शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

नन्दलाल भारती की कहानी - कर्जदार

डॉ.नन्दलाल भारती

कवि,कहानीकार,उपन्यासकार चलितवार्ता-09753081066/

एम.ए. । समाजशास्त्र । एल.एल.बी. । आनर्स । 09589611467

पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट (PGDHRD)

 

कर्जदार/कहानी

माघ की ठण्ड से ठिठुरते हुए दुखीराम ने शहर से आये मझले जमींदार युद्धनाथ बाबू को सलाम ठोंका।

युद्धनाथ बाबू - कहां से आ रहे हो दुखीराम।

गेहूं की सिचाई करके दुखीराम बोला।

युद्धनाथ बाबू-बहुत देर कर दिये पानी देने में। ठण्ड के मारे कांप रहे हो तनिक आग ताप लो।

दुखीराम-बाबू मुझ गरीब का रोज का यही हाल है। भोर में आता हूं । रात को जाता हूं । ससुरी नींद भी नहीं पूरी होती,तब तक मुर्गा बोलने लगते है हैं। दतुवन कुल्ला जल्दी जल्दी करता हूं फिर भागकर हवेली आता हूं। इसके बाद भी बड़े जमींदार बोलते है,दिन बीत गया कोई काम नहीं हुआ। बताओ बाबू अब कैसे काम करूं। दिन भर कि दो सेर मजदूरी मिलती है इसके बावजूद भी जान दे कर खट रहा हूं। इतनी कम मजदूरी में घर परिवार का कैसे खर्च चलेगा सोच-सोच कर पागल हुए जा रहा हूं। चारों बिटिया ब्याह लायक हो गयी है। बेटवा बारहवीं में पढ़ रहा है। भला हो सरकार का वजीफा से तनिक मदद मिल जाती है। वजीफा के भरोसे नगीना बेटवा पढ़ रहा है,वरना मुझ बंधुआ मजदूर की कहा औकात थी कि बेटवा की पढ़ाई के बारे में सोचता।

युद्धनाथ बाबू-दुखीराम ये हवेली तुम्हारी कर्जदार है। मुझे याद है जब मैं शहर पढता था तब तुम मेरा सामान सिर पर लादकर कोसो दूर पैदल चलकर बस में बैठाने जाते थे । याद है दुखीराम मुझे जब आता था तो घण्टों भूखे प्यासे सड़क किनारे मेरी बाट जोहते रहते थे। तुमने हवेली को अपना घर समझा है दुखीराम मैं जानता हूं । तुम्हारी बूढियां की गोद में हवेली के सभी बच्चे आंख खोले हैं। बेटवा को बी.ए. तक पढाओ सरकारी नौकरी तो मिल जायेगी अभी से फिक्र ना करो।

दुखीराम-बाबू सरकारी नौकरी के लिये तो घूस बहुत लगता है सुना हूं । मैं घूस की रकम कहां से लाकर दूंगा । यहां तो भर पेट रोटी और कपड़े के लाले पड़े रहते है। बेटवा की आठ आना फीस महीने की लगती है,वही देने में दिन में तारे दिखने लगते है। बाबू गरीब की जिन्दगी तेजाब की दरिया होती है। पल -पल मरना पड़ता हे।

युद्धनाथ बाबू-तुम्हारा बेटवा होशियार है,उसे नौकरी मिल जायेगी अभी से इतनी चिन्ता क्यों कर रहे हो,उसको पढ़ाओ। सूकर,मुर्गी भी पाल रखे हो सुना है तुम्हारी झोपड़ी के सामने भैंसियां भी बंधी है। धीरे-धीरे तरक्की मिलती है। जानता हूं गरीबी तकलीफदायक होती है। तुम्हारा बेटवा बी.ए.पास कर गया तो समझो सरकारी दमाद बन गया। वैसे तुम्हारा बेटवा पास भी हो जायेगा होशियार लगता है।

दुखीराम-बाबू ये बात तो सभी कहते है पर घूस की बात बेचैन कर देती है।

युद्धनाथ बाबू-बी.ए.तो पास कर लेने दो तब तक सरकार बदल जायेगी, हो सकता है घूसखोरी पर प्रतिबन्ध लग जाये। तुम्हारा नगीना सब परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास कर ले,घूस लेने देन की बात ही नहीं उठे।

दुखीराम-बाबू बेटवा की नौकरी का बन्दोबस्त कर देना। कहते है ना हिल्ला रोजी बहाने मौत,बिना जान पहचान के नौकरी नहीं होती और बिना बहाने मौत। बाबू मुझ गरीब की नइया पार कर देना बस।

युद्धनाथ बाबू बोले क्यों चिन्ता करते हो दुखीराम सरकारी नौकरी नहीं मिली तो क्या हवेली में काम कम है क्या ? तुम्हारी बीत गयी तुम्हारे बेटे की बीत जायेगी हवेली को एक पढ़ा लिखा कर्मचारी मिल जायेगा।

