बुधवार, 24 दिसंबर 2014

पाठकीय प्रतिक्रिया - अंकिता भार्गव

सराहनीय किन्‍तु अधूरा प्रयास

देश में चलाया जा रहा ‘बेटी बचाओ अभियान' एक सराहनीय प्रयास है किन्‍तु इसमें एक अधूरापन सा महसूस होता है। कारण यह समस्‍या की बात तो करता है किन्‍तु उसके समाधान की बात नहीं करता। किसी भी रोग का पूर्ण निवारण तभी संभव है जबकि उसकी जड़ को ही नष्ट कर दिया जाए। यह अभियान लोगों को कन्‍या भ्रूण हत्‍या के खिलाफ जागृत करने का प्रयास तो करता है किन्‍तु उन कारणों का निवारण नहीं करता जो इस समस्‍या के लिए जिम्‍मेदार है। एक कन्‍या को अपने जन्‍म के साथ ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उसका हर कदम उसके लिए एक परीक्षा साबित होता है।

आज हमारा सामाजिक परिवेश इतना दूषित हो चुका है कि इसमें छोटी छोटी बच्‍च्‍यिां भी सुरक्षित नहीं रह पातीं फिर किशोरियों की तो बात ही क्‍या। उनकी सुरक्षा के नाम पर उन्‍हें मिलते है रसूखदार लोगों के बेशर्म बयान या फिर कुछ फतवे जैसे कि उन्‍हें मोबाइल रखना चाहिए, सह शिक्षा में नहीं पढना चाहिए, लाइब्रेरी नहीं जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्‍त दहेज प्रताड़ना व घरेलू हिंसा जैसी अनेक समस्‍याएं है जिनसे महिलाओं को आज के समय में दो चार होना पड़ रहा है। शायद यह सब देख कर ही माता-पिता कन्‍या को जन्‍म देने की हिम्‍मत नहीं दिखा पाते और कन्‍या भ्रूण हत्‍या का पाप करने पर विवश हो जाते हैं। ‘बेटी बचाओ अभियान' की सार्थकता तभी है यदि वह एक ऐसा स्वस्थ सामाजिक परिवेश बनाने में सफल हो सके जिसमें महिलाएं व कन्‍याएं खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें। यदि यह संभव हो सका तो फिर कोई भी माता-पिता कन्‍या भ्रूण हत्‍या पाप करने के बारे में नहीं सोचेंगे क्‍योंकि एक बिटिया भी अपने माता-पिता की आँखों का तारा होती है वह उन्‍हें उतनी ही प्रिय होती है जितना कि एक बेटा।

अंकिता भार्गव

संगरिया हनुमानगढ

1 blogger-facebook:

  1. समस्या के प्रति सजगता ही उसके निवारण का मूल मंत्र है. समस्या को हमारे मस्तिष्क मे बार बार हैमर करने से निवारण स्वतः सामने आ जायेगा. जो प्रयास चल रहा है उसे हम चलने दें. निवारण खोजना एक भटकाव को निमन्त्रण देना है ऐसा मेरा मानना है.

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