मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

सुशील यादव का लघु व्यंग्य - एक झोला छाप वार्ता

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लघु व्यंग्य

एक झोला छाप वार्ता ......

हमारी दोस्ती बचपन से थी |वो मेट्रिक में फेल हो हो के झोला छाप डाक्टर बन गया| लोग उन्हेंडाक्टर झोलानाम से पीठ पीछे जानते हैं |

तब, जब डाक्टरों की कमी हुआ करती थी, उसने अपने पेशे से बहुत कमा लिया |हम दो चार दोस्त उसी के साथ पढ़ते थे, जब आपस में मिलते, बस उसके पेशे के पीछे पड़ जाते |वो अपने किस्से भी हम लोगों से बेतकल्लुफ हो के सुनाया करता |

गॉड`बैगाओं की वो बस्ती छोटी सी बस्ती थी |वहीँ एक सायकल दूकान और टपोरी से होटल के बीच, अपना क्लीनिक खोल रखा था |

पुरानी खाली शीशियाँ ,कुछ जरूरत भर की दवाइयाँ ,बेंडेज का सामान,एक पुराना टेबल फेन ,टार्च ,टेबल लेंप,रिवाल्विंग चेयर ,बस इतना सा सामान जो उस जमाने में डाक्टर कहे जाने लायक काफी था जो उसके क्लीनिक में था |

उसके रहते , हम यार दोस्तों को सर्दी `जुकाम के इलाज के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता था |वैसे,उससे इलाज से पहले हम दस बार कन्फर्म कर लेते जो दे रहा है सो सही है की नहीं ?वो अपना राज उगल देता ,यार मेरे क्लीनिक में सिवाय एनासिन,एस्प्रो ,डिस्प्रीन और पेरासिटामोल के कोई और दवाई होती नहीं |ये हर मर्ज की फिट दवा है |हमारी डाक्टरी का ये तजुर्बा है कि इन दवाइयों को अचूक नुस्खे की तरह मरीज को दे दो |चार दिन में मरीज ठीक हो जाता है |हमारी दवा काम करे या ना करे ,मरीज का मर्ज अपना इलाज खुद दो तीन दिन में ढूढ़ लेता है |दरअसल हरेक बाडी में अंदरुनी इम्यून सिस्टम होती है जो छोटी मोटी बीमारी से लड़ने के लिए दवा पानी का इन्तिजाम खुद कर लेती है |उधर मरीज समझते हैं की हमारी दवा से सब फ़ायदा पहुंचा |बढिया इलाज पाने के एवज हर रोज, दो~ चार मरीज आकर पैर छूकर चले जाते हैं |

हम लोग उनको छेड़ते यार जब एम आर दवा सेम्पल दिखाने आते हैं तो खूब इगलिश झाड़ते हैं |वो बताता ,देखो हमने जुम्मे का दिन फिक्स किया है उंनके लिए उस दिन हम बाकायदा टाई लगा के बैठते हैं ,बस स्टेंड की तरफ से आते हुए अंग्रेजी का पेपर खरीद लाते हैं,रॉब पड़ता है |हमारी नीयत फ्री सेम्पल पर रहती है |उतना उनसे अंग्रजी बोल लेते हैं |जैसे ही वे आर्डर के लिए जोर देते हैं ,आपलोगों के रटाये हुए जवाब पोलाइटली सुना देते हैं कह देते है |नेक्स्ट टाइम ....! ,लेट मी फर्स्ट सी इफ़ेक्ट इन फ्यू पेशेंट..... ,श्योरली आई विल रिकमंड इट .... |वे चल देते नेक्स्ट टाइम मुश्किल से कोई पलट के आता है |

हमने सूना है कोई नर्स इंगेज किया है |झोला ने एक निगाह चरों और फेकी .....किसने बताया तुम लोगो को ....?हमने कहा उडो मत,सच सच बताओ .....|

अरे ऐसा था एक डिलेवरी पेशेंट है ,उसके चेकअप के लिए,एक नर्स को स्टेथेस्कोप ,एप्रेने वगैरा पहना के डाक्टर बना के बुलवा लिया था बस .....|हम लोगो ने छेडा अगली बार वो कब आने को है .....?

झोला ने टापिक बदलने की गरज से खा तुम लोग इंटरेस्टेड हो तो कहो ,लाइन लगवा दूँ ....?

उस दिन सब दोस्तों के चले जाने के बाद मुझसे बोला यार तुम भी पूरी बरात को न्योतने लगे ?तुम्हारी बातलग है आइन्दा इस टापिक में बात हो ये तुम्हारी जिम्मेदारी है |

इस मोहल्ले में सब इज्जत की नजर से देखते हैं और तुम लोग वहीं चोट करने लग जाते हो |

झोला कुछ ज्याददा बिफर पाता उससे पहले मैंने कह दिया ,ज़रा देख समझ कर हेंडल कर यार ,बाहर तुझे नहीं मालूम लोग फुसफुसाने लगे हैं |

उसके चहरे पर बाहर की बातें ,जो मैंने ऐसे ही फेंक दी थी ,जानकार हवाइयां उड़ने लगी |

अगले दम उसने कहा यार चीज अच्छी है ,शेयर करने के लिए ना नहीं करेगी |कोई माकूल जगह हो तो बता |

इस बीच दो एक पेशेंट आये उसे उसने कल वाली दवा फिर ले लेने की सलाह देकर ,फीस ले ली |मैं अवाक झोला छाप को देखते रह गया |

चेकअप जाच , पूछताछ हो गया ग़रीबों का झोला छाप इलाज .....|

इससे पहले कि कोई और इस टाइप के इलाज का शिकार हो, मैं अपनी झोलाछ्प वार्ता को सामाप्त कर उठ खडा हुआ|,हालांकि एक अच्छे दिलचस्प टापिक के करीब से अपना पीछा छुडाते हुए कुछ अफसोस जरुर हो रहा था |

सुशील यादव

२०२ ,श्रीम सृष्ठी

सनफर्मा रोड ,अटलादरा

वडोदरा 390022

 

susyadav7@gmail.com

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