दुखीराम-बाबू बेटवा को पेट काटकर पढ़ा रहा हूं ,हलवाही करने को नहीं,गांव के जमींदारों की हलवाही करने में जनख्वाह और पेंशन तो नहीं मिलती ना। बेटवा को शहर जाना है,अफसर बनना है।

युद्धनाथ- ठहाका पर ठाहाका लगाने लगे फिा सन्तुलित होकर बोले बड़े शौक से भेजना पहले बी.ए. तो पास कर लेने दो।

दुखीराम-बाबू जैसे इतने बरसों से पेट काट रहा हूं कुछ बरस और पेट काटूंगा पर बेटवा को बी.ए.पास कराऊंगा।

युद्धनाथ-समझो नौकरी मिल गयी।

दुखीराम-बाबू बेटवा पर कृपा दृटि बनाये रखना।

युद्धनाथ-मुझसे जो बन पड़ेगा तुम्हारे बेटे के लिये करूंगा आखिरकार ये हवेली और हम भी तो तुम्हारे कर्जदार जो हैं।

दुखीराम-बाबू देर रात हो गयी। बच्चे सो गये होगें। बुढ़िया इन्तजार कर रही होगी।

युद्धनाथ-कलाई पर बंधी घड़ी को देखते हुए बोले हां रात तो हो गयी है। सुधार को आवाज देते हुए बोले सुधारबाबू तनिक मिर्चहिया चिलम भर दे जाना।

सुधार-दुखीराम मिर्चहिया पीना बन्द कर दो,छाती में बलगम जम जायेगा,टीबी और दमा की बीमारी भी हो सकती है।

दुखीराम-छोटे जमींदार जानता हूं पर गाल भर गांजा का धुआं जन्नत का सुख दे देता है। बड़े जमींदार मेरी थकावट को देखकर कभी -कभी दे देते है। उस रात चैन की नींद आती है।

सुधार-कहना क्या चाहते हो गांजा की लत तुमको डैडी की वजह से पड़ी है।

दुखीराम-सुधार बाबू क्यों गड़े मुर्द उखाड़ रहे हो। दो और मुझे जाने दो। भोर में बिजली आते ही पोखरा पर गेहूं की सिंचाई करने जाना है। हवेली के काम के लिये अपनी जान भी दे दूं तो क्या दो सेर से अधिक तो मिलने वाला नहीं । आज मन खुश हो गया क्योंकि मझले जमींदार बाबू ने सच्चाई बयान कर दी।

सुधार-कैसी सच्चाई दुखीराम ।

दुखीराम-हवेली हमारी कर्जदार है। दुखीराम बहुत खुश हुआ कहते हुए वह उठा और एकदम अन्हरे सियार की तरह अपने घर को ओर भागा। पूरी बस्ती सो चुकी थी पर दुखीराम की घरवाली लक्ष्मीना को नींद कैसे आ सकती थी। दुखीराम हवेली से आधी रात को आये या भोर में उसके खाना खाने के बाद ही वी रोटी खाती थी। दुखीराम घर पहुंचते ही खटिया से तनिक रस्सी काटा और उसकी की आग बनाया दनादन गांजा मला फिर चिलम पर चढ़ाकर आठ-दस सुड़ुका आसमान की ओर छोड़ा। चिलम एक तरफ रखते हुए वह बोला नगीना की मां लाओ रोटी आओ साथ में बैठकर खा लो। लक्ष्मीना-गाल भर धुआं क्या उड़ा लिये रीति-रिवाज भुला दिये।

दुखीराम-कैसी रीति नगीना की मां । तुमको भूख नहीं लगी है क्या ? आधी रात बीत चुकी है। पास में बैठकर खालोगी तो क्या हो जायेगा ?

लक्ष्मीना-तुम खा लो इसके बाद में मैं खा लूंगी। मुझे नरक में नहीं जाना है। मैं अपने धर्म पर मरते दम तक अडिग रहूंगी।

दुखीराम-भूखे मरना कोई धर्म है क्या ? पेट में भूख आंखों में आंसू लेकर सेवा का काम करते रहो ये कैसा धर्म ? वैसे भी अपना धर्म कोई धर्म है। जिस धर्म की दुहाई देकर आदमी को अछूत बना दिया गया हो,आदमी के आदमी होने का सुख छिन लिया गया हो। जल-जमीन से बेदखल कर दिया गया हो,धन-दौलत रखने का अधिकार न हो। पढ़ाई लिखाई के लिये स्कूल में नहीं जाने दिया जा रहा हो,अपना धर्म आदमी को गुलाम बनाने का इजाजत देता है,अपना धर्म को धर्म मानना हम शोाित के लिये महापाप हो गया है नगीना की मां। भला हो उस अंग्रेज का जिसकी वजह से हमारी कौम के बच्चे स्कूल जाने लगे है। हमारा बेटवा बस्ती का सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा हो गया है। बीए पास कर लिये तो अपनी बस्ती की रिकार्ड बन जायेगा।

