बड़ नहीं होने दूँगा- आपके साथ मैं भी सीधी लड़ाई में रहूँगा, मुझ पर सरकार का चाहे जो इल्जाम लगे, मैं उसे झेलूँगा - लेकिन साथ आपका दूँगा। मेरे पास भगवान का दिया काफ़ी है, किसी की चूपड़ी छीनने से मेरा पेट नहीं भरेगा बल्कि अनिष्ट हो जाएगा - इसलिए फिर कहता हूँ कि आप मेरे कहे पर बार-बार सोच लें, मैं शाम को आऊँगा...

भोला बोला - मालिक, साथ में बच्चे भी हैं, खाना-पानी भी होना है, देर हो जाएगी इसलिए आप शाम का विचार बदल दें, अभी थोड़ा रुक लें और हम लोग कह ही चुके हैं, आप जैसा रास्ता सुझाएँगे, हम उस पर चलेंगे।

इस पर सभी एकमत थे।

***

दोपहर को रोटी खाकर जैसे ही कुम्हार खाट पर लेटने को हुआ, मैना सिरहाने झप्प से आ बैठी।

कुम्हार उठ बैठा, बोला - मैना रानी, कहाँ थीं? इतने लोग जमा थे, तुम पता नहीं कहाँ छुपी बैठी रही, बोलीं तक नहीं।

कुम्हारिन बोली - ये नीम में छुपी बैठी सब देख रही थीं कि तुम लोग क्या कर रहे हो। इसने कई बार किट-किट की आवाज़ की थी जैसे इसे जो कुछ भी हो रहा था, जँच नहीं रहा था।

-ऐसा है मैना? - कुम्हार ने पूछा।

-हाँ, वो पटवारी मुझे गड़बड़ लग रहा है - मैना बोली - वो जो भी बात कर रहा था, उसमें खोट था।

-अब क्या करें? किसी न किसी पर भरोसा करना ही होगा।

-भरोसा करो लेकिन विवेक गिरवी रखकर नहीं - मैना बोली- हमारे मैना ने भी ऐसा ही भरोसा किया था और वहीं वह चोट खा गया...

-लेकिन पटवारी... कुम्हार सिर खुजलाने लगा- भरोसे का न होता तो गला मसके जाने पर विरोध तो करता।

-यहीं तो मुझे गड़बड़ दिखता है।

-अपना सिर तक फोड़ लिया उसने -कुम्हार बोला।

-यह तो और बड़ा नाटक था। -मैना बोली।

-हे भगवान! अब तुम्हीं बचाओ हम लोगों को - कुम्हार माथा सहलाता बोला- तो कल सुबह हम लोग तहसीलदार से मिलने जा रहे हैं, उनसे फरियाद करनी है। तो न करें?

-क्यों न करो फरियाद, इसके लिए कौन रोकता है- कुम्हारिन बोली- लेकिन उस नासपीटे से सम्हल कर रहो, कहीं वह हमें डुबो न दे।

कुम्हार मैना की तरफ़ देखने लगा जिसने कुम्हारिन की बात की तसदीक की।

सहसा गोपी बड़े मियां की पीठ पर चढ़े हुए सामने आया, बोला- बाबू, बड़े मियां कह रहे हैं कि मण्डी में ज़ादा मज़े हैं।

-तो वही जाके रह - कुम्हारिन ने आँखें तरेरीं - जब बीसों लट्ठ टूटेंगे पीठ पर तो सारा मज़ा निकल जाएगा।

-चिंता क्यों करता है, समय तो ऐसा आने वाला है कि तुम्हें वहीं रहना पड़ेगा। -कुम्हार धीमी आवाज़ में बोला।

-भगवान न करे ऐसा समय आए -बड़े मियां करुणार्द्र स्वर में बोले - अगर ऐसा होगा तो मैं कहीं और भाग लूँगा।

-मुझे छोड़ जाएगा? - कुम्हार ने कातर भाव से पूछा।

बड़े मियां ने कुम्हार की आँखों में देखा, आँसू छलछला आए थे, बोले- ये तो समय बताएगा भोला! अभी से हम क्या बोलें।

