रविवार, 21 दिसंबर 2014

सावित्री काला की कहानी - सन्देश

"सन्देश "

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उस दिन एक कार्यक्रम में नमिता मिली ,वह मेरी बचपन की सहेली है ,हम एक दूसरे से जब भी मिलते है खूब दिल खोल कर बातें करते है।

अगली पिछली सभी यादों को ताजा करके खूब खुश होते हैं अच्छा लगता है। इस बार हम कई वर्षों बाद मिले। नमिता मुझे पकड़ कर बोली -अरे शुचिता तू वकील है ,

मैंने कहा तुझे कैसे पता चला ,क्या पति से झगड़ा तो नहीं कर दिया।

अरे नहीं यार वह मेरे पास आकर बोली ,राजू मेरा छोटा भाई कह रहा था। शुचि दीदी को उसने कोर्ट में काला कोट ,पहने वकीलों की गैलरी में फोटो खिंचाते देखा था।

मैने कहा तूने मेरी नेम प्लेट नहीं देखी रौनक गुप्ता जी के केबिन के बाहर लगी है

 

प्लेट लगाने से क्या होता है ,तू प्रैक्टिस क्यों नहीं करती।

मैने उसे कहा ,करी थी कुछ दिन ,करीब तीन महीने।

फिर क्या हुआ।

बस मन नहीं लगा यहाँ के वातावरण में।

क्यों ,उसने उत्सुकता से पूछा।

बस ,ऐसे ही ,तुझे पता है मैं जीवन में प्राचार्य रह चुकी हूँ। वहां कोई भी बिना पूछे मेरे केबिन में नहीं आ सकता था।

यहाँ तो हर कोई मुंह उठाये ,मुंह में पान चबाते हुए अख़बार पढने के बहाने मेरे बस्ते पर चला आता था ,मुझे अच्छा नहीं लगता था ,बस इसीलिए नहीं कर पाई प्रैक्टिस।

तू भी यार ,अरे दो चार दोस्त ही बना लेती ,घर में अकेली बैठी रहती है समय अच्छा कट जाता।

मेरे पास इतना काम है कि दोस्ती के लिए समय ही कहाँ मिल पाता है ,कभी जीवन में एक दोस्त बना था ,उसने साथ नहीं दिया फिर शादी हो गयी। दोस्त बनाने का समय ही कहाँ मिल पाया ,घर ग्रहस्ती ,बचे स्कूल में ही सारा जीवन बीत गया पता ही नहीं चला।

फिर वकालत क्यों पास क़ी।

जीवन में कानून का ज्ञान जरूर होना चाहिए।

क्यों।

कोई बेवकूफ न बना सके।

बड़ी समझदार हो गयी है मेरी सहेली।

परिस्थितियों ने बना दिया है

 

नमिता आगे बोली ,शुचि तूने अकेले ही वर्षों कई शहरों में नौकरी की है ,कोई तो मिला होगा दोस्ती के लायक।

अरे मिले तो बहुत पर किसी से दोस्ती करने का मन ही नहीं हुआ। बच्चों की देख रेख में समय कब बीत गया

पता ही नहीं लगा।

तूने तो मकान भी बड़ी जल्दी बना लिया था।

वो तो मज़बूरी थी। क्यों कि कहीं भी ठिकाना नहीं था ,न मायके में न ससुराल में। दोनों ही किराये में रहते थे। जगह क़ी बड़ी दिक्कत होती थी। माँ पिताजी ने मेरे मकान बनाने के बाद ही अपना मकान बनाया।

तेरे मकान में ही रह लेते।

मेरे पति के स्वभाव के कारण।

अच्छा तुझे कभी उस दोस्त क़ी याद नहीं आई।

तुझे मेरी याद आती है न ,मैंने नमिता से पूछा।

बहुत ,बहुत। नमिता मेरे पास आकर बोली।

जब तू मुझे नहीं भूली तो मैं उसे कैसे भूल सकती हूँ।

बड़ी पक्की पकड़ है भई नमिता हँसते हुए बोली।

तुझे अब पता चला मैंने कहा।

अरे मैं तो पहले से ही जानती थी तुम्हारी दोस्ती को।

फिर पूछा क्यों ,मैंने उसे कहा।

बस मन किया पूछ लिया ,तुझे बुरा लगा क्या।

अरे नहीं मुझे तेरी किसी बात का बुरा नहीं लगता।

 

बड़ी देर तक हम दोनों बतियाते रहे यह भी भूल गए की हम पूजा में आये हुए हैं जब खाने का समय हुवा तब सबको हमारी याद आई। किसी ने कहा छत पर होंगी किसी ने कहा पिछवाड़े बाग़ में होंगीं।

दीदी ने आवाज लगाई तब हम गोदाम की सीढ़ियों से उतर कर आये। सबने पूछने लगे तुम्हारी अभी भी वही आदत है। नमिता बोली कैसे छूट सकती है।

हमने पूजा की और खाने की टेबल पर कुर्सी खींच कर पास पास बैठ कर फिर बातें करने लगे।

दीदी ने पूछा तुम्हारी बातों का भंडार अभी खत्म नहीं हुआ अभी।

नमिता ने जवाब दिया कैसे हो सकता है ,पांच साल बाद मिले हैं पांच घंटे तो लगेंगे ही। उसकी बात सुन कर सब हंसने लगे। तभी दीनू को आता देख मैने इशारे से नमिता को चुप रहने को कहा। दीनू नमिता की बगल में कुर्सी खींच कर बैठ गया। नमिता ने एक बार शरारत भरी नजरों से मेरी ओर देखा और दीनू के साथ बतियाने लगी।