लक्ष्मीना-उपदेश ना दो,रोटी खाओ।

दुखीराम-वही कर रहा हूं भागवान पर धर्म की तुम बात कर रही हो तो ये जो हमारी गरीबी है,धर्म की दी हुई है। ब्राहमणवाद के चक्रव्यूह ने हमें हमेशा के लिये गुलाम बना दिया है। ये धर्म जाति की दीवारें जब तक टूटेगी नहीं हम गरीबों का उद्धार नहीं हाने वाला।

लक्ष्मीना- गांजा लग गया क्या ? आज फिर मिर्चहिया मिल गयी। भााणबाजी मत करो जानती हूं जातिवाद से उबरने के लिये अभी सदियां लगेगी,अपनी कौम को शिक्षित होना होगा,धर्म का परित्याग भी करना होगा, तभी मुक्ति सम्भव होगी वरना हमारे लोगों की हड्डियां कर्जदार बनकर ही गलती रहेगी । हमारी औलादें कर्ज के बोझ से दबी जातिवाद,अत्याचार का जहर पीती रहेगी।

दुखीराम-बदलाव आयेगा,मुझे भी लगने लगा है। आज तो एक नई बात हवेली में हो गयी भागवान।

लक्ष्मीना-कौन सी बात ?

दुखीराम-युद्धनाथ बाबू शहर से आये है,वे बातों में बातों में कह ही दिये दुखीराम हम तुम्हारे कर्जदार है।

लक्ष्मीना-मीठ बोलवा लोग है,दिल में उतरकर कलेजा निकाल लेते है। इनकी बातों पर विश्वास करना खुद को फंसाना है। हवेली के लोग इतने शुभ चिन्तक होते तो क्या हमें कुत्ते -बिल्ली से कमतर आंकते। खा लिये सो जाओ,युद्धनाथ बाबू आये है तो जल्दी जाना होगा,जब तक रहेगी गुलामी और बढ जावेगी।

दुखीराम-नगीना की मां तुम भी खाना खा लो,इसके बाद हुक्का चढ़ाना। गुलामी करना तो नसीब बन गया है। नगीना की मां में भी जानता हूं बाबू साहब लोगों के दिल में वैसी ही ऐंठन होती है जैसी रस्सी की होती है,जैसे रस्सी जलने के बाद ऐंठने नहीं जाती वैसे बाबू लोग भी होते है। मौका पाते ही सांप की तरह ऐंठ कर जान ले लेते है। युद्धनाथ बाबू की बात सुनकर खुशी तो हुई है।

लक्ष्मीना-ऐसी कौन सी बात कह दिये कि तुम्हारे दिन फिर जायेगे।

दुखीराम-बेटवा को नौकरी लगवाने की बात । युद्धनाथ बाबू दुनिया की एक बड़ी सरकारी कम्पनी में जनरैल मनिजर है। बेटवा को अफसर की नौकरी तो लगवा ही देंगे।

लक्ष्मीना-कोई चाल होगी उनकी। इतने शुभ चिन्तक होते तो सौ दौ सौ बेटवा की पढ़ाई के लिये दे दिये होते। कभी दिये क्या ? नहीं ना। बड़े बाबू साहब शुद्धनाथ पांच रूपया सैकड़े का ब्याज लेते है। टयूबेल का पाना एक घण्टा देते है तो बही में दो घण्टा लिखते हैं,जबकि हवलवाही में मिला दस बीसा खेत उनका ही है। हां ये बात अलग है कि गांव समाज की जमीन पर अबैध कब्जा कर खेत हलवाही में दिये हैं। हवेली की मालकीन सेर भी मजदूर में आधा पांव कचरा डाल देती है। ये क्या भला करेंगे ? हुक्का गुड़गुडाओं और सो जाओ।

दुखीराम-हां नगीना की मां ठीक कह रही हो है। ये ऐसे परजीवनी है जो अपने खून पर पल पलते हैं और अपने को लतियाते है। युद्धनाथ बाबू की बात पर विश्वास करना होगा। यदि नगीना को नौकरी पर लगवा दिये तो अपने परिवार के दिन बदल जायेगे पर इसके लिये बेटवा को बीए पास करना होगा।

लक्ष्मीना-बेटवा होशियार है बी.ए.पास कर लेगा चिन्ता ना करो,उसे नौकरी भी मिल जायेगी पर अभी बी.ए.पास करने में सालों लगेगे और रूपया पैसा भी। सो जाओ। हवेली जल्दी जाना है युद्धनाथ बाबूसाहेब शहर से आये हुए है।

दुखीराम-नींद नहीं आ रही है। आंख बन्द करता हूं तो बेटवा सूटबूट में दिखता है।

लक्ष्मीना-सपने देखना बुरी बात नहीं है पर बेटवा को उस लायक तो होने दो। बेटवा बीए पास हो जायेगा तो सरकारी नौकरी वैसे ही मिल जायेगी। युद्धनाथ बाबू का सहारा लेना मतलब खुद को गुलामी के दलदल में और फंसाना होगा। सो जाओ नगीना के बाबू सो जाओ। युद्धनाथ बाबू कर्जदार बनकर कही हमारे सपने को ना डूबा दे,अभी बेटवा को बी.ए. पास करने में साल लगेंगे। मैं भी चाहती हूं मेरा बेटवा अफसर बने,तुम जो ना कर पाये बेटवा करे,बेटवा मेरी गहना पहनने की ख्वाहिशें पूरी कर दे,काश भगवान अपनी गुहार सुन लेता।