सहसा कुम्हार ने मैना को देखा तो उसके कहे की चिंता में बिंध गया। उसे क्या जवाब दे? पटवारी ने उसे इस तरह घेर लिया है कि अब कोई रास्ता ही नहीं बचा- बेबस हो गया है वह? क्या करे, क्या न करे- उसे कुछ सूझ नहीं रहा था! यकायक उसने गहरी साँस लेते हुए सोचा, जो नसीब में होगा उसे कोई मेट नहीं सकता, वह होकर रहेगा।

और आख़िर में कुम्हार इसी बिन्दु पर आकर ठहर गया। मन में उसने कहा - जो होगा, सो देखा जाएगा, जी दुखाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। हाँ, लड़ने से मैं भाग नहीं रहा...

अंगौछे का तकिया बनाकर वह लेटा तो रात को खाने के लिए भी नहीं उठा।

रात तीन बजे के आस-पास जब कुम्हारिन की नींद टूटी, देखा -कुम्हार आँगन में झाड़ू लगा रहा था। बड़े मियां को चोकर-पानी दे चुका था। कुएँ से पानी भी खैंच चुका था।

कुम्हारिन पास आकर बोली -क्या कर रहे हो तुम?

-दिख नहीं रहा तुम्हें?

-दिख रहा है तभी कह रही हूँ, अपना काम करो जो तुम्हें करना है। मेरा काम करके मुझे शर्मिंदा न करो।

-अरे, ऐसा कुछ भी नहीं। ग़लत मत सोचो, मैं लीला, गुड्डू, श्यामल के बाबू, बच्चू सभी को बोलने जा रहा हूँ। सब तहसील में जुटेंगे। तुम भी आ जाना, गोपी यहाँ खेलता रहेगा बड़े मियां के साथ। मैंने बड़े मियां से कह भी दिया है, वे भी इधर उधर नहीं जाएँगे।

जब मटमैला उजास जगर-जगर कर रहा था, कुम्हार घर से निकला।

***

पटवारी कुम्हार की बस्ती से सीधे बाबू के घर पहुँचा। बाबू उस वक़्त पीढ़े पर बैठा रोटी खा रहा था, थाली पाँव के पंजे पर चढ़ाए। पत्नी स्टोव में हवा भर रही थी।

पटवारी को देखते ही बाबू थाली सरकाता बोला- आओ दादा, आओ, मैं तो सीधे घर भाग आया, मैं तो डर गया था, कहीं...

-फालतू बात मत करो- पटवारी ने उसे बरजा और खाट बिछाता उस पर बैठता बोला- मैं तो तुम से पहले ही कह चुका हूँ कि नालायकी छोड़ो और संकेत समझो। लेकिन तुम... गर्दन हिलाता वह बोला- मैं तुझसे भारी नाराज़ हूँ। पूछो कि क्यों? क्यों इसलिए कि तुझे बात समझ में आ क्यों नहीं रही है। आज ज़माना सीधे लड़ने का है? अरे, आज सीधे मूर्ख लड़ते हैं और जूते खा जाते हैं। हम लोग बाबू आदमी ठहरे- जनता से भला लड़ सकते हैं? हममें बूता ही नहीं, तो ऐसा खेल करो जो अपने हित का तो हो लेकिन दूसरे के हित का न हो- मतलब जनता के हित का तो बिल्कुल नहीं। वह अफ़सरों- बाबुओं के हित का भी हो, लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा अपने हित का, समझे? हमें जनता के हित से क्या लेना-देना? जनता हमें क्या दे रही है? और साली यह गौरमिंट भी हमें क्या दिए दे रही है? तीस-पैंतीस साल की नौकरी में एक प्रोमोशन नहीं- नाम बदल दिया पद का और हो गया प्रोमोशन। ऐसे में हम क्या जनता को देखें, क्या गौरमिंट को, क्या अफ़सरों को। हमें तो अब सिर्फ़ अपने को देखना है। वह काम करना है जो लाभ का हो जिसमें दो पैसे हाथ आएँ। इसी हिसाब से मैं तुझे समझा के ले गया था। और यह बात समझो, जिनकी ज़मीन छिनेगी, वे तो लड़ेंगे, जान देने पर उतारू हो जाएँगे और हों भी क्यों नहीं? हम तुम नहीं होंगे जब हमारी ज़मीन-रोटी छिनेगी? इसलिए जब उन लड़कों ने मेरा गला मसका और मुझे पीटने लग गए तो हमने उसे ग़लत नहीं माना। मार खाके ही यह जतला सकते हैं कि हम तुम्हारे आदमी हैं। ऐसा करके हमने लड़कों को दोषी बनवा दिया। एक अपराध-बोध, एक डर सबमें पैदा हुआ जो कहीं न कहीं मेरे आगे सिर टिकाता है और वही हुआ। मैं सबका हितू बन गया। लोगों ने कमान मेरे हाथों में दे दी। इसलिए तुझे समझा रहा हूँ कि खेल करना सीख। ग़ुस्सा अपने मिजाज़ से निकाल दे। यह बहुत ही ख़राब चीज़ है- हमें मिटा देगी। अब तू तै कर ले कि ग़ुस्सा चाहता है कि धन-दौलत। ग़ुस्सा करने या लड़ने वाला कभी आगे नहीं बढ़ पाता- चुप रहने वाला, ग़मखाने वाला आदमी बदमाशी के बाद भी आगे बढ़ जाता है जबकि ग़ुस्सैल सच्चा होने के बाद भी कहीं का नहीं रहता। उसको साथ के लोग तक छोड़ देते हैं।

