सोमवार, 15 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - मोबाइल के बेपरवाह इस्तेमाल के बढ़ते खतरे

मोबाइल के बेपरवाह इस्तेमाल के बढ़ते खतरे
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन
आज के दौर में भला कौन इंकार कर सकता है कि मोबाइल फोन विज्ञान की सबसे बड़ी देन है ? मनुष्य आरंभ से ही अपने दूर बैठे परिवार व मित्रों को सन्देश भेजता था। लेकिन, उसके पास संदेश भेजने के प्रर्याप्त साधन न थे। वह पक्षियों के माध्यम से अपना संदेश भेजा करता था, परन्तु वह संदेश उसके परिवारजन या मित्रों तक पहुँचता था या नहीं इस बात पर उसे सदैव सन्देह रहता था। आज मोबाइल के रूप में जो क्रान्ति आई है, वह अंतहीन इन्हीं खोजों और आविष्कारों का परिणाम है। पहले इंसान पत्र व तार के माध्यम से सन्देश भेजता था परन्तु मोबाइल का आविष्कार होने से वह कभी भी व कहीं से भी सुविधापूर्वक अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों और अजनबियों से भी बात कर सकता है।
मोबाइल आज उपकरण ही नहीं है अपितु उसके अंदर और तकनीकी बदलाव कर इसे इतना आधुनिक बना दिया गया है कि हम इसके माध्यम से विभिन्न अवसरों की फोटो व वीडियो रिकाडिंग कर सकते हैं। जहाँ चाहे वहाँ रेडियो और टीवी का मज़ा इस उपकरण के माध्यम से ले सकते हैं। मोबाइल के ज़रिये हम ई-मेल कर सकते हैं व अपने कार्यालय को इसके माध्यम से सुचारू रूप से चला सकते हैं। यदि कोई विपत्ति आन पड़े तो मोबाइल के माध्यम से तत्काल सहायता के लिए किसी को बुला सकते हैं। ये हर कदम पर हमारे लिए बहुपयोगी बन गया है।
सुविधा, दुविधा का कारण !
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पर याद रखना चाहिए कि अत्यधिक सुविधा भी कभी असुविधा का कारण बन सकती है। सुविधा का भोग कब रोग में तब्दील हो जाता है हमें पता भी नहीं चल पाता। यह वास्तव में चिंताजनक है कि जाने-अनजाने में मानव ने इसके अत्यधिक प्रयोग के कारण स्वयं के लिए अनेकों बीमारियों को न्यौता दिया है। इसके अत्यधिक प्रयोग से कान सम्बन्धी रोग होते हैं, मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, मोबाइल हैंडसेट की स्क्रीन पर लगातार नज़रें गड़ाए रखने से आँखों की रौशनी भी मंद पड़ती जाती है । मोबाइल से उत्पन्न कंपन के कारण मनुष्य का एकांत समाप्त हो गया है। वह मोबाइल का उपयोगकर्ता नहीं रह गया, बल्कि मोबाइल ही जैसे उसका इस्तेमाल कर रहा है ! फिर भी नए ज़माने की यह 'मोबाइल गुलामी'  लोगों को इस कदर रास आ रही है कि वह इस कैद को ही आज़ादी मान बैठा है। फिर भी, मोबाइल के उपयोग व आकर्षण के सबब से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए कहना न होगा कि हम इसका प्रयोग अपनी आवश्यकताओं के आधार पर करें न कि फैशन या दिखावे के लिए।
मोबाइल बना मीडिया चैनल
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स्मरणीय है कि 1998 में मोबाइल फ़ोन एक मीडिया चैनल बन गया जब फिनलैंड में रेडियो लिंजा द्वारा पहली रिंग टोन बेचा गया था। जल्द ही अन्य मीडिया अवयव प्रकट हुए जैसे की समाचार, वीडियो गेम, चुटकुले, जनमपत्री, टीवी सामग्री और विज्ञापन। 2006 में मोबाइल फोन भुगतान मीडिया अवयव की कुल कीमत ने इंटरनेट भुगतान मीडिया अवयव को पार कर दिया और इसकी कीमत 3100 करोड़ डॉलर थी। यानी इसका मीडिया बाज़ार अपना दायरा बढ़ाता चलता गया। पहले तीन के रूप में सिनेमा, टीवी और पर्सनल कम्प्यूटर चित्रपट को गिना जाए तो मोबाइल फोन को अक्सर चौथा चित्रपट कहा जाता है। इसे मास मीडिया में सातवाँ भी कहा जाता है। पहले छः में प्रिंट, रिकॉर्डिंग, सिनेमा, रेडियो, टीवी और इंटरनेट शुमार हैं। मोबाइल फोन पर मीडिया के आगमन से अल्फा उपयोगकर्ता या केन्द्रों का पता लगाने और उन्हें पहचानने का अवसर उत्पन्न हुआ है, जो किसी भी सामाजिक समुदाय के सबसे अधिक प्रभावी सदस्य हैं।