दुखीराम-नींद आ रही है। सोने दो भागवान।

दुखीराम हवेली की गुलामी में बचपन से कैद हो गया था। जीवन इसी में बिताने की पूरी साजिश थी हवेली की ओर से। अब उसके सामने खानदान का उद्धारक नगीना ही दिखाई पड़ रहा था और कोई दूसरा आसरा नहीं था। भूखे प्यासे और अभाव में बसर कर नगीना ने बीए तो पास कर लिया पर नौकरी के नाम पर युद्धनाथ मौन साधते रहे। हवेली के काम में फंसाये रखने का चक्रव्यूह रचते रहे । आखिरकार नगीना दिल्ली चला गया। युद्धनाथ जब भी शहर से आते दुखीराम कर्ज चुकाने का तगादा करता रहता पर हवेली के लोग कमजोर की पीड़ कहा समझते उसे गरीबी के दलदल में ढकेलना अपनी शान समझते है। नगीना कई सरकारी नौकरी के लिये आवेदन देता,परीक्षा पास करता पर नौकरी नहीं मिलती क्योंकि उसके पास घूस देने के लिये रूपया जो नहीं था। नौकरी की तलाश में छः साल बीत गये पर नौकरी हाथ आकर सरक जाती। शहर में नगीना बोझा ढोने तक का काम किया प्लास्टिक मशीन चलाया। खुराकी का इन्तजाम हो जाता था जो बचता दुखीराम के नाम मनिआर्डर कर देता। अगर किसी महीने मनिआर्डर के पैसे का इन्तजाम नहीं हो पाया तो पूरी बस्ती में ढिढोरा पीट डालता था कि बेटवा शहर जाकर भूल गया। उधर नगीना की हाल ये होती थी कि काम नहीं मिल रहा होता था या कोई और मुश्किल होती थी,बोझा ढोकर ईंट गारा कर ही तो मनिआर्डर भेजता था । गांव में उसके बाप दुखीराम सोचते बेटवा के शहर पहुंचते ही नौकरी मिल गयी होगी। जबकि हर महीना नगीना पत्र लिखता था लेकिन दुखीराम उसकी तकलीफ को समझना ही नहीं चाहता वो कहता युद्धनाथ बाबू भी तो पुराने जमाने के बीए तक पढ़े है जनरल मनिजर है। नगीना को मामूली अफसर सी नौकरी क्यो नहीं मिल रही इस बात को दुखीराम को समझने में कई साल लग गये कि सरकारी नौकरी पाने के लिये स्वर्स और रूपया लगता हैे,तब उसे अपने कर्जदार से उम्मीद बढ़ गयी। ऐसा नहीं कि दुखीराम इसके पहले युद्धनाथ बाबू से बेटवा की नौकरी की बात की हो। जब-जब युद्धनाथ बाबू शहर से आते दुखीराम उनके सामने अपना दुखड़ा रोता पर युद्धनाथबाबू टालते हुए कहते दुखीराम तुम्हारा बेटवा सरकारी अफसर बनेगा तू कहां अर्धशासकीय नौकरी के लिये मेरे पीछे पड़ा रहता है। दुखीराम कहता बाबू पांच साल हो गया बीए पास किये बेटवा को सरकारी नौकरी तो दूर प्राइवेट नौकरी नहीं मिला रही है। बाबू सरकारी नौकरी के लिये तो ढेर सारा रूपया और स्वर्स चाहिये ना,बाबू आप तो जानते ही है आपके अलावा तो अपना कोई यही है नहीं किसके सामने हाथ फैलाने जाउं,मुझ गरीब की मदद कौन करेगा,बाबू छूछा को कौन पूछा। बाबू यही मौका है कर्जा उतारने का।

दुखीराम की बात सुनकर युद्धनाथबाबू का हाथ सीने पर आ लगा जैसे उन्हें दुखीराम की बात सुनकर हृदयघात हो गया हो। वे जोर से खंखारते हुए बोले दुखीराम तुमने छाती में तलवार घुसेड़ दिया।

