शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सविता मिश्रा की कविताएँ

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आरजू
++++++
ओ धुरजटी तेरी धूरा मैं,
सर-माथे अपने चढाऊं सदा।
धूम्रवर्ण तेरा एक टक निहारती रहूँ,
तेरा ही स्मरण करती रहूं सर्वदा।-
फिर भी तू मेरा धुरीण क्यों ना बना,
ध्वंसी बनी रही दुनिया हमारी।
विधु सजाये शीस पर बैठा रहता,
हमें सविता की तपन में तपाता।
विदारण को तत्पर रही दुनिया,
फिर भी तेरी ही ध्यान में निमग्न रही यह गुड़िया।
पर तू धृति रमाये रहा अधिष्ठित,
नहीं किया तूने हमें कही प्रतिष्ठित।
फिर -भी तेरी पूजा कर करू मैं यह विनती,
"सविता" की तरह मुझ सविता की भी कही तो हो गिनती।

१४/५/२०१२

बादल गरजता है
===========

बादल गरजता है !
मेरे दिमाग में खटकता है,
मुझे लगता है ....
धमकाता है यह धरती को,
अपनी औकात बतलाता है,
इतनी विशाल धरती को
एक धीमी सी गर्जना से
चाहता है तोड़ देना
नहीं जानता कि यह धरती,
धीमी सी गर्जना से नहीं टूटेगी,
बादल धमकाने के बाद
अमल भी करता है,
पर नहीं तोड़ पाता है वह धरती को।

गिराता है बिजली!
हिमशिला गिराता है,
कुछ लकीरें अवश्य पड़ती हैं,
पर यह धरती उसे
स्वयं में छिपा लेती है,
अपने को टूटने से बचा लेती है।
बादल फिर आँसू बहाने लगता है,
उसी को लोग बरसात कहते है,
पर लोग क्या जानें कि
यह बरसात नहीं !
बल्कि बादल रोता है
अपनी हार पर।
धरती उसके आँसुओं को
अपने में समेट लेती है,
फिर उसी आँसुओं से
बादल का पेट भरती है।

यही चक्कर हर बार चलता है,
बादल अपना कर्म करता है,
धरती अपना कर्म करती है,
बादल गरजता है!!
मेरे दिमाग में खटकता है,
शायद धमकाता है धरती को
अपनी औकात बतलाता है।।
२३/८/१९८९


जैसे को तैसा
++++++++++++
दूजे की बहन-बेटी के साथ की,
हंसी-ठिठोली,
अपनी रखे छुपाय।
हद तब होई जाय,
जब फूहड़ता-पन पर,
उतर आय।
अपनी को कोई भी बोले,
अतिशीघ्र खून खौली जाय।
दूजे की बहन लगे देखने,
आँख टिकाय,
अपनी को रखे,
दूजो से बचाय।
कब तक ऐसा होए,
कभी तो सेर-पर-सवा-सेर,
मिली ही जाये।
तब मुंह ताकत बैठे रहे,
अपनी गलती पर खूब,
पछताय।
हाथ तब सर पर दे मारे,
जब जैसे को तैसा,
कही मिली जाय।

 

बिसात क्या है मेरी
+++++++++++++++
मौत के आगोश में समाते- समाते,
ना जाने क्यों ठहर सी जाती हूँ मैं।
प्यार के आगोश में सिमटते-सिमटते,
ना जाने क्यों बिखर सी जाती हूँ मैं।
सारी खुशियां अपनी उन पर लुटाते-लुटाते,
ना जाने क्यों अकड़ सी जाती हूँ मैं।
अपने दिल के घाव दिखाते-दिखाते,
ना जाने क्यों बिफर सी जाती हूँ मैं।
अपने ही जख्मों पर मरहम लगाते-लगाते,
ना जाने क्यों टूट-सी जाती हूँ मैं।
पुराने ही घावों को कुरेदते-कुरेदते,
ना जाने क्यों नासूर बना देती हूँ मैं।
नैनन अश्रु मोती बहाते-बहाते,
अब प्रस्तर सी खुद को पाती हूँ मैं।
सारे जुल्मों-सितम सहते-सहते,
ना जाने क्यों विद्रोह पर उतर आती हूँ मैं।
खुशियों के समुद्र में गोता लगाते-लगाते,
ना जाने क्यों कमजोर सी हो जाती हूँ मैं।
चेहरे से गम को छुपाते-छुपाते,
ना जाने क्यों भावहीन हो गयी हूँ मैं।
देख आईना अपने को पहचानते-पहचानते,
ना जाने क्यों अपने को विवश सी पाती हूँ मैं।
कमियां अपनी गिनाते-गिनाते,
अपने से ही रूबरू नहीं हो पाती हूँ मैं।
सभी जिम्मेदारी का बोझ उठाते-उठाते,
ना जाने क्यों थक सी जाती हूँ मैं।
बिसात क्या है?मेरी हूँ कौन मैं ?जानते-जानते,
अपनी ही औकात समझ नहीं पाती हूँ मैं।

