शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का चिंतन आलेख - कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना !

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

दुनिया के सामने दिखावा अधिक जरूरी है या अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर उसे मानना और उस पर अमल करना? यह एक ऐसा ज्वलन्त सवाल है, जिसका उत्तर सौ में से निन्यानवें लोग यही देना चाहेंगे कि अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर उसे मानना और उस पर अमल करना ज्यादा जरूरी है, लेकिन अपनी आत्मा की विवेक-सम्मत आवाज़ को सुनकर भी उस पर अमल बहुत ही कम लोग करते हैं। इस ज्वलंत किन्तु शाश्वत प्रश्न पर कुछ विचार मननीय हो सकते हैं। 

प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है ? मेरा मानना कि बचपन से, जब से हम प्रारम्भिक और प्राथमिक स्तर पर सोचना-समझना शुरू करते हैं, घर-परिवार में हर जगह हमें कदम-कदम पर यही सिखाया जाता है और यही सुनने को मिलता है कि ऐसा मत करो वैसा मत करो नहीं तो “लोग क्या कहेंगे?” अर्थात् ये नकारात्मक वाक्य हर दिन और बार-बार सुनते रहने के कारण हमारे अवचेन मन में गहरे में नकारात्मक रूप से ऐसा स्थापित हो जाता है कि हम इसके विपरीत किसी सकारात्मक बात को चाहकर भी सुनना नहीं चाहते। खुद अपनी आवाज़ को भी नहीं सुन पाते हैं, अपनी आवाज़ को भी अनसुना कर देते हैं!

आत्मा की आवाज़ की उपेक्षा के दुष्परिणामस्वरूप हम हर समय असन्तुष्ट और परेशान रहने लगते हैं। हमें अपना घर संसार निरर्थक और नीरस लगने लगता है। हम अपनी आन्तरिक खुशी बाहरी दुनिया और भौतिक साधनों में तलाशने लगते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हमारी सच्ची और स्थाई खुशी अपने आप के अन्दर ही विद्यमान रहती है। क्योंकि- “आन्तरिक खुशी ही तो असली खुशी है।” इसे जानते-समझते हुये भी हम सिर्फ और सिर्फ बाहर की दुनिया में वो सब तलाशते रहते हैं, जिसकी प्राप्ति भी हमें अपूर्ण ही बनाये रखती है और इस अपूर्णता को तलाशने में हम अपना असली खजाना अर्थात् अपनी जवानी, उम्र और अमूल्य समय लुटाकर हमेशा को कंगाल हो चुके होते हैं।

इस सच्ची बात का ज्ञान होने तक जबकि हम अपना जीवन बाहरी खोज और भौतिकता में गँवा चुके होते हैं, हम इतने थक चुके होते हैं, इतने निराश हो चुके होते हैं कि हम कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं रह पाते हैं, बल्कि इस बात का जीवन भर पछतावा होता रहता कि हम निरर्थक कार्यों में अपनी जवानी, उम्र और अमूल्य समय लुटा चुके हैं। इस पछतावे में भी हम जीवन के शेष बचे अमूल्य समय को रोते बिलखते बर्बाद करते रहते हैं। हम ये दूसरी मूर्खता, पहली वाली से भी बड़ी मूर्खता करते हैं। जिससे अन्तत: अधिकतर लोग तनाव तथा अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं।

इसलिए ऐसे हालात में हमें हमारे पास जो कुछ-समय और जीवन शेष बचा है, उसका बेहतर से बेहतर सदुपयोग करना चाहिए और अपने जीवन को संभालना चाहिए यही सबसे बड़ी समझदारी है। जिसके लिये पहली जरूरत है कि हम सबसे पहले तो इस बात को भुला दें कि-”लोग क्या कहेंगे?” दूसरी बात ये कि हम खुद की जरूरतों का और वास्तविकताओं का आकलन करें फिर पहली बात के साथ ही साथ हम ऐसा कोई अनुचित काम भी नहीं करें, जिससे हमारी खुद की या अन्य किसी की शान्ति भंग हो। यही जीवन जीने का वास्तविक किन्तु कड़वा सच है।

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आकाशवाणी से प्रसारित

लेखक का चिंतन साभार

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