मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

नूतन पांडेय का आलेख - आत्‍मा की आवाज 'क्‍लॉड ईथरली'

आत्‍मा की आवाज 'क्‍लॉड ईथरली'

तारसप्‍तक के प्रमुख कवि मुक्तिबोध अपनी मृत्‍यु के पचास वर्ष बाद भी बेहद चर्चित, विवादास्‍पद और प्रासंगिक साहित्‍यकार माने जा सकते हैं । निराला के बाद आलोचकों की दृष्टि में सर्वाधिक केंद्रीभूत मुक्तिबोध व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व से अपने पाठकों और आलोचकों पर अनूठा रहस्‍यमय प्रभाव छोडते हैं । यह निर्विवाद सत्‍य है कि मुक्तिबोध को जितनी पहचान और प्रशंसा एक कवि के रूप में मिली (भले ही यह प्रशंसा मृत्‍यु के बाद मिली हो) उतनी शायद कहानीकार के रूप में नहीं मिली । लेकिन इसका तात्‍पर्य यह कदापि नहीं कि उनकी कहानियाँ उनकी कविताओं से कमतर आँकी जाएँ । कहना उचित ही होगा कि उनकी कहानियाँ भी उसी तेवर, उसी उग्रता और उसी बेचैनी के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्‍तुत होती हैं,जैसी उनकी कविताएं यदि उनकी कविताएं पढते वक्‍त पाठक गद्य की गहराई में डूबते हैं, तो कहानियाँ पढते वक्‍त कविता की सी रसानुभूति भी करते हैं । उनका साहित्‍य विधाओं की परंपरागत मान्‍यताओं से बाहर निकलकर अपने मानदंड खुद बनाता है । सृजन में विचारों का अविरल प्रवाह, मन के भीतर झांकने, उसे टटोलने की जादूगरी और शिल्‍पगत मौलिकता मुक्तिबोध को किसी भी विधा में बांधकर सहेजने में असमर्थ है । यही कारण है कि 'उनकी कविता बढते - बढते डायरी हो जाती है और डायरी चलते - चलते कहानी ।' (मुक्तिबोध्‍, काठ का सपना, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्‍ली-।।, संकलन 1987, पृ. 05) यहाँ तक कि उनकी कुछ लंबी कविताएं सहज ही कहानी या लघु उपन्‍यास की श्रेणी में आ खडी होती हैं ।

देखा जाए तो मुक्तिबोध की कहानियाँ उनके कवि हृदय में छिपी संवेदना को ही मुखर और अभिव्‍यक्‍त करती हैं । 'जिस तरह उनकी कविताओं में कथाकार की ब्‍यौरे के सूक्ष्‍मावलोकन की दृष्टि बार-बार प्रकट होती है, उसी तरह उनकी कहानियों में भी एक कविता का स्‍वर ही अकसर उभर आता है । यहाँ तक कि संवेदना के स्‍तर पर कई बार उनकी कविता और कहानी में अंतर करना भी कठिन हो जाता है ।'

मुक्तिबोध का समस्‍त उपलब्‍ध कथा साहित्‍य श्री नेमिचंद जैन द्वारा 'मुक्तिबोध रचनावली' के तीसरे खंड में संपादित किया गया है । सन् 1936 से 1964 तक मुक्तिबोध ने पचासों कहानियाँ लिखीं, कुछ पूर्ण, कुछ अपूर्ण, कुछ कई-कई बार ड्राफ्ट की गई, लेकिन हर कहानी अपने में पूर्ण, कुछ नया कहती हुई, अपने भीतर की आग को बाहर उडेल देने के लिए व्‍याकुल, बेचैन । मुक्तिबोध के व्‍यक्तित्‍व के भीतर की छटपटाहट, समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी और तडप लिए मुक्तिबोध की कहानियाँ उनकी आत्‍म प्रतिकृति और आत्‍मा का प्रतिबिंब है । आलोचकों का आरोप और पाठकों की शिकायत है कि अवचेतन मन की बेहद जटिलताओं, लेकिन इस जटिलता के पीछे छिपी है उनकी वह सामाजिक संवेदना, जिसे अनुभूत कर पाना हर किसी के वश की बात नहीं और जटिलता की इसी सीढी से मानवता के विकास का द्वार खोलने का प्रयत्‍न मुक्तिबोध करते हैं ।