 

जख्म जो हरे हैं
++++++++++++

जख्म जो हरे हैं
उन पर मिट्टी डाल रही हूँ
पुराने जख्मों को याद कर
आँसू बहा रही हूँ।
नये जख्म अभी अभी हुए है
अतः दर्द थोड़ा कम है
जब थोड़ा समय की परत पड़ेगी
कोई ऐसी घटना घटेगी
तब यही जख्म पुनः याद आयेगें।
तब हम इस जख्म पर
फिर से आँसू बहायेंगे
अभी जो आँसू निकल रहे हैं
वह महज आँखों से बह रहे है।
कुछ समय पश्चात् इसी जख्म पर
दिल से अश्रु निकलेंगे
उनमें वेदना,बेचैनी,अकुलाहट होगी
फिर तो बरबस ही अश्रु छलक जायेंगे।
अभी तो बस लोगों की सहानुभूति का असर है
जो दिल नहीं आँखों से बह रहा है। सविता मिश्रा


इंसानियत जगा रहे हैं
++++++++++++++

हमें हैरान-परेशान देख
एक व्यक्ति ने हमसे पूछा
क्या खोज रही है आप
हमने कहा ही था
कि इंसानियत
वह यह सुन सकपकाया
हैरान हुआ
हमें यू तरेर कर देखा
जैसे अभी हमला कर देगा
थोडा शक भी उसकी निगाहों में
वह हमें शायद पागल समझ बैठा
बोला बड़ी अजीब हो !
यहाँ इंसानों कि भीड़ है भरी
और तुम्हें इंसानियत ही नहीं दिखी ?

हमने कहा नहीं !नहीं दिखी
उसके मुख से सहसा पागल शब्द निकला
और वह बड़बड़ाता हुआ
मुड़-मुड़कर बार-बार
अजीब निगाहों से
देखता हुआ चला गया।

क्या आपको भी हम पागल दिखते हैं ?
आप ही बताओ ?
क्या किसी असहाय को
असहाय ही छोड़ चल देना
इंसानियत होती है ?
क्या सड़क पर घिसटता हुआ
आदमी को देख
मुंह फेर चल देना इंसानियत होती है ?
क्या भीख मांगते इंसानों के मुंह पर ही
अशब्द कह
बिना कुछ दिए चल देना
इंसानियत होती है ?
क्या मदद के लिए पुकार रहे
कातर ध्वनि को अनसुनी कर देना
इंसानियत होती है ?

आप ही बता दो क्या इंसान ऐसे होते हैं
अब तो हम हतप्रभ है यह देख कि
हम जिसे बाहर खोजना चाह रहे थे
वह तो हम
अपने अंदर ही नहीं पा रहे थे
अतः थक हार कर बैठ गए हैं
और अब खुद में ही थोड़ी
इंसानियत जगा रहे है।

तोल मोल के बोल
++++++++++++++

तोल मोल के बोल,
शब्द बड़े है अनमोल।
किसी का दिल दुखाये,
शब्द बोलो नहीं ऐसे तैसे।
शब्द जो घाव कर जाये,
बोलो नहीं जो मलाल लग जाये।
सामने वाला दुखित हो जाये,
शब्द बाण से विचलित हो जाये।
तीर तलवार के भर जाते है घाव,
शब्दों के घाव नासूर बन जाते हैं।
समय- समय पर,
दिल को उद्धेलित करते हैं,
घृणा-इर्ष्या, बदले की आग को
प्रज्जवलित करते है।
शब्द कहो नहीं ऐसे, जिससे
किसी को घृणा हो जाये,
कर्णो में पड़ते ही शब्द
ह्रदय तार-तार हो जावे,
बोलो ऐसे जो कर्ण प्रिय हो,
हृदय भी शब्द -सार से प्रफुल्लित हो।।