दुखीराम-बाबू आपके फौजदार बाबू की नौकरी मेरे सामने लगी थी,रिटायर हुए थे तो बीस लाख मिला था,शीतनाथ बाबू को पच्चीस लाख मिले थे। बाबू आपकी बंधुआ मजदूरी में नहीं फंसा होता और मैं भी शहर में नौकरी किया होता एक दो लाख का असामी तो हो ही गया होता । बाबू इस हवेली के रूतबें में मेरा भी खून पसीना लगा है। बाबू मेरी आंख खुली तब से इस हवेली और हवेली के लोगों की गुलामी कर रहा हूं। मैं जानता हूं मेरे बेटवा की नौकरी एक दिन में लगवा सकते है। बाबू आपने कितने जमीदारों के लड़कों को नौकरी लगवाया है,कई तो अंवारा किस्म के थे जो सोने की डाल काट रहे है। बाबू समझा हंसिया अपनी तरफ ही खीचता है,हम कहां आपकी जाति बिरादरी के है। हम तो अछूत बंधुआ तजदूर ठहर,े कितनों भी मेरा बेटा होशियार पढ़ा लिखा होगा, आपकी निगाहों मैं मजदूर का बेटा ही तो होगा ना। दुखीराम बेहिचक बोलता चला जा रहा था,युद्धनाथ बाबू मौन सुनते जा रहे थे। दुखीराम बाबू आखिरी बार कह रहा हूं अब नहीं कहूंगा कहते हुए उठा और जाने लगा।

युद्धनाथ बाबू-मिर्चहिया नहीं पीओगे क्या ?

दुखीराम-बहुत जहर पी लिया हूं अब नहीं।

युद्धनाथ बाबू-ले जाओ पी लेना। तुम्हारे बेटवा के प्रति मेरा भी दायित्व है दुखीराम उसकी योग्यतानुसार जगह मिलते ही लगवा दूंगा। तुम्हारे बी.ए.पास बेटवा को चपरासी की नौकरी पर तो रखूंगा नहीं ना। तुम्हारा बेटवा होनहार है उंचे ओहदे तक जायेगा तो इस हवेली का भी तो नाम रोशन होगा लोग कहेंगे देखो हवेली के मजदूर दुखीराम का बेटा जनरल मैनेजर बन गया।

दुखीराम-बाबू आज मरे कल पाहुन आवै वाली बात मत करो।

युद्धनाथ बाबू-जा रहे हो तो जाओ नगीना तो अभी दिल्ली में हैं, मैं भी दिल्ली आ गया हूं मुझसे मिल लेगा,नौकरी मिल जायेगी। तुम्हारा कर्ज भी तो उतारना है कहते हुए दांत खोदने लगे। युद्धनाथ बाबू के हावभाव से दुखीराम को ऐसा लगा जैसे नौकरी नहीं देख लेने की धमकी दे रहे हो पर मरता क्या ना करता। दुखीराम नगीना को चिट्ठी में युद्धनाथबाबू का दिल्ली का पता लिखवा दिया। नगीना छः महीना युद्धनाथ बाबू के बंगले का चक्कर लगाया पर युद्धनाथ बाबू नगीना को भोजन भी करवाते कभी कभार किराये के पैसे भी दे देते। इससे नगीना का विश्वास युद्धनाथ बाबू के प्रति मजबूत हो गया था। नगीना को युद्धनाथ बाबू के बंगले पर आते-जाते छः महीना बित गये। हर हफ्ते युद्धनाथबाबू के बंगले का चक्कर लगाकर निराश हो गया था,अब वह नहीं जाना चाहता था पर उसके मन में विचार आये चलो रविवार की छुट्टी भी हैं आखिरीबार युद्धनाथबाबू से गुहार कर आता हूं। नगीना आजादपुर से कालिका युद्धनाथबाबू के बंगले के लिये चल पड़ा। संयोगवश युद्धनाथबाबू बंगले पर मिल गये। नगीना युद्धनाथबाबू सलाम किया।

युद्धनाथबाबू बैठने का इशारा करते हुए फोन घुमा दिये। फोन घुमना ही था कि नेपाली युवक हाजिर हो गया।

नेपाली युवक से युद्धनाथ बाबू बोले बहादुर कुछ नाश्ते का इंतजाम करो नगीना के लिये। नगीना तुम तनिक देर में आते तो मैं नहीं मिल पाता,मरेी हवाई जहाज की टिकट है,सरकारी दौरे पर जा रहा रहा हूं सप्ताह भर बाद लौटूंगा

नगीना-साहब मैं तंग हो गया हूं,और कब तक करना होगा।

युद्धनाथ बाबू-कल ग्वालियर चले जाओ नौकरी मिल जायेगी।

हंसी-खुशी नगीना आजादपुर र्क्वाटर पर आया। किराये भाड़े के लिये रूपये चाहिये थे उसके पास भूंजीभांग थी नहीं। खैर एक सहृदय व्यक्ति होरीलालजी ने बतौर कर्ज पांच सौ रूपये दे दिये। नगीना कर्जे के पैसे से युद्धनाथबाबू के दिये पते पर ग्वालियर पहुंच गया। वहां कम्पनी का दफ्तर था। वह दफ्तर में प्रविट होने के लिये जैसे ही पांव बढ़ाया एक युवक आ धमका कहां से आये क्यों आये हो क्या काम है दूसरे कई सवालात दागने लगा। नगीना युद्धनाथ बाबू का खत दिखाते हुए बोला मुझे श्रीरामपूजनबाबू,शाखाप्रबन्धक से मिलना है।

युवक बोला-अच्छा तो तू नौकरी के लिये आया है क्या ?