थोड़ी देर चुप रहने और ख़ूब मीठी चाय पीने के बाद पटवारी आगे बोला- चल, हो गया लेक्चर। अब इस हिसाब से चल। सब तहसील में कल जुटेंगे और कमान अपने हाथों में होगी।

और वास्तव में कमान पटवारी के हाथ में थी। तहसील में लगने वाली भीड़ को उसने अपने कब्जे में कर लिया था। सबसे पहले वह वहाँ पहुँच गया था। लोगों के आने पर उसने सब कुछ समझा दिया था कि तहसीलदार साहब को अपनी बातें साफ़-साफ़ बता दी जाएँ। अगर तहसीलदार अपनी बातें नहीं सुनेगा तो वह ऊपर कलेक्टर तक जाएगा और कलेक्टर नहीं सुनता है तो उसकी ख़ैर-ख़बर ली जाएगी। सुनेंगे क्यों नहीं? काहे के लिए यहाँ गद्दी पर बैठे हैं? सिर्फ़ राज भोगने के लिए! जनता का काम नहीं करेंगे?

नौ-दस बजे से तेज़ धूप पड़ने लगी थी और तेज़ हवा ने जो गर्द उड़ाई उसने सबकी हालत बिगाड़ दी थी।

कुम्हार बोला- एक तो धूप है और उस पर तेज़ हवा ने तो आँधी ला दी। यहाँ तो खड़ा होना मुश्किल हो रहा है।

पटवारी बोला - क्या किया जाए। मजबूरी है। साहब तो ग्यारह बजे से पहले आएँगे नहीं, तब तक धूप और तेज़ हो जाएगी। गर्द और मामला बिगाड़ देगी। ख़ैर, देखते हैं।

कुम्हार ने तेज़ धूप और बवण्डर के बीच बस्ती के लोगों को देखा। सौ के आस-पास लोग थे जिनमें बच्चे, बूढ़े, जवान औरत-मर्द सब थे। सुबह नौ बजे जब आए थे तो भारी उत्साह था, ज्यों ज्यों धूप तेज़ होती गई और गर्द का बवण्डर गहराने लगा- यह उत्साह मद्धिम पड़ता गया। तहसील में छाँव नाम की चीज़ न थी। जो पेड़ थे वे ठूँठ थे। पीने का पानी भी न था।

ग्यारह बजे के आस-पास ज़ोरों का हल्ला उठा-साहब आ गए लेकिन साहब नहीं आए थे।

बाबू ने कहा- अभी साहब नहीं आए हैं, आने ही वाले हैं।

श्यामल का बाबू बोला - किसी ने कहा कि अंदर बैठे हैं।

पटवारी ने कहा - नहीं, बो तो दूसरे साहब हैं, तहसीलदार साहब अभी नहीं आए हैं, मैं देख आया हूँ।

कुम्हार बोला - उन्हें पता है कि हम लोग मिलना चाहते हैं तो उन्हें समय पर आना चाहिए।

बाबू हँसा।

पटवारी ने कहा - यही तो रोना है भोला! हम लोग तो आजिज़ आ गए हैं इन साहबों से। बैठते ही नहीं सीट पर। जब देखो तब मीटिंग में गए हैं- कलेक्टर के पास। कलेक्टर के पास जाकर पूछो तो पता चलता है कमिश्नर के पास गए हैं। वहाँ जाओ तो पता चलता है कि मंत्री ने उन्हें बुला रखा है। अब भगवान जाने ये कहाँ जाते हैं?