मानव मन की जटिलताओं के मिस सामाजिक संवेदना और वैयक्तिक अंतर्द्वंद्व को जागृत करती जापान के छोटे से प्रांत हिरोशिमा पर अमरीका द्वारा द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान एटम बम फेंके जाने की घटना विश्‍व इतिहास की बर्बरतम घटनाओं में से एक है जो मानव जाति की कई पीढियों को पंगु कर देने की मूक गवाह है । बम फेंकने की यह घटना इतिहास के शिलाखंड पर उकेरे उन बदनुमा निशानों की तरह है, जिन्‍हें समय की अविरल धारा भी शायद कभी मिटा न सके । महान विनाश को अपने भीतर समेटे छोटे से बम की धमक सुनकर अमरीका को विजयोन्‍मत्‍त होते सारे विश्‍व ने देखा, लेकिन उस बम को फेंककर पूरे अमरीका में 'वार हीरो' बने क्‍लाड ईथरली के मन के भीतर क्‍या कोई झाँक पाया । वही क्‍लाड ईथरली, अमरीकी सेना का विमान चालक जो बम गिराने के बाद अपनी आत्‍मा की आवाज को रोक न सका और पहुँच गया उस वीरान जगह पर हँसते खेलते लोगों की लाशों के ढेर को देखने । क्‍या हुई होगी उसकी मन:स्थिति, क्‍या उसने सचमुच खुद को पुरस्‍कार के काबिल समझा होगा । क्‍या अनगिनत लोगों की मौत के जिम्‍मेदार खुद पर गर्व महसूस किया होगा । क्‍या अमरीका का 'वार हीरो' अपनी आत्‍मा से उठते सवालो का सामना करने का साहस कर पाया होगा । क्‍लॅाड ईथरली के अंतसंघर्ष को उजागर करती मुक्तिबोध की यह कहानी भौतिकतावादी युग में परिस्थिति के वशीभूत पापाचार करने वाले संवेदी व्‍यक्ति के मनोविज्ञानको फेंटसी के माध्‍यमसे पाठकों के समझ रखती है ।

कहानी का उत्‍साही पात्र क्‍लाड ईथरली बम की विभीषिका से अनजान, भौतिकता की चमक से चौंधियाकर हिरोशिमा पर बम फेंक देता है, लेकिन उस विध्‍वंस, महाविनाश को उसकी आत्‍मा सह नहीं पाती । अपराधबोध से ग्रस्‍त होकर वह अपनी आत्‍मा का बोझ कुछ कम करने के लिए जरूरतमंद एवं असहायों को पैसा भेजना शुरू कर देता है । अमरीकी सरकार ने उसकी वीरता पर उसे कई पुरस्‍कार दिए, पर उसकी आत्‍मा ईनाम के बदले पाप का दंड चाहती थी । अत: वह ऐसे काम करने शुरू कर देता है, जिससे उसे सजा मिले । वह कई बार जेल जाता है पर हर बार उसके पुराने रिकॉर्ड के कारण छोड दिया जाता है । अमरीकी सरकार उसका दिमाग दुरुस्‍त करने के लिए उसे पागलखाने में डाल देती है । क्‍लाड अपनी आत्‍मा का विद्रोह दबा नहीं पाता और अपनी मानसिक स्थिति खो बैठता है ।

कहानी सोचने पर मजबूर करती है कि क्‍या ईथरली वाकई पागल था । नहीं वह तो एक संवेदनशील मानव था । अणु बम फेंकने का विरोध करने वाली आत्‍मा की आवाज था । वह मानसिक रोगी नहीं था, बल्कि वह तो प्रतीक था आध्‍यात्मिक अशांति और मानसिक उद्वेग का, जो हर संवेदनशील व्‍यक्ति को व्‍यथित करता है । वह प्रतीक था उस करुणा-द्रवित हृदय का जो गलत कार्य करने के पश्‍चात् अंतश्‍चेतना में धधक रही आत्‍मा की सुगबुगाहट को, आत्‍मा के विद्रोह को न तो दबा सकता है और न ही शांत कर सकता है । अन्‍याय के विरुद्ध विद्रोह करने का साहस भले ही उस व्‍यक्ति में न हो, लेकिन पाप के बोझ से कुंठित और घुटनशील जरूर महसूस करता है । 'ईथरली और सामान्‍य मानव में यही बुनियादी एकता और अभेद है । मुक्तिबोध इसी संवेदनशील बौद्धिकता को हर व्‍यक्ति के भीतर जिंदा रखना/देखना चाहते हैं जिससे विश्‍व कल्‍याण और सामाजिकता का विकास हो सके । सामाजिक संवेदना को मारकर किसी व्‍यक्ति की निजी वैयक्तिक सफलता के पक्षधर वे बिल्‍कुल नहीं हैं । ईथरली के माध्‍यम से वे अपनी आत्‍मा की आवाज सुनने वाले व्‍यक्ति के भीतरी द्वंदव को चित्रित करते हैं और भिन्‍न-भिन्‍न मनोविज्ञान के व्‍यक्तियों को वर्गीकृत करते हैं । 'वस्‍तुत: जो आदमी आत्‍मा की आवाज कभी कभी सुन लिया करता है और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है, आत्‍मा की आवाज जो लगातार सुनता है और कहता कुछ नहीं है, वह भोला भाला, सीधा सादा बेवकूफ है। जो उसकी आवाज बहुत ज्‍यादा सुनता है और वैसा करने लगता है, वह समाज विरोधी तत्‍वों में यो ही शामिल हो जाया करता है । लेकिन जो आत्‍मा की आवाज जरूरत से ज्‍यादा सुनकर हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्‍म का पालन करता है, वह निहायत पागल है । पुराने जमाने में संत हो सकता है, आज कल उसे पागलखाने में डाल दिया जाता है ।'