नगीना-आपका क्या नाम है।

बड़ी युवक बेरूखी से बोला नाम का क्या करेगा सब मालूम पड़ जायेगा जा शाखाप्रबन्धक,कृािआदानको,ग्वालियर तेरी आगवानी के लिये पलके बिछाये बैठे है।

युवक की बातों से मायूस नगीना शाखाप्रबन्धक साहब के चैम्बर तक पहुंचा,वह दरवाजा खटखटाते हुए बोला मे आई कम इन सर ......?

शाखाप्रबन्धक-येस कम इन।

नगीना चैम्बर में प्रवेश करते ही शाखाप्रबन्धक महोदय को नमस्कार किया। नगीना को बैठने का इशारा करते हुए शाखाप्रबन्धक साहब ने कालबेल बजा दिया। वही युवक जो कुछ मिनट पहले नगीना को अफसरी दिखा रहा था ,मुंह लटकाये,दुम दबाये, हाजिर हो गया। शाखाप्रबन्धक साहब-रईसहजाम पानी पीलाओ,फिर चाय नाश्ता। ये नगीना हैं,दैनिक क्लर्क के पद पर अब इसी दफतर में काम करेगे। रईस को इतना सुनते ही सांप सूघ गया। साहब नगीना की तरफ मुखातिब होते हुए बोले रईसहजाम बतौर चपरासी काम करता है। जी.एम. साहब युद्धनाथबाबू का आदमी है इसका दिमाग सातवें आसमान पर रहता है। खैर तुमको चिन्ता करने की जरूरत नहीं तुम भी जीएम साहब के ही आदमी हो। फिर वे गाल पर हाथ रखकर कुछ सोचते हुए बोले नगीना तुम दैनिक क्लर्क के पद पर कैसे आये हो ? जी.एम. साहब तो अफसर के पद पर तुम्हारी नियुक्ति कर सकते थे उनके चेहरे पर कुछ शंका-आशंका के बादल मड़राने लगे थे। वे नगीना के सान्तवना देते हुए बोले चलो नौकरी शुरू करो आगे बहुत चांस है,तुम एक दिन कृािआदानको में बड़ा अफसर बनोगे। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है,खाली नहीं बैठना पढ़ाई शुरू कर देना कुछ और डिग्रिया हासिल कर लोगे तो तुम्हारे कैरियर में चमत्कारी बदलाव भविय में आ सकता है। साहब नगीना को हसीन सपने दिखाये जा रहे थे रईसहजाम आग लगाये जा रहा था। खैर नगीना के कैरिअर की दृटि से साहब काफी सहयोगी साबित हो रहे थे पर ज्यादा दिन नहीं चला कुछ ही महीनों बाद शाखाप्रबन्धक का स्थानान्तरण हो गया। नये साहब राजेन्द्रगिद्धा आ गये। नये साहब मामूली ग्रेजुएट थे पर चम्मचागीरी उनकी सफलता का राज था,जाते-जाते श्रीरामपूजनबाबू नगीना को धीरे से बोल गये थे और सावधान रहने का इशारा भी कर गये थे। वही हुआ नगीना के दुर्दिन शुरू हो गये। राजेन्द्र गिद्धा अपने चम्मचों पर खुलेआम कम्पनी का खजाना लुटाने लगे थे,रईसहजाम रह-रहकर आग लगा देता। ना जाने क्यों नगीना राजेन्द्रगिद्धा और उनके चम्मचों की आंखो की किरकिरी बन गया। राजेन्द्र गिद्धा की सिफारिश पर सामन्तवादी प्रबन्धन ने नगीना को नौकरी से निकाल भी दिया। युद्धनाथबाबू अब नगीना की ओर से आंख मूंद लिये थे,शायद कोई साजिश थी मजदूर के बेटे को अपयश लगाकर भविय बर्बाद करने की पर कामयाबी नहीं मिली। कई महीनों के संर्घा के बाद नगीना बहाल तो हो गया पर इंदूर भेज दिया गया। इंदूर के शाखाप्रबन्धक,अहमदभाई ने नगीना को खूब जांचा परखा और उनकी कड़ी परीक्षा में नगीना पास भी हो गया। वही नगीना अहमदभाई के सानिध्य में काम कर इंदूर इलाके के बेहतर कर्मचारी में उसकी गिनती शुश्र हो गयी थी। नगीना की सी.आर.वेरी गुड और एक्सलेण्ट लिखी जाने लगी थी जबकि राजेन्द्रगिद्धा की चोर निगाहों में नगीना कम्पनी में काम करने लायक ही नहीं था क्योंकि वह युद्धनाथ बाबू के अछूत मजदूर का बेटा था और कुछ लोग दबी जुबान कहते भी थे यह सब युद्धनाथ बाबू ही इशारे पर हो रहा है। यह बात अहमदभाई के ड्राइवर विपिन ने नगीना से बताया था पर किसी से न कहने की कसम भी साथ में ले लिया था क्योंकि उसकी नौकरी जाने का खतरा जो था। सामन्तवादी अफसरो- डां.विजय प्रताप बाबू,देवेन्द्रप्रताप बाबू,अवधप्रताप बाबू,रामगदहेशबाबू ने कृािआदानको कम्पनी को अपनी रियासत बना लिये थे नगीना को गुलाम समझ लिये थे । वैसे कृािआदानको कम्पनी में चपरासी से लेकर अफसर तक सभी सामन्तवादी थे और किसी ना किसी रूप में एक दूसरे के रिश्तेदार थे। बेचारा नगीना अकेले भाड़ के चने की तरह भूजा जा रहा था। खैर इंदूर आने के बाद तनिक तसली मिली,अहमदभाई नगीना के काम को खूब सराहा। अहमदभाई नगीना की नौकरी पक्की करवाने में कामयाब हो परन्तु डां.विजय प्रताप बाबू,देवेन्द्रप्रताप बाबू,अवधप्रताप बाबू,रामगदहेशबाबू रामगदहेशबाबू ने नगीना को आगे नहीं बढ़ने देने की कसमें खा लिये। सामन्तवाद के अंधभक्त अफसर डां.विजय प्रताप बाबू,देवेन्द्रप्रताप बाबू,अवधप्रताप बाबू,ने खुलेआम कह दिया था कि अछूत मजदूर के बेटा को कृािआदानको विभाग में अफसर तो नहीं बनने देगें क्योंकि द्धनाथबाबू का मौखिक हुक्म भी यही है वरना नगीना विभाग का ब्राण्ड अम्बेस्डर होता प्रमोशन तो मामूली बात थी। सिर पर जूता रखकर जी हजूरी करने वाले मुर्दाखोर अफसरों-रामगदहेशबाबू,एस.एस.दोगला,द्वारिकाप्रसाद जालिम,राजेन्द्र गिद्धा ने भी कसम दोहरा लिये। नगीना कसमे-वादे से बेखबर दिन में काम करता रात में पढाई। वह अपनी मेहनत के बदौलत कई उच्च डिग्रियां भी हासिल कर लिया। नगीना की इस गुस्ताखी से सामन्तवादी अफसरों की नींद उड गयी, वे चाहकर भी नगीना को नौकरी से निकाल नहीं सकते थे क्योंकि भारतीय संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। उन्हें भय था कि नौकरी से निकाल दिया गया तो कोर्ट जाकर सारी पोल खोल देगा,सामन्तवादी अपात्रों के पद और दौलत की मिली खैरात दुनिया के सामने आ जायेगी।