यकायक बूढ़े काका लाठी लेटते पास आए और उन्होंने पूछा कि पानी कहाँ मिलेगा? प्यास के मारे जान निकली जा रही है।

पटवारी ने कहा- काका, यहाँ पानी कहीं नहीं मिलेगा। चाय की दो दूकानें थीं बंद पड़ी हैं, पान वाला भी नहीं दिख रहा है, नहीं, वही पानी दे देता। दो मील जाने पर ही अब पानी मिलेगा, वह भी पानी की बॉटल 15 रु. में।

काका ने आँखें फैला दीं- हे भगवान! यहाँ तो प्यासे मर जाएँगे हम! बच्चा भी पानी माँग रहा है। पता होता तो लेकर आते।

बच्चू बोला- अब देखते जाओ। यहाँ क्या होता है। इससे अच्छा तो रेलवई स्टेशन है जहाँ गंदा ही सही पानी तो मिल जाता है।

भोला ने आँखें तरेरकर कहा- सबको तुम रेलवई से क्यों तौलते हो? रेलवई अपनी जगह है यह अपनी जगह!

-पानी तो मिलना चाहिए- बच्चू चीख के बोला- ऐसा अंधेर तो कहीं नहीं होता। माना तहसील है यहाँ भी जनता आती ही है!

पटवारी ने बात सम्हाली - क्या है, पानी यहाँ शाम को आता है नल से। सीपर शाम को मटकों में भर जाता है, बो अफसरों बाबुओं के लिए होता है, जनता के लिए नहीं, जनता अपना देखे....

-गजब है। बच्चू बोला।

-क्या गजब है? - श्यामल के बाबू ने कहा- तू कोई अफ़सर तो है नहीं कि तेरे लिए पानी सजा के रखा जाए?

-अफ़सर नहीं जनता तो हूँ।

-जनता के लिए जो होना चाहिए बो है। बो तुम्हें दिख रहा है। श्यामल का बाबू हँसा।

-दरअसल हमें इंसान भी नहीं माना जा रहा है- बच्चू ने जब यह कहा तो काका बीच में बोल उठे- अब कही सच्ची बात।

सहसा भीड़ में ज़ोरों का हल्ला मचा। ये लोग दौड़े तो पता चला कि बूढ़ी काकी को चक्कर आ गया था। वे ज़मीन पर पड़ी थीं, बेहोश।

-हम मना कर रहे थे कि मत चल, लेकिन नहीं, बुढ़िया मानने को तैयार नहीं- काका चीखते हुए बोले - अब भुगत।

दो-चार नवयुवकों ने काकी को उठाया और तहसील के बाहर जहाँ गूलर के पेड़ हैं, उनकी छाया में लिटा दिया और उन पर गमछे से हवा करने लगे।

सहसा काकी को होश आ गया।

एक लड़के ने कहा- काकी, तुम यहाँ मरने के लिए काहे चली आईं।

लड़के की बात पर काकी भारी नाराज़ हो गईं। उठकर बैठती जलती आवाज़ में चीखीं- मैं मरने आई हूँ कि तू। नासपीटा आगलगा! कुछ भी बोल रहा है। लूघर लगा दूँगी तेरी पोंद में, हरामी के पिल्ले! किसका छोरा है गिरधर का या बजरंग का?

इस बीच काका आ गए थे। उन्होंने काकी को समझाया- चुप तो रह, यहाँ भी तू लूघर लगाने से बाज नहीं आ रही है...

