बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अशोक गुजराती की कहानी - आप

।।कहानी।।
आप बी...!


      
                                                                               0अशोक गुजराती.
  
      वह लड़की उस संकरी-सी गली में किराये के कमरे में रहती थी. अकेली नहीं, मां के साथ.


      कमरा इतना छोटा था कि उसीके चारों कोनों का वही उपयोग होता था, जिसके लिए किसी बंगले में बड़े-बड़े कक्ष बने होते हैं. एक कोने में झिलंगी खाट थी, जिसकी अध-टूटी रस्सियों के झोले में उसकी मां सोयी पड़ी थी. यह खाट उसके पिता ने कभी दस रुपयों में खरीदी थी. दूसरे कोने में सीमेंट की एक इंच बॉर्डर उठाकर मोरी बनायी हुई थी, जहां उनका नहाना-धोना संपन्न होता था. सम्पन्न ही था कि उसका सारा पानी गली के किनारे बनी नाली से अपनी गंदगी लेकर बह जाता था. वहीं दो प्लास्टिक की कटी-फटी बाल्टियां, मूल रंग की धुंधली याद दिलाती, पानी से भरी रखी थीं.


     गली के उस तरफ़ एक सार्वजनिक नल था, जो केवल शाम को आता था और लड़की वहां लाइन में लगकर दो बाल्टियां और एक ऐल्युमिनियम की पुरानी घड़िया भर लाती थी. तीसरे कोने में ज़मीन से तीन फ़ुट ऊपर छोटी-सी पटिया पर उनके भगवान विराजमान थे, संयोग से उनकी मिट्टी की मूर्ति की आंखें कलाकार की ग़लती से बंद-सी रह गयी थीं. लड़की रात में उनकी छत्र-छाया में मिट्टी के फ़र्श पर दरी बिछाकर सो रहती थी. चौथा कोना- जहां वह अभी थी- घासलेट के स्टोव, चन्द पुराने बर्तनों और डिब्बों से पटा पड़ा था. यही उनका किचन था.


     उसके पिता मर चुके थे. उनकी बहुत इच्छा थी कि इस इकलौती संतान को ख़ूब पढ़ाया-लिखाया जाये, लड़की है तो क्या हुआ... यह ज़िम्मेदारी उनके बाद उसकी मां ने ले ली थी. शायद मन से मन तक राह होती है. वह पास की कालोनी में बर्तन-झाड़ू-पोंछा कर इतना जुटा लेती थी कि बच्ची को स्कूल भेज सके. आख़िर दो के परिवार में रुखी-सूखी में बंधे हाथ ख़र्च ही कितना होता है...


     वह, जिसको पुकारा जाता था परकुति, मोहल्ले के सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी. यह नाम उसे उसके पिता के मालिक, जिनके यहां वे चौकीदारी करते थे, उन्होंने दिया था- प्रकृति! तब तो पता नहीं, अब वह प्रकृति की तरह ही सुंदर हो आयी थी. न... न.. गोरी वह बिलकुल नहीं थी. कृष्ण-से सांवले रंग की वह मालकिन थी लेकिन प्रकृति के अनुग्रह से मात्र चौदह वर्ष की आयु में उसके बदन ने अपनी गोलाइयों से उसे अमीर बना दिया था. सारे नैसर्गिक उभार न उसके बस में थे, न उसके सादे वस्त्रों के. सूरत थी भोली-भाली लेकिन नाक-नक़्श बला के तीखे. वह स्कूल आती-जाती तब युवा छोकरे अभी से फब्तियां कसने लगे थे. गोकि वह उधर ध्यान नहीं देती थी. उसे इसका पूरा अहसास था कि वह ग़रीब है, उसके पिता नहीं है, मां मेहनत कर उसे किसी प्रकार पढ़ा रही है. उसे आगे बढ़ना है, अपने-आपको सुरक्षित रख लोगों की लोलुप ही नहीं कृपा दृष्टि से भी बचाना है.


     मां की पिछले दो दिनों से तबीयत ख़राब थी. मोहल्ले के झोला छाप डाक्टर ने पांच दिन की दवाई लिख दी थी. प्रकृति दो दिनों की दवाई ख़रीद लायी थी क्योंकि उसने सोचा, मां इतने में ठीक हो जायेगी. और हो भी गयी थी. शाम में उठकर उसने गुड़ की चाय पी थी और प्रकृति से कुछ देर बातचीत करती रही थी. बाद में 'मेरेको ज़रा कमज़ोरी लग रही है' कहकर सो गयी थी. प्रकृति ने भी उसको उठाया नहीं और ख़ुद सुबह की बची दाल बघार कर अब रोटियां सेंक रही थी.