नगीना को इंदूर ब्रांच में अहमदभाई के अधीनस्थ नौकरी रास आने लगी पर सामन्तवादियों की नजर जल्दी लग गयी ,कुछ ही साल बिते ही थे कि राजेन्द्र गिद्धा अहमदसाहब को वनवास दिलवा कर खुद प्रमोशन लेकर इंदूर ज्वाइन कर लिये। ज्वाइन करते ही नगीना से बोले तुम्हारे साहब का तो ट्रांस्फर हो गया,तुम जाना चाहो तो जा सकते हो। नगीना बोला गिद्धा साहब मेरे चाहने ना चाहने से क्या होता है। यह बात गिद्धा को मिर्ची जैसी लग गयी और फिर हो गया बदला लेने का दौर शुरू। सामन्तवादी सोच के पोाक मामूली ग्रेजुएट गिद्धा जनरल मैनेजर बन गये,द्वारिकाप्रसाद जालिम,मामूली क्लर्क,से चीफ मैनेजर बन गये,ऐसे ही दूसरे सामन्तवादी अफसरों और उनके रिश्तेदार अफसरों की उन्नति दिन दूनी रात चौगुनी हो रही थी। विभाग के प्रति समर्पित नगीना का खुले आम दमन हो रहा था जबकि नगीना वेलफेयर,कानून और प्रबन्धन के क्षेत्र में उंची-उंची डिग्रियां अपनी मेहनत के बल पर हासिल कर चुका था। मामूली ग्रेजुएट गिद्धा ज्वाइण्ट जनरल मैंनेजर बन गये । इसके बाद,द्वारिकाप्रसाद जालिम इंदूर ब्राच के हेड बन कर आये । सामन्तवादियों के प्रति अपनी वफादारी का ईमानदारी से निर्वहन किया। नगीना के रिसते घाव को नोंच-नोंचकर खार डाला,पूरी जातीय दुश्मनी निभाया। जालिम साहब डां.विजय प्रताप बाबू,देवेन्द्रप्रताप बाबू,अवधप्रताप बाबू के इशारे पर जितना भी फयूचर बिगाड़ सकते थे बिगाड़ लिये,रामपूजनबाबू और अहमदभाई के अलावा स्टेट हेड से लेकर इंदूर ब्रांच के जो भी हेड आये नगीना के भविय के लिये मुट्ठी भर आग साबित हुए वह भी सिर्फ जातीय अयोग्यता के कारण। लाख कोशिशों के बाद भी ौक्षणिक योग्यता,वफादारी,कर्मनिठा,सत्यनिठा के दुश्मन सामन्तवादी अफसर नगीना की योग्यता का गला नहीं घोंट पाये,नगीना के समतावादी एवं मानवीय उत्थान के उर्त्का कार्यों को देखते हुए उसे स्पीच देने के लिये बुलाया जाने लगा था परन्तु कृािआदानको सामन्तवादी अफसरों- डां.विजय प्रताप बाबू,देवेन्द्रप्रताप बाबू,अवधप्रताप बाबू, द्वारिकाप्रसाद जालिम, राजेन्द्र गिद्धा और दूसरे सामन्तवादी मुर्दाखोर अफसरों ने जातीय चक्रव्यूह रचकर प्रमोशन नहीं होने दिया।