काकी अपना चूड़ियों से भरा निहायत हँड़ीला हाथ लड़के की तरफ़ उठाती बोलीं- देख रहे हो कमीन को। कुछ भी बके जा रहा है।

शाम को तीन बजे के आस-पास जब तहसीलदार का अता-पता न चला, पटवारी भयंकर ग़ुस्से में भर उठा। उसने तहसीलदार को गंदी गालियाँ दीं और उदास-सा दीवार से टिक कर बैठ गया।

भोला ने कहा- मालिक, आप दुःखी न हों, हम लोग कल जमा हो जाएँगे और कल खाना-पानी लेकर आएँगे। देखते हैं कब तक नहीं आते हैं तहसीलदार साहब।

भोला का कहना था कि सभी लोग एक स्वर में यही बात कहने लग गए। अंत में सबकी यही राय बनी।

धीरे-धीरे सारे लोग चले गए। पटवारी ने यकायक ज़ोरों से हँसते हुए बाबू से कहा- देखा तुमने! एक ही दिन में हवा निकल गई। देखते हैं कब तक ये लोग यहाँ धूप में खड़े होते हैं। एक न एक दिन हम इनका कन्ना ढीला कर देंगे और फिर ये चें बोल जाएँगे। न सब भाग खड़े हुए तो मेरा नाम बलभद्दर पाँड़े नहीं, क्या!!!

वह हँसा और देर तक हँसता रहा।

***

दूसरे दिन बूढ़ी काकी को छोड़कर सभी लोग तहसील में इकट्ठा हो गए। बूढ़ी काकी को बुखार हो गया था, इसलिए वह नहीं आ पाई थीं। हालाँकि वह बुखार में भी चलने की ज़िद कर रही थीं। काका ने उन्हें आने नहीं दिया। लोगों के पास खाना था और पर्याप्त पानी। कुम्हार तो ठण्डे पानी के कई मटके उठा लाया था। देखते हैं, कब तक नहीं आते हैं साहब? सारे लोग जबरदस्त उत्साह में थे। गोपी श्यामल से लेकर नब्बे साल के बूढ़े तक।

पटवारी ने मन में कहा - तुम लोग कुछ भी कर लो जो हम चाहेंगे वही होगा। तहसीलदार साहब बड़े लोगों से मिलेंगे कि कुम्हार-कुलियों से! वह कुटिलता से मुस्कुराया।

बाबू ने धूप से बचते हुए सिर पर गमछा कसते पटवारी से कहा- आज तो भयंकर धूप है। बवण्डर ने तो साँस लेनी मुश्किल कर दी है।

बच्चू, श्यामल का बाबू और भोला भी धूप और बवण्डर की बातें कर रहे थे कि यकायक ये तीनों धीरे-धीरे चलते पटवारी के पास आये। कुम्हार ने कहा- मालिक, आपने तो कहा था कि तहसीलदार साहब अपनी बात सुनेंगे। 12 बजे जरूर आ जाएँगे, लेकिन मालिक, दो ढाई बजने को होंगे, साहब का कहीं अता-पता नहीं...

पटवारी बोला- अरे भाई, उन्हें कोई एक काम तो है नहीं, हज़ारों काम हैं, मंत्री से लेकर कमिश्नर, कलेक्टर तक उन्हें रात-बिरात तलब कर लेते हैं। फिर घण्टों बैठाके रखते हैं, ऐसे में साहब बिचारे क्या करें? कहीं फँस गए होंगे। नहीं, वे सुबह-सुबह आ जाते, अपनी बातें सुनते और ऊपर पहुँचा देते। वैसे हमने सब समझा दिया है, वे ख़ुद सारा मामला जानते हैं। बहुत सज्जन आदमी हैं, लेकिन एक बार आप लोगों का आमना-सामना ज़रूरी है, उसका फरक पड़ता है।

-सही कह रहे हैं मालिक! -भोला बोला- हम तो सब लोगों को इसी बात पे रोके हुए हैं कि साहब बस आने ही वाले हैं, कहीं ऊपरवाले अफ़सरों ने उन्हें अटका लिया होगा लेकिन मालिक, यहाँ लोग मान नहीं रहे हैं, ग़ुस्से में भरते जा रहे हैं कि हमें बेवकूफ बनाया जा रहा है, कह रहे हैं कि साहब नहीं आएँगे, नहीं आएँगे, नहीं आएँगे। और वे बदमाश लड़के तो और भी बदमाशी पे उतारू हो रहे हैं...