मैं और दीदी खाना खाकर अंदर के कमरे में चले गये वहां सब एल्बम देख रहे थे ,हम भी देखने लगे उस में हमारी भी बहुत-सी फोटो थीं।

तभी नमिता आई और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले जाने लगी ,दीदी बोली

जल्दी आना हमें कहीं और भी जाना है।

हम अभी आते है कह कर मैं अमिता के साथ चल दी।

हम अपनी पुरानी जगह पर पहुंचे ही थे की अमिता फिर शुरू हो गई।

बोली तू वहां किसके साथ बात कर रही थी।

मैने कहा मै तो वहां सबसे ही बात कर रही थी ,तू किसकी बात कर रही है।

 

अरे वह लाल टोपी वाला जो खाना खिलाते हुए बार बार तुझे ही पूछ रहा था। मैंने तो उसे नहीं पहिचाना ,कौन था वह ,किसका बेटा था।

अरे ,वह तो रमन था ,कामिनी का बेटा ,|

कौन कामिनी , अरे तू कामिनी को नहीं जानती ,जिसकी शादी में तुम सब लोग दिनू के गांव गए थे।

अरे मैं तो सचमुच ही भूल गई कामिनी को ,कैसी है वह। उसका बेटा दिनू के साथ आया होगा ,कामिनी नहीं आई,

मैने कहा ,उसका बेटा कह रहा था उसके पापा बहुत बीमार हैं ,इस लिए नहीं आ पाई।

पर तू उसे अपनी पुस्तक दे कर भी तो कुछ कह रही थी न।

हाँ मैने रमन से कहा कि अपनी ममी को मेरी नमस्ते कहना ,तथा यह भी कहना कि मै तुम्हारी भाभी तो नहीं बन पाई ,पर आज भी मैं तुम्हारे भाई से उतना ही प्यार व सम्मान करती हूँ जितना पचास वर्ष पहिले करती थी।

उसने क्या कहा ,वह हंस कर बोला मैं कह दूंगा। बड़ा स्मार्ट बेटा है कामिनी का।

हाँ है तो मैंने कहा।

वह बोली ,उससे क्यों कहा दीनू भी तो आया था ,उसी से अपने मन की बात कह देती।

उसे तो दस वर्ष पहिले की कह चुकी हूँ ,|जब हम वर्षों बाद मिले थे।

अच्छा तूने मुझे नहीं बताया।

बता तो रही हूँ तू तो अपनी ही अपनी गाये जा रही है ,मुझे बोलने का मौका दे कहाँ रही है।

अच्छा तूने रमन के पास खबर क्यों भेजी।

ताकि दीनू की पत्नी तक बात पहुंच जाय।

वह घर मैं कलह करेगी।

 

वह तो रोज ही करती है ,हमारे पवित्र प्रेम को नहीं समझ पाई अब तक ,वर्षों दूर रह कर भी हम आज एक दूसरे के इतने करीब हैं कि जब आवाज लगाई मिलगये। और वह दोनों एक छत के नीचे वर्षों से रह कर भी एक दूसरे क़ी भावनाओं को नहीं समझ पाए।

इसमें दीनू का भी तो कसूर है क़ि वर्षों बीतने पर भी वह अपनी पत्नी को अपने विश्वास में नहीं ले पाया।

वह कहता है बहुत कोशिश की, वह समझती ही नहीं।

पर तूने कामिनी के बेटे से क्यों कहा ,इससे क्या होगा। क्या वह कलह नहीं करेगी। तुझे क्या मिलेगा।

मन की शांति।

वो कैसे ,

अपना सन्देश वहां तक पहुंच जायेगा।

अरे मन की शांति के लिए तू खुद ही क्यों नहीं चली गयी उसके पास। मिल बैठ कर सारी बातें करके आ जाती।

हाँ तूने सुझाव तो अच्छा दिया है ,पर मैने सोचा जब चालीस वर्ष से वह दीनू की बात न सुन पाई न समझ पाई ,तो मेरी बात उसके दिमाग में कहाँ आ पायेगी। वह जब अपने पति को ही नहीं जान पाई की वह तन मन धन, से उसकी हर जरुरत पूरी करता आ रहा है। एक आदर्श पति की तरह ,फिर भी वह उस पर शक करती है।

जरा कहीं आने में देर हो जाय तो सी .आई. डी. .की तरह पेशी लेती है।

 

फिर भी दीनू तुम्हारे घर आता रहता है।

आता तो है।

फिर तू क्या चाहती है।

मैं अपने पवित्र प्रेम तथा दोस्ती से उसे अवगत कराना चाहती हूँ बस। मेरा सन्देश कामिनी के द्वारा ही उस तक पहुँच सकता था ,मैने तो बस कोशिश ही की है ,देखो उस पर क्या प्रतिक्रिया होती है।

वह कलह करेगी।

उसकी तू क्यों चिंता करती है।

दीनू को बुरा लगेगा।

 

वह तो वर्षों से इसका आदि हो चुका है। मेरे लिए एक दिन और झेल लेगा। मेरा सन्देश तो उस तक पहुंचे तो सही।

बड़ी दिल फ़ेंक आशिक है।

तुझे आज पता चला।

अरे मै तो वर्षों से तुझे जानती हूँ।

तभी दीदी ने आवाज दी हम दोनों कल कहाँ मिलना है एक दूसरे को बता कर मैं दीदी के साथ चल दी। दीनू ने मुझे जाते हुए देखा ,दीदी को नमस्ते की मुझ से हाथ मिलाया और कामिनी के बेटे के साथ अपनी गाड़ी की ओर चल दिया।

 

नमिता ने भी उसे बॉय बोला। उसे अभी रुकना था। उसे लेने उसके बेटे ने ऑफिस से आना था। वह रुक गई ,वरना हम ही उसे उसके घर छोड़ देते।

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