सोमवार, 22 दिसंबर 2014

चंद चुनिंदा, श्रेष्ठ ग़ज़लें

gazal009 (Mobile)

प्यारेलाल शोकी

जिन प्रेम रस चाखा नहीं अमृत पिया तो क्या हुआ।
जिन इश्क में सर ना दिया सो जग जिया तो क्या हुआ।

 

ताबीज औ तूमार में सारी उमर जाया किरी,
सीखे मगर हीले घने मुल्ला हुआ तो क्या हुआ।

 

जोगी न जंगम से बड़ा रंग लाल कपड़े पहन के,
वाकिफ नहीं इस हाल से कपड़ा रँगा तो क्या हुआ।

 

जिउ में नहीं पी का दरद बैठा मशायख होय कर,
मनका रहत फिरता नहीं सुमिरन किया तो क्या हुआ।

 

जब इश्क के दरियाव में होता नहीं गरकाब तो,
गंगा, बनारस, द्वारका पनघट फिरा तो क्या हुआ।

 

मारम जगत को छोड़कर दिल तन से ते खिलवत पकड़,
शोकी पियारे लाल बिन सबसे मिला तो क्या हुआ।

 

अमीर खुसरो

जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर।
ऐसा नहीं कोई अजब रास्ते उसे समझाए कर।

 

जब आँख से औझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया।
हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर।

 

तू तौ हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है।
तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिलो तम आय कर।

 

जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ।
तेरी जो चिंता दिल धरूँ एक दिन मिलो तुम आय कर।

 

मेरा जो मन तुम ने लिया तुमने उठा गम को दिया।
तुमने मुझे ऐसा किया जैसा पतंगा आग पर।

 

खुसरो कहै बातें गजब, दिल मैं न लावे कुछ अजब।
कदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर।


 

जयशंकर प्रसाद

सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं
बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं।

 

उन्हें अवकाश ही इतना कहाँ है मुझसे मिलने का
किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं।

 

जो ऊँचे चढ़ के चलते हैं वे नीचे देखते हरदम
प्रफुल्लित वृक्ष की यह भूमि कुसुमागार करते हैं।

 

न इतना फूलिए तरुवर सुफल कोरी कली लेकर
बिना मकरंद के मधुकर नहीं गुंजार करते हैं।

 

.प्रसाद' उनको न भूलो तुम तुम्हारा जो कि प्रेमी हो
न सज्जन छोड़ते उसको जिसे स्वीकार करते हैं

 

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

भेद कु खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूंजी तुम्हारी मिल में है।

 

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये
हाथ में आ जायेगा, वह राज सौ महफिल में है।

 

तर्स है ये देर से आँखें गड़ी शृंगार में
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है।

 

पेड़ टूटेंगे हिलेंगे जोर की आँधी चली
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है।

 

ताक पर है नमक मिर्चा लोग बिगड़ें या बनें
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है।

 

नार्वी

आपका तावीज, गंडे आपके
आपके सब तीर्थ, पडे आपके।


आपकी जेबों में गर्मी जिस कदर
उस कदर हैं हाथ ठंडे आपके।


जिस तरह भी थापिए इस देश पर
आपका गोबर है कंडे आपके।


रफ्त: रफ्त: पीठ पुख्ता हो गयी
हैं बड़े मजबूत डंडे आपके।


ये समर्थन है कि अवसरवादिता
सबके हाथों में हैं झंडे आपके।

 

 

सुल्तान अहमद

वैसे तो बंद आज भी अपने ही घर में हूँ
सच पूछिए तो मैं बड़े लंबे सफर में हूँ।


देने लगे हैं पाँव के छाले तमाम दर्द,
मंजिल से अब भी दूर बहुत रहगुजर हूँ।


कतरा रहे हैं लोग तो पहचानने से यूँ
बाहर से आके जैसे कि उनके शहर में हूँ।


ठंडी नहीं यहाँ की सुबह और न शाम है,
हर पल जो जल रही है उसी दोपहर में हूँ।


बढ़ने लगी हैं और भी लपटें ये आग की,
पथराव के मैं बर्फ के जब से असर में हूँ।


खामोशियों में बन्द है ज्वालामुखी मेरी,
अब वो नहीं हूँ मैं कि जो उनकी नजर में हूँ।

 

हस्तीमल हस्ती

क्या सच क्या है ख्वाब हमें होश तक नहीं

हर शे पै है नकाब हमें होश तक नहीं।

 

हर मोड़ पर है प्यास बुझाने की आरजू

हर मोड़ पर सराब हमें होश तक नहीं।


मिट्‌टी की गागरों सा है हर एक आसरा
और वक्त है चिनाब हमें होश तक नहीं।


कछ और इस्तिहानों की देते हैं दावतें

ये नाम, ये खिताब हमें होश तक नहीं।

 

चेहरा ही अपना सिर्फ बदलते हैं बार बार
मरते नहीं अजाब हमें होश तक नहीं।


अपने दिलो-दिमाग के हर इक सवाल का

हम खुद ही हैं जवाब हमें होश तक नहीं।

 

श्रद्धा जैन


अजीब शख्स था, आखों में ख्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज पे, अपना किताब छोड़ गया।

 

नजर मिली तो अचानक वो झुका के नजरें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया।

 

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूंगी मैं

वो गुफ्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया।

 

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म हैं,. कैसा सराब' छोड़ गया।

 

सहर के डूबते तारे की तरह बन ‘श्रद्धा’
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया।

 

विनीता गुप्ता

डिबिया में है धूप का टुकड़ा, वक्त पड़ेगा खोलूँगी
आसमान जब घर आएगा, मैं अपने पर तोलूँगी।


ओ पगडंडी पदचापों के गीत सुनाना ना मुझको
बीहड़ जगंल को मैं अपने काँधे पर ही ढो लूंगी।


नन्हा बिरवा तुलसी का, अपने आँगन में बो लूंगी
कोई राम मिलेगा तो, मैं भी उसके पग धो लूंगी।


प्रबल ज्वार अब उमड़ पड़ा, अपने तटबन्ध संभालो तुम
अब तक थी, खामोश मगर, अब तो मैं भी लब खोलूँगी।


सुनो, हवेली हूँ मैं मेरे पीछे ठोस विरासत है

कच्ची नहीं नींव इतनी, जो आसानी से डोलूंगी।

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(साभार, अनभै साँचा - जनवरी-मार्च 2013, समकालीन ग़ज़ल विशेषांक)

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