     अंतिम रोटी सेंकते-सेंकते उसे अचानक भान हुआ कि मां तो वैसे ही सोयी हुई है. तीन घण्टे तो हो ही गये होंगे. अब तक उसे उठ जाना चाहिए था. तभी मां की कराह सुनकर वह उसके क़रीब दौड़ी गयी. वह अर्ध मूर्च्छित-सी कुछ बड़बड़ा रही थी. उसने हाथ लगाकर देखा तो मां का शरीर तप रहा था. सिरहाने पड़ा दवाइयों का पैकेट उसने टटोला. उसमें ख़ाली स्ट्रिप्स और डाक्टर का पर्चा पड़ा था. मतलब साफ़ था कि अभी उसे फ़ौरन डाक्टर की लिखी गोलियां ख़रीदकर लानी पड़ेंगी.


     घर में घड़ी तो नहीं थी पर पास ही कहीं चल रहे टीवी की ऊंची आवाज़ से उसे अनुमान हो गया था कि नौ कब के बज चुके हैं. मेडिकल स्टोर का शटर गिरने से पहले उसका पहुंचना ज़रूरी था. उसने स्टोव बन्द कर तवा उतारा, हाथ धोये और बिस्तर के नीचे रखे फटे हुए पर्स को खोलकर देखा. थे, उसमें दस के कुछेक नोट थे. उसने मोरी के ऊपर बंधी रस्सी पर लटके जर्जर-से टॉवेल से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और मां से बोली, 'मां, मैं अब्बी आती हूं. तुम्हारी दवा लेने जा रई हूं...'
     उसने अंगूठा-टूटी चप्पल पहनी, कमरे के किवाड़ उढ़काये और उस तीन फ़ुट चौड़ी गली में यहां-वहां बिखरे कूड़े और बैठे हुए लोगों के मध्य से राह बनाती नुक्कड़ पर बातें करती औरतों में से अपनी पड़ोसन को सम्बोधित किया- 'मौसी, मैं मां की दवा लेके आ रई. मां को फिर बुख़ार चड़ गया , ज़रा ध्यान रखियो...' और वह तेज़ी से उस बड़ी गली में आगे बढ़ गयी.


     मुख्य रास्ते पर शुरू की इमारत की दो दुकानें हरदम बन्द ही रहती थीं. कहते हैं, उसके तलघर में जिम के बहाने यौनाचार चलता था. उसके बग़ल में स्थित एयरटेल ग्राहक सेवा केन्द्र के कर्मचारी भी जा चुके थे. उसको लगकर था मेडिकल स्टोर. सड़क पर आवा-जाही काफ़ी कम हो गयी थी. लगभग सुनसान था. इक्का-दुक्का बाईक या कार आ-जा रही थी.


     अपनी गली से प्रकृति ज्यों ही मुड़कर सड़क के किनारे-किनारे चार-छह क़दम चली, एक कार उसके पार्श्व में एकदम नज़दीक आकर रुकी. कार का पिछला दरवाज़ा उसके सामने इस तरह खुला कि उसे ठिठकना पड़ा. वह भौंचक-सी दरवाज़े के बाज़ू से निकलने की सोच ही रही थी कि किसीका बलिष्ठ हाथ उसके मुंह पर आ चिपका और उसे घसिट लिया गया कार के भीतर. उसने अपनी मुट्ठी में दरवाज़ा पकड़ पैरों को हवा में उछाल-उछालकर ख़ासा विरोध किया परन्तु उसकी एक न चली. ड्राइविंग सीट से बाहर आये युवक ने उसे अन्दर धकेल कर दरवाज़ा लगा दिया. खींचने वाले के पीछे बैठे युवक ने भी उसके हाथ-पैर समेटने में शीघ्रता दिखायी. उसीने उसके मुंह पर रूमाल बांध दिया और हाथों को किसी फ़ीते से. अब वह उन दोनों के बीच में लाचार थी. पैर खुले थे पर उनको चौथे लड़के ने दबोच रखा था.


     सड़क पहले की तरह चल रही थी. दुकानदार अपनी दुकानें बढ़ाने के प्रयास में थे. कतिपय ग्राहक भी थे. किसीने न देखा हो, यह तो सम्भव नहीं पर कहीं से कोई शोर सुनायी नहीं दिया. हां, गली के मुहाने से सटकर बैठा एक विकलांग भिखारी अवश्य ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया- 'बचाओ!... अरे कोई बचाओ!...' राहगीरों ने उसे पागल समझ उधर ध्यान न देना ही मुनासिब समझा. 