-ऐसा है भोला - पटवारी उसके कंधे पर हाथ रखता बोला- तुम लोगों की लड़ाई में मेरा फायदा क्या है- बता दे? मैं तो महज तुम्हारे खातिर यहाँ लू धूप में आ खड़ा हुआ हूँ। अगर तुम्हें लगता है कि मैं कुछ गड़बड़ कर रहा हूँ तो मैं किनारे हो जाता हूँ। अपने को क्या?

-नहीं, नहीं मालिक! भोला ने कहा- साथ के लोग हैं, शिकायत तो करेंगे ही फिर गलत तो हैं नहीं? जायज ही तो कह रहे हैं।

यकायक पीछे से चना ज़ोर गरम बेचने वाला परसादे सामने आकर खड़ा हो गया, बोला- मालिक, हम लोग रोज़ कुआँ खोदते और पानी पीते हैं। एक दिन काम नहीं करेंगे तो रोटी के लाले पड़ जाएँगे। इसलिए आपसे अरदास है कि जल्द से बात हो और हम अपने हीले से लगें।

बाबू ने लाचारगी में कहा - बात तो तुम ठीक कह रहे हो- हम तुम्हारी सबकी तकलीफ़ समझते हैं, कहने की ज़रूरत भी नहीं- लेकिन साहब लोग अपने हाथ में होते तो अभी काम हो जाता- तुम तो देख ही रहे हो, आठ बजे सुबह से हम यहाँ मुँह बाँधे खड़े हैं, अभी तक मुँह में अन्न तक नहीं डाला।

यकायक पटवारी बीच में बोला - आप लोग हमारे पीछे पड़े थे कि कुछ खा लो लेकिन हमने नहीं खाया। अब हम तभी खाएँगे जब साहब से भेंट होगी।

पटवारी की इस बात ने तो लोगों के अंदर और भी भरोसा जगा दिया, इसलिए साँझ घिर रही थी, सब शांत बैठे रहे।

जब साँझ गाढ़ी होने लगी, साहब नहीं आए, लोगों में निराशाजन्य बेचैनी बढ़ने लगी।

पटवारी ने एक युक्ति निकाली। गमछा बिछाकर वह धरने के अंदाज़ में बैठ गया और ज़ोर-ज़ोर से कहने लगा- मैं अब तभी उठूँगा जब साहब आएँगे। मजाक समझ लिया है- सहसा वह बाबू से मुखातिब होता बोला- जा तू, साहब से कह आ कि मैं उनके ख़िलाफ़ अनशन-धरने पर बैठ गया हूँ। अब या तो हमारी बातें सुनें मानें, नहीं मैं उठने वाला नहीं, जान दे दूँगा।

सारे लोग भौचक थे। सभी ने कहा- मालिक, एक-दो दिन और देख लेते हैं फिर साहब अगर नहीं मिलते हैं तो हम लोग ऐसा करेंगे!

एक-दो दिन तो क्या एक सप्ताह तक इंतज़ार किया गया। साहब नहीं आए तो नहीं आए।

इस बीच रोजी-रोटी के चक्कर में बहुतेरे लोग पीछे हटने लगे। उन्होंने आना बंद कर दिया। पन्द्रहवें दिन तो यह हाल रहा कि सिर्फ़ बूढ़ी काकी और भोला रह गए थे। इसके दूसरे दिन तो काकी भी ग़ायब थीं।

पटवारी ने बाबू को रहस्य भरी नज़रों से देखते हुए कहा- देखा, ये होता है खेल! सब लोग किनारे लग गए कि नहीं? रहा विचारा कुम्हार माटी का खिलौना - वह हँसा - इसे भी अब ज़्यादा देर नहीं लगेगी भागने में। चुटकियों में उड़ जाएगा। अब देख तू बलभद्दर पाँड़े का खेल। विश्वास नहीं कर रहा था तू, अब मान गया न उस्ताद को!