नगीना को अप्पो दीपो भवः पर पूरा यकीन था। वह समर्पित भाव से अपने दायित्वों का निवर्हन कर रहा था। अचानक एक दिन गांव से खबर आ गयी कि उसके पिताश्री दुखीराम को अटैक आ गया है,नगीना की मां तो पहले ही बेटवा को अफसर बनता देखने की ख्वाहिश लिये उस दुनिया में चली गयी थी जहां से न आती चिट्ठियां न आता संदेश। पिता की बीमारी का सुनकर वह गांव की ओर भागा। शहर ले जाकर इलाज करवाया। दुखीराम बीमारी से उबर चुके थे। अस्तपाल से घर आने के बाद दुखीराम को पता लगा कि युद्धनाथ के चचेरे भाई कृािआदानको विभाग में काम करने वाले रूद्रनाथ चीफ मैनेजर बन गये है वे पूरी सरकारी लावलश्कर के साथ गांव आये है। दुखीराम नगीना को बुलाये ।

नगीना पिता के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला बाबूजी कहीं दर्द तो नहीं हो रहा है।

दुखीराम-नहीं बेटा। सुना है रूद्रनाथ भी आये है।

नगीना-आये होगे बाबू उनसे कोई काम है क्या ?

दुखीराम-रूद्रनाथ बड़ा मैनेजर बन गये तुम कब बनोगे ।

नगीना-कृािआदानको विभाग में नौकरी तो चल रही है, क्या यह कम है।

दुखीराम-कैसी बात कर रहे हो बेटा। गांव का सबसे बदनाम लड़का बड़ा मैनेजर बन गया। रूद्रनाथ शहर से आते है तो लोग उनसे मिलने आते है। युद्धनाथ बाबू आते है तो लगता है देश का कोई मन्त्री आ गया हो दूर-दूर से उनके जातीय भाई नौकरी के लिये आते है,युद्धनाथ बाबू स्वजातीय भाईयों को निराश भी नहीं करते हैं। उनके आते ही हवेली में जैसे मेला लग जाता है।

नगीना-बाबूजी उन पर युद्धनाथबाबू की कृपा बरस रही है।

दुखीराम-तुम गांव के सबसे अधिक पढ़े लिखे हो तुम्हारे उपर क्यों नहीं बरस रही है।

नगीना-बाबूजी पात्रता का प्रतिफल तो मिल ही नहीं रहा है,कृपा कैसे बरस सकती है।

दुखीराम-क्या........? युद्धनाथबाबू तो कर्जदार बन रहे थे।

नगीना-वे एक अछूत मजदूर के बेटे को अफसर कैसे बनने देगे क्या ?

दुखीराम-ये कैसा भाणयन्त्र युद्धनाथबाबू ?

नगीना-बाबूजी श्रम बेकार नहीं जायेगा अपने कुनबे की पहचान जरूर बनेगी बाबू।

दुखीराम-ये मुर्दाखोर कब तक हमारे और हमारे लोगों के भविय को डंसते रहेंगे।

नगीना-गरीबों के आसू व्यर्थ नहीं जाते तुम ही तो कहते हो,अच्छे काम का पुण्य मिलता है बाबू।

दुखीराम-हां बेटा पर अछूत मानकर और गरीब जानकर हकों की डकैती करने वालों का नाश भी हुआ है इतिहास गवाह है। जीवन भर हवेली की गुलामी किया,इतनी बड़ी गुलामी का क्या सिला दिया युद्धनाथबाबू । युद्धनाथबाबू मेरा कर्जदार बनकर मेरे बेटे के भविय में मुट्ठी भर भर आग भरते रहे। मेरा नगीना मुट्ठी भर भर आग में झुलसता रहा। युद्धनाथबाबू तेरी हवेली और तेरा रूतबा मशान बन जायेगा और तेरे काठ के उल्लूओं का भी वही हाल होगा जो तेरा। दुखीराम का श्राप सच साबित हुआ हवेली भूतही कही जाने लगी । नगीना को योग्यतानुसार तरक्की तो नहीं मिली पर वह दुनिया की निगाहों श्रेठ बन चुका था। श्रापित युद्धनाथबाबू और उनका कुनबा गलता रहा नमक के बर्तन की तरह। समय की मार के साथ धीरे-धीरे मिट गयी सल्तनत ।

इति

 

डां.नन्दलाल भारती 01.12.2014

 

आजाददीप,15-एम-वीणा नगर,इंदौर (म.प्र.)-452010

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