     कार ने रफ़्तार पकड़ ली थी. आगे की सीट पर बैठे लड़के ने प्रकृति के पैर भी बांध दिये थे. अब उसका साक़ी का रोल प्रारंभ हुआ... पीछे के युवक एक हाथ में गिलास पकड़े दूसरे से प्रकृति के अंगों से छेड़छाड़ कर रहे थे. मदिरा सेवन समाप्त हुआ तो उन्होंने प्रकृति को निर्वस्त्र करने में देर न लगायी. पैर मुक्त हुए तो प्रकृति ने संभवतः आख़िरी बार पूरा ज़ोर लगा दिया लेकिन अफ़सोस... हैवानियत ही हावी रही.
     दिल्ली के अलग-अलग रास्तों पर कार दौड़ रही थी. अन्दर बारी-बारी से वे चारों अपनी हवस को अन्जाम देते रहे...
     ऊब गये तो निर्जन-सी जगह देख उसे फेंक दिया. उसके कपड़े भी उस पर झोंक दिये.


     थोड़े समय पश्चात एक ख़ाली ऑटो उस राह से गुज़र रहा था. हेड-लाइट में ऑटो वाले ने उसे देख लिया. रुका, उठाया, पिछली सीट पर लिटाया. जी नहीं, वह उसे अस्पताल अथवा पुलिस चौकी नहीं ले गया बल्कि मोबाइल से अपने तीन दोस्तों को यह ख़ुश-ख़बर दी. भोर होने तक उन्होंने भी प्रकृति की देह के कोने-कोने को टटोल-झिंझोड़कर अपना जीवन सार्थक किया. एक बंगले के गेट के सामने उस निर्जीव-सी गठरी को डालकर वे भी अपने रास्ते चल दिये.


     बंगले का चौकीदार सुबह की नींद में मस्त था. कुत्ते के भौंकने से उसकी पलकें खुलीं. आंखें मलते हुए उसने देखा तो बाहर अस्त-व्यस्त दशा में -प्रायः नग्न- एक लड़की पड़ी हुई थी. उसने तुरंत कॉलबेल बजाकर अपने मालिक को उठाया. वे डाक्टर थे मगर सेवा-निवृत्त. यूं ही अपने घर पर ही मरीज़ों की जांच कर उन्हें दवाइयां लिख देते थे. वे अकेले ही रहते थे; पत्नी का देहांत हो चुका था और बेटा-बेटी दोनों विदेश में थे.


     उन्होंने चौकीदार को एक चादर दी और कहा कि वह उस लड़की को उढ़ाकर सामने के कमरे में, जिसे वे डिस्पेन्सरी के तौर पर इस्तेमाल करते थे, लाकर लिटा दे. उन्होंने उसकी नब्ज़ देखी. उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे. उसकी दर्दनाक हालत से वे दहल-से गये. वह बेहोशी में कराह रही थी. उसकी जांघों-पावों पर खून के धब्बे सारी दास्तान बयान कर रहे थे. आधे-अधूरे शब्द भी उसके मुंह से बीच-बीच में निकल पड़ते थे- 'छोड़ दो, मेरेको छोड़ दो...' अनुभवी बुजुर्ग डाक्टर को पूरा माज़रा समझने में वक़्त नहीं लगा लेकिन उनकी दिक़्क़त यह थी कि उनके उस काम-चलाऊ दवाखाने में किसी प्रकार की वैद्यकीय सुविधाएं नहीं थीं. वे बूढ़े भी हो गये थे. उनको लगा, शायद वे अकेले इस केस को सम्भाल नहीं पायेंगे. निकट ही डा. शर्मा और डा. त्रिपाठी रहते हैं,
क्यों न उनको बुला लिया जाये...


     चौकीदार वापिस फाटक पर चला गया था. वे जल्दी से कॉरिडॉर में आये. वहीं से चिल्लाकर चौकीदार से बोले, 'फटाफट जा...  शर्मा और त्रिपाठी को बुला ला....' उनकी आवाज़ अन्दर कसमसाती कुछ-कुछ सुध में आ रही प्रकृति के कानों की सीमा तक चली गयी. वह लड़खडाती, गिरती-सम्भलती किसी तरह दरवाज़े तक आकर चौखट का सहारा लिये सांस लेने रुकी. 


     चौकीदार के जाने के उपरांत डाक्टर पलटे तो प्रकृति बेतरतीब-सी चादर लपेटे झुकी-झुकी-सी कांप रही थी. उसने ख़ुद को किसी प्रकार सहेजा और रुक-रुककर बोली, 'साब... आप बी...!' इतना कहते-कहते वह वहीं भहराकर गिर पड़ी. उसके मुंह से अस्फुट शब्द निकल रहे थे- 'आप... आप तो मेरे पे रहम करो... मां की दवाई... पोंचानी है... बेचारी मरी होगी... या जिन्दा... पता नईं...'
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095. 

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