भोला के आने पर उसने कहा- भोला, तू कहता था कि लोग अपनी ज़मीन के लिए मर-मिटेंगे। मर-मिट गए न! देख लिया तूने। कोई नहीं है आज की तारीख़ में तेरे साथ। ये हैं अपने लोग! इससे साफ़ है कि ज़मीन इन लोगों की नहीं है। अगर होती तो ये यहाँ से टसकते नहीं, हिलते नहीं। सिर्फ़ ज़मीन तेरी है और तुझे वह मिलेगी, देख लेना। मैं कह रहा हूँ- बलभद्दर पाँड़े, पटवारी! छोटा पटवारी नहीं हूँ मैं, ब्राह्मण हूँ जिसके ख़िलाफ़ चुटैया खोल लेता हूँ उसे मिटा के रहता हूँ। देख, अब मैं यह चुटैया तेरे हक के लिए खोल रहा हूँ- यह तभी बँधेगी जब फ़ैसला तेरे हक़ में होगा- कहकर उसने बड़ी-सी चुटैया खोल दी। यकायक उसने आगे कहा- ये साला तहसीलदार क्या है रे? ऐसे लाले तो मैंने हज़ारों निकाल दिए। यह किस खेत की, किस संडास की उपज है। साले को बो लात खैंच के दूँगा, कलेक्टर-कमिश्नर के आफ़िस में गिरेगा जहाँ इसकी नाल ठुँकी है। बताओ- कहकर पटवारी गहरी चुप्पी में चला गया। जैसे गहन चिंतन-मनन कर रहा हो। फिर यकायक जैसे तंद्रा से जागा हो, बाबू से बोला-हाँ, अब हम कलेक्टर से सीधे मिलेंगे- उन्हीं से अपनी बात कहेंगे - वे ही निपटारा करेंगे- कहकर उसने उस शपथ-पत्र को निकालने को कहा जो कल शाम को उसने नोटरी से बनवाया था। शपथ-पत्र पर कुम्हार के अंगूठे के निशान लेने थे जिसमें दर्ज़ था कि राज़ी-ख़ुशी से वह अपनी ज़मीन छोड़ रहा है। सरकार उस ज़मीन को जिसे चाहे सौंपे। शपथ-पत्र में यह भी दर्ज़ था कि पूरे होशोहवाश के मद्देनज़र यह शपथ-पत्र है- आज की तारीख़ से इस पर हमारा किसी तरह का, कोई मालिकाना हक नहीं रहा।

पटवारी ने भारी विनम्रता से कुम्हार से कहा- यह काग़ज़ उस माटी का माफ़ीनामा है जो तुम पर कर्ज़ की तरह चढ़ा है। अब तुम्हें माटी का पुराना बकाया पैसा नहीं चुकाना होगा- हम इस काग़ज़ से बकाया माफ करवा लाए हैं... हाँ, हाँ इस पर अँगूठा लगाना होगा, अँगूठा! अरे, अरे, तुम्हारा बदन क्यों काँप रहा है- मेरे रहते अगर तुम्हें कुछ होगा तो मैं अपने बदन पर तेज़ाब डाल लूँगा और ज़िन्दगी ख़तम कर लूँगा..

कुम्हार ने शपथ-पत्र पर काँपते हुए अँगूठे का निशान लगा दिया। और पूछा - अब कलेक्टर साहब के पास कब चलना है? कोई साथ न हो मालिक, कोई बात नहीं, मैं तो हूँ।

-बिल्कुल! अब तू ही बचा है। तुझे ही साहब के सामने पेश होना है- अपनी बात रखना। साफ़-साफ़ बोलना। बहुत अच्छे हैं कलेक्टर साहब। सबकी सुनते हैं, समय देते हैं- मैं तेरे को मिलवा दूँगा - सहसा चुप होकर उसने बाबू को आँख मारी और कुम्हार से आगे कहा-भोला, अब हम घर चलते हैं। राशन-पानी नहीं है, पूरे पन्द्रह दिन हो गए। तुम्हारी भाभी परेशान हो रही होंगी। राशन रख दूँ फिर कल मिलेंगे और सारा काम कराएँगे...

सहसा वह तेज़ी से चलता तहसील से बाहर निकल गया।

कुम्हार को सहसा लगा जैसे उसका सर्वस्व लुट गया हो।

***

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(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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