क्रोध ना हम पर किया करो
++++++++++++++++++++
यूँ क्रोध ना हम पर किया करो,
मैं रोटी हूँ तो थोड़ा रोने दो,
मुझ पर कुछ रहम करो,
यू क्रोध ना हम पर किया करो।

तुम्हें जो करना है करो,
कहा मना कर रहे है हम,
बस थोड़ा हमारा ख्याल करो,
यूँ क्रोध ना हम पर किया करो।

कौन कहता है सुनो हमारी,
पर थोड़ी तो अहमियत दो हमें,
यूँ हमें बेजार ना करो,
यूँ क्रोध ना हम पर किया करो।

छोटी-छोटी बातों पर,
यूँ तुम तकरार ना करो,
थोड़ा तो प्यार से रहो,
यूँ क्रोध ना हम पर किया करो।

बढ़ते जाते हो आगे ही आगे,
थोड़ा तो मेरा भी इंतज़ार करो,
रास्ते पर यू ना छोड़ा करो,
यूँ ना क्रोध हम पर किया करो।

खिलखिलाने पर हमारे तुमने,
पाबंदियां है लगा दी,
पर थोड़ा तो मुस्कराने दो,
यूँ क्रोध ना हम पर किया करो।

मेरी हर बात पर अब,
तुझे होती है चुभन अगर,
सीख ना लू चुप रहना जब तक,
तब तक क्रोध ना हम किया करो।

 

+++ मेरी कलम+++
मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही हमें कुछ तो बना दिया।
जो भाव थे छुपे दिल की गहराइयों में,
तूने ही उसे शब्दों के जाल में बुना।
भावों को मेरे शब्द दिया,
मूक भावना को उसका अर्थ दिया।
स्वयं भी थी मूक पर कागज पर आते ही,
विद्रोही,पीड़ित बनी एवं हमें भी,
तूने कुछ यूँ ही बना दिया।
तूने मुझे ताकत दी हिम्मत दी,
करू कैसे धन्यवाद तेरा ओ मेरी लेखनी।
कलम थी एक आम तू भी मेरी तरह,
पर तूने ही हमें आम से खास बना दिया।
तू भी अब मेरे लिए बहुत ही खास है,
क्योंकि तेरे ही तो सहारे मैं अल्पज्ञ से,
सर्वज्ञ्य की ओर बढ़ने की कोशिश में हूँ।
तू भी मेरा साथ देना ओ मेरी कलम,
मेरी मूक भावना को आवाज देना ओ मेरी कलम।
मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही हमें सब कुछ बना दिया।

८/५/२०१२

++क्यों रहे मौन हम ++

क्यों मौन है हम,
सब चीखते-चिल्लाते रहे,
पर हम मौन ही रहे खड़े।
क्या बोले कोई सुनता ही नहीं,
अतः हम मौन ही रहे खड़े।
सामने ही अपराध कर निकल गए,
हम ठगे मौन ही रहे खड़े।
व्यापारी ने की धांधली देखे हम,
फिर भी मौन ही रहे खड़े।
हर चीज में तो है हेरा-फेरी क्या करे,
चुप रहने में ही भलाई समझ हम,
मौन ही रहे खड़े।
हमारी ही चीज ले हमको ही आँख दिखलाने लगे,
फिर भी हम !हम मौन ही रहे खड़े।
हमें लगा मौन रहना हमारा बचाव है पर,
लोग तो हमारे मौन को कमजोरी समझ बैठे।
कैसे रहते मौन तब जब हमारी ही,
इज्जत को लोग सरेआम उछालने बैठे।
चुप रह आज तक जो सहते रहे,
आज चीखकर सारा गुबार फुट पड़ा।
मौन जो हमारी कमजोरी समझी थी दूजों ने,
आज हम उसी को अपनी ताकत बना बैठे।
अब सबको देते है सीख,
मौन रहो पर एक हद तक,
नहीं सहो किसी की अहेतुक बात,
कहो आखिर क्यों रहे मौन हम।

 


 

 

सविता मिश्रा
Khandari,२८२००२
शिक्षा ...बैचलर आफ आर्ट ...(हिंदी,राजनीति शास्त्र, इतिहास)
अभिरुचि ....शब्दों का जाल बुनना, नयी चीजें सीखना, सपने देखना
'
​मेरी अनुभूति' प्रकाशित पहला संयुक्त काव्यसंग्रह

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