ईथरली के पात्र के माध्‍यम से मुक्तिबोध मध्‍यवर्गीय जन को चेतनशील बनाने का प्रयत्‍न करते हैं । मध्‍यवर्ग की यह नियति है कि वह अपनी आत्‍मा की आवाज को चाहकर भी अनसुना नहीं कर पाता, जिस कारण अंतर्द्वंद्व से ग्रस्त हो तनावपूर्ण जिंदगी जीने को विवश हो रहा है । यही कारण है कि उसका व्‍यक्तित्‍व समाज के लिए उपयोगी न होकर विध्‍वंसक सिद्ध हो रहा है । मुक्तिबोध चाहते हैं कि मध्‍यवर्ग झूठी सामाजिक प्रतिष्‍ठा, तुच्‍छ स्‍वार्थ, अहंग्रस्‍तता, भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति आसक्ति से ऊपर उठकर सामाजिक संवेदना और मानवतावादी मूल्‍यों की प्रतिष्‍ठा में अपना सार्थक योगदान दे ।

क्‍लॅाड ईथरली का आत्‍मसंघर्ष और मानसिक द्वंद्व खुद मुक्तिबोध का आत्‍मसंघर्ष और मानसिक द्वंद्व है, जो 'उनके व्‍यक्तित्‍व में बद्धमूल है ।' मध्‍यवर्गीय व्‍यक्ति की मानसिक स्थिति, असंतोष, विवशता और घुटन भरे माहौल से निकलने की छटपटाहट, अपने अस्तित्‍व, अपने वजूद को बनाए रखने की इच्‍छा और इन सबसे बढकर अपनी आत्‍मा को जिंदा रखने की बेइंतहा ख्‍वाहिश, जो विक्षुब्‍ध जिंदगी की वैज्ञानिक प्रयोग शाला' के इस कवि में भीतर गहरे तक समाहित है, उन्‍होंने रचनात्‍मक और वैचारिक स्‍तर पर अपने पात्र के माध्‍यम से मुखर किया है । कहानी के एक पात्र और मैं के मध्‍य हुआ वार्तालाप उनके भीतर उठ रहे प्रश्‍नों की ज्‍वाला है, जो मुक्तिबोध के तद्युगीन समय की मांग के अनुरूप अत्‍यंत ज्‍वलंत और प्रासंगिक थे । ऐसे अनेक प्रश्‍नों को समाज के सामने प्रस्‍तुत करके वे समाज को चेतनाशील और सतर्क करते है । वे मध्‍यवर्ग के लोगों को व्‍यक्तित्‍वांतरण करने के ि‍लए भी प्रेरित करते हैं ।भले ही वे जानते हैं कि यह आत्‍मसंघर्ष की जटिल और तनावपूर्ण स्थिति है, जिसका सामना कोई विरला ही कर पाता है ।

मुक्तिबोध की यह खूबी है कि वे अपनी कहानियों में शिल्‍पगत चमत्‍कार पैदा करने के लिए फेंटसी का सहारा लेते हैं । अपनी इस कहानी में भी उन्‍होंने फेंटसी के माध्‍यम से भारत में पाश्‍चात्‍य प्रभाव के कारण उत्‍पन्‍न सांस्‍कृतिक खतरे से समाज को सचेत किया है । भारतीय समाज एवं संस्‍कृति के पुरातन मूल्‍यों का स्‍थान आज पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता एवं संस्‍कृति ने ले लिया है, जिसके दुष्‍प्रभावों से अनभिज्ञ हम उसका अंधानुकरण कर रहे हैं । मुक्तिबोध का मानना है कि 'भारत के हर बडे नगर में एक-एक अमरीका है ।' वे साहित्‍य और समाज दोनों में ही पाश्‍चात्‍य मूल्‍यों के प्रवेश को अस्‍वीकृति देते हैं । ऐसे मूल्‍य, जिनके कारण साहित्‍य, समाज से दूर हो जाए उन्‍हें मंजूर नहीं । उन्‍हें इस बात का भी आक्रोश है कि 'इंडोनेशियायी, चीनी या अफ्रीकी साहित्‍य या लुमुम्‍बा के काव्‍य से प्रेरणा लेने की बजाय ब्रिटिश अमरीकी या फ्रांसीसी कविता के मूड्स, मन:स्थितियों को हमारे यहां लाया जाता है ।

