गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

दामोदर लाल जांगिड का व्यंग्य - क्या आपके घर में टॉयलेट है?

क्या आपके घर में

अगर आपको पता नहीं है और आप पंचायत के चुनाव लड़ने के ख्वाहिशमंद हैं तो कहीं से अब पता कर लें कि इस बार पंचायत के पंच सरपंच के चुनाव वो ही लड़ सकेंगे जिनके घरों में शौचालय होंगे यानि कि अगर घर में टॉयलेट नहीं तो पंचायत भी नहीं,फिर जिसके घर में टॉयलेट नहीं है तो वो कहीं बाहर शौच करो और अपने घर में ही पंचायती करो,पंचायत भवन में जाकर नहीं। इसे आप हमेशा की तरह यूं ही मत लेना कि सरकारी घोषणाएं हैं,होती ही रहती है,किसी का क्या बिगड़ जायेगा। इस बार सरकार इस प्रावधान को लागू करने के लिए पंचायतीराज में संशोधित अध्यादेश जारी करने पर आमादा हैं, यहां तक कि इस अध्यादेश को कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी हैं,विधि विभाग ने विधिवत इसका अध्ययन कर लिया हैं और आगे भेजने वाला हैं। वैसे तो सारा काम गुप चुप ही हुआ था मगर न जाने कैसे खबरों में आ गया। अगर गौर किया जाये तो काफी हद तक ठीक भी हैं कि जिनको पंचायती के चुनाव लड़ने हैं उनको समय रहते मालूम हो गया और शौचालय बनवा लेने के लिए पर्याप्त समय तो मिल ही गया,रही बात शौचालय बनवाने के लिए धन की व्यवस्था की,जिसकी वो खुद जाने,यह उसकी अपनी समस्या है,पंचायत के चुनाव उसको लड़ने हैं,इससे सराकर को क्या लेना देना।

कई बार तो हमें किसी बात को बिना समझे ही मजबूरन समझ जाने की मुद्रा में गर्दन हिला कर संकेत यह सोच कर देना पड़ता हैं कि हमारे अलावा सारे लोग इस बात को समझ गए हैं,अगर अब हमने समझ जाने की घोषणा में जरा सी भी देर की तो लोग हमें नासमझ नहीं तो मंद बुद्धि तो जरूर समझ लेंगे। ठीक उसी तरह देखा जाये तो ये मामला भी लगता तो सीधा सा हैं मगर हैं जरा देरी से समझ में वाला हैं। पंचायत के चुनाव लड़ने वाले के पास चाहे और कुछ भी नहीं हों मगर एक घर में एक शौचालय होना ही चाहिए। इस बात से उसके चुनाव लड़ने पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके पास घर,रोटी,कपड़ा और बाकी जरूरत की सारी चीजें उपलब्ध हैं भी अथवा नहीं। अब शौचालय भी आदमी की योग्यता के मुल्यांकन का मापदण्ड बन गया हैं। जिसके घर में शौचालय हैं वो ही पंचायत में बैठ कर ठीक से सच का पक्ष ले सकता हैं और पीड़ित पक्ष के साथ न्याय कर सकता हैं,नरेगा के कार्यों में वित्तीय गड़बड़ियां नहीं कर सकता हैं आदि आदि।

हमने तो यही पढ़ा है कि हमारे ऋषि मुनि भी दिशा मुक्त होने जंगल में ही जाते थे उनके घर ही नहीं होता था। एक कुटिया जिसे आश्रम कहते थे,बस उसमें रहते थे उनके पास शौचालय नहीं होता था। हमारी भी आदि काल से यही परिपाटी रही है कि हम घर में बैठ कर खाना खाओ और बाहर जा कर मल त्याग करो,मगर अब जो आधुनिक संस्कृति आई है वो इसका उल्टा क्रम ले कर आई है कि बाहर होटल में खाना खाओ और घर के अन्दर शौचालय में मल विसर्जन करो। हमारे गांवों में तो अभी भी लोग सुबह जल्दी उठ कर अपने अपने खेतों में जाकर ही नित्य क्रम करते हैं,उनके तो मुफ्त में मोर्निंग वाक हो जाती हैं । हां इतना जरूर है वो सुबह अपने साथ कोई कुत्ता नहीं ले कर जाते बल्कि उनके सर पर गोबर की तगारी और हाथ में अपनी पालतू गाय या बकरी की रस्सी होती हैं। जिस तरह से गांवों वालों को खेतों की सुविधा हैं वैसे ही जिन शहरों,कस्बों से हो कर रेल लाइनें गुजरती हैं उनकी वहां के वाशिंदों को दोहरी सहूलियतें हासिल हैं।उनको सस्ती और फ्री की यात्रा की सुविधा तो है ही इसके साथ साथ रेल की पटरियों के दोनों तरफ जो बेकार जगह पड़ी होती हैं उसका इस्तेमाल वो शौच निवृति के लिए भी तो धड़ल्ले से करते हैं।

यूं तो सरकार ने पंचायतीराज में संशोधित कर इस प्रावधान को लागू कर भी दिया तो भी घबराने की कोई बात नहीं,क्यों कि सुनने में आ रहा हैं कि सिर्फ हलफनामा देने मात्र से ही काम चल जायेगा, टॉयलेट होने के भौतिक सत्यापन की कोई शर्त नहीं हैं। अगर किसी पंचायत के पंच सरपंच के चुनाव लड़ने वाले ने अपने धर के किसी कोने में चौखट पर किंवाड़ खड़ा कर दिया या यूं ही पर्दा ही लटका कर ऊपर लिख दिया ‘शौचालय’ तो ऐसे में उस किवाड़ या परदे को हटा कर अन्दर झांकने की किसी की हिम्मत ही नहीं होगी कि यहां शौचालय है भी कि नहीं। वैसे भी हमारे यहां झूठे हलफनामे उठाना कोई नयी बात तो है नहीं,लोगों को अक्सर चुनाव लड़ने से पूर्व और चुनाव जीत जाने के बाद झूठे हलफनामे उठाते हुए देखा हैं। वैसे सरकार को तो पता ही क्या कि कौन कहां खुले में बैठ कर शौच करते हैं,क्यों कि सरकार तो हवाई जहाज से सफ़र करती हैं जरूर कोई सरकार के कारकून ने ही कोई रिपोर्ट भेजी होगी,और सराकर को अच्छे भले पंचायतीराज अधिनियम में संशोधित करना पड़ रहा हैं। वैसे होना इसका उल्टा चहिये था कि जिसके घर में फ्लैट नुमा बड़ा सा शौचालय हैं या जिसके पास जरूरत से ज्यादा बंगले हैं और कारें है वो कोई भी चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होंगे। किसी के घर में एक शौचालय ही नहीं वो क्या खाक कोई चुनाव लड़ेगा,पता हैं चुनावों में कितना खर्चा करना पड़ता हैं?

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