सामाजिक और सांस्‍कृतिक मूल्यों का आयात उन्‍हें नागवार लगता है, क्‍योंकि वो एक सांस्‍कृतिक शून्‍य बनाता है । इसीलिए मुक्तिबोध को 'देश की आजादी चॉटे जैसी लगती है जो रोने भी नहीं देती ।' वे दुखी होते हैं ये देखकर कि मौलिकता को बनाए रखने की बजाय हम पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति के पीछे भाग रहे हैं और कल्‍चरल वैक्‍यूम में जी रहे हैं । फलत: कोई इलियट के पास जाता है तो कोई अर्नाल्‍ट टॉएयनबी के पास, तो कोई और किसी तरफ (पृ 42) आत्‍मालोचन और आधुनिक संघर्षशीलता के स्‍थान पर समझौता परस्‍त बनकर लोग पूंजीवाद के आगे घुटने टेक रहे है तभी तो 'हमारे देश में भी कईयों ईथरली हैं, कईयों साम्राज्‍यवादी, युद्धवादी लोग है' और इसीलिए 'मैकमिलन ने हिंदुस्‍तान को भले ही अपने सैनिक गुट का न माना हो, लेकिन संस्‍कृति और आत्‍मा से अपने साथ होना जरूर स्‍वीकारा था ।'

मुक्तिबोध के लिए फेंटसी आधुनिक और जटिल यथार्थ को वाणी देने का सशक्‍त हथियार है, जिसके माध्‍यम से उन्‍होंने समाज के विकृत यथार्थ को पेश करके मानवतावादी मूल्‍यों की स्‍थापना करने का साहस किया ।' (नवल, नंदकिशोर, मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना, राजकमल प्रकाशन, 1998 पृ. 270) तभी तो अपनी फेंटसी के माध्‍यम से वे पूरी कहानी में क्‍लॅाड ईथरली के बारे में और अधिक जानने की उत्‍सुकता बनाए रखने और पाठकों से संप्रेषणीयता स्‍थापित करने में सफल होते हैं और पाठकों को अनुभव ही नहीं विश्‍वास भी करा देते हैं कि 'हम सब अपने अपने मन, हृदय, मस्तिष्‍क में ऐसा ही एक पागलखाना है, जहाँ ह उन उच्‍च, पवित्र और विद्रोही विचारों और भावों को फेंक देते हैं, जिससे धीरे-धीरे या तो वे खुद बदलकर समझौतावादी पोशाक पहन सभ्‍य, भद्र हो जाएँ, यानि दुरुस्‍त हो जाएं या उसी पागल खाने में पडे रहें । इसका मतलब यह कि क्‍लॅाड ईथरली हमारे यहाँ भले ही देह रूप में न रहें, लेकिन आत्‍मा की वैसी बेचैनी रखने वाले लोग तो यहाँ रह ही सकते हैं । (पृ. 160)

मुक्तिबोध ने कहानी का विस्‍तार पात्रों के मध्‍य हुए वार्तालाप द्वारा बडी आसानी से कर लेते है । कहानी की संप्रेषणीयता बनाए रखने और कथानक को विकसित करने में यहाँ 'मैं' की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है । 'मैं' के माध्‍यम से मुक्तिबोध समाज को संघर्ष का सामना करने के लिए प्रेरित करते हैं और सार्थक उद्देश्‍य का वहन करने में पूर्ण समर्थ बनाने का जतन करते हैं । 'कहानी का नैतिक लक्ष्‍य हमारी उस उदासीनता को बेधता है, जो मानवीयता की जलती पीडाओं को अनसुना कर देती है, उनके भीतर एक अलगाव बनाए रखती है ।' (मोतीराम वर्मा, मुक्तिबोध का गद्य साहित्‍य' विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्‍ली 1973,पृ. 56) वस्‍तुत: क्‍लाड ईथरली कहानी बार-बार पढे जाने और पुन: पुन: विश्‍लेषण किए जाने की दरकार रखती है।

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डॅा नूतन पांडेय

केंद्रीय हिंदी निदेशालय

पश्‍चि‍मी खंड - 7, रामकृषण पुरम

‍दि‍ल्‍ली 110066

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