बेशक मोबाइल हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहा हैं। इसमें हम रोज़मर्रे के काम कर सकते हैं। हम एस.एम.एस (संदेश), फ़ोन कॉल्स (बात-चीत), एम.एम.एस, गेम्स, ब्लूटूथ, जी.पी.एस, अन्तरजाल, सामाजिक नेटवर्क, चित्र, वीडियो, ध्वनि रिकॉर्डिंग वगैरह के लिए इसका प्रयोग कर सकते हैं। जरूरत पड़े तो हम किसी के जीवन में हो रही किसी घटना का वीडियो बना कर प्रमाण के रुप में न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। हम संदेश या बात-चीत कर सकते हैं। हमे मीलो दूर चलने की आवशक्ता भी नहीं पडती। हर काम पलक झपकते ही कर सकते हैं। हर बैंक आज कल मोबाइल पर आपके खाते और लेन - देन की तमाम जानकारी दे रहा है।
चमत्कृत करने वाली महाक्रांति
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भारत में मोबाइल का उपयोग आश्चर्यकारी प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। ग्रामीण या शहरी भारत के कुछ परिवारों में  एक या अधिक से अधिक मोबाइल फोन होना आम बात है। किसी आपतकाल में मोबाइल वरदान सिद्ध हो रहा है। मोबाइल की मदद से हम बस टिकट, रेल टिकट, वायु विमान में आरक्षण कर सकते हैं। कई कंपनियां फोन अनुप्रयोग डाउनलोड करने की सुविधा देतीं हैं, ट्रैकर,कॉलर, वटस्याप आदि हमारे मोबाइल संसार के गहने जैसे बन गए हैं। ऐसे अन्य न जाने कितने उपयोग हैं जो मोबाइल की अहमियत के गवाह हैं, परन्तु अब ऐसा समय भी दस्तक दे चुका है जिसमें अनेक अवसरों और मामलों में मोबाइल बंद रखने की हिदायत दी जाती है।
मोबाइल के जैविक प्रभाव
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वैसे भी कई वैज्ञानि‍क अध्ययनों से यह नि‍ष्कर्ष नि‍काला गया है कि‍ मोबाइल फोन तथा अन्य कॉडलेस टेलीफोनों के इस्तेमाल से दिमाग पर जैविक प्रभाव पड़ता है। एक ताजा अध्ययन में यह खुलासा किया गया है। अध्ययन में बच्चों तथा किशोरों को इन फोनों का इस्तेमाल करने के दौरान सतर्कता बरतने का सुझाव दिया गया है।
स्वीडन के ओरेब्रो विश्वविद्यालय द्वारा बच्चों तथा किशोरों में वायरलेस टेलीफोन के दुष्प्रभावों का अध्ययन किया गया। इसमें यह जांच की गई कि क्या किशोरों को फोन के इस्तेमाल से किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्या आती है। चिकित्सा शोधकर्ता फ्रेडरिक साडरक्विस्ट ने बालिगों या बड़ों के खून की भी जांच की है, जिससे यह पता चल सके कि बच्चों और किशोरों के दिमाग पर वायरलेस फोन के इस्तेमाल का क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है। साडरक्विस्ट ने कहा कि बड़ों की तुलना में बच्चे वायरलेस फोन की तरंगों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। वह स्वीडन विश्वविद्यालय में अपने शोध को पेश करेंगे।
ज़िन्दग़ी का सौदा क्यों ?
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अध्ययन में वायरलेस टेलीफोन और खून में प्रोटीन ट्रांसथायरेटिन की मात्रा बढ़ने को एक साथ जोड़कर देखा गया है। साडरक्विस्ट ने कहा है कि यह बढ़ोतरी ज्यादा चिंता की बात नहीं है, लेकिन चूंकि इससे दिमाग पर पड़ने वाले असर का पता चला है, तो कहा जा सकता है कि यह हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। सवाल ये है कि तकनीक के बढ़ते दायरे से पीछे हटना तो नामुमकिन है। फिर, आखिरी रास्ता यही हो सकता है कि हम इसके इस्तेमाल की जरूरतों और सीमाओं को समझें। अपने कामकाज और शौक के बीच तालमेल स्थापित करें। तकनीक की देन को आडम्बर की भेंट न चढ़ाएं। शानोशौकत के नाम पर अपनी ज़िंदगी के सुकून का सौदा करने से दूर रहें। कुछ और बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखा जा सकता है। मिसाल के तौर पर -1. जहां तक हो सकते छोटे बच्‍चों के हाथ में मोबाइल ना दें । 2. यदि‍ बच्‍चे को मोबाइल देना जरूरी ही हो जाए तो उसे कभी हाईटेक और उच्‍च तकनीक वाला मोबाइल ना दें। 3. मोबाइल फोन के रेडि‍एशन से बच्‍चों को ज्‍यादा नुकसान होता है क्‍योंकि‍ बच्‍चे इसके प्रति‍ बड़ों की अपेक्षा अधि‍क संवेदनशील होते हैं। 4. मोबाइल फोन बच्‍चों में मेमोरी लॉस और एल्‍जाइमर्स जैसी बीमारि‍यों की संभावना को बढ़ाता है। 5. रास्ते में वाहन चलाते समय बतियाने से बाज़ आएं। सड़क पर कहीं भी बेतरतीब ढंग से रूककर मोबाइल का उपयोग मत करें। जिम्मेदारी से भरे काम के समय गैरजरूरी कॉल्स से परहेज़ करें।

याद रखें कि दुनिया की मोबाइल जैसी ये तमाम सहूलियतें आखिरकार ज़िंदगी को बेहतर और खुशहाल बनाने के लिए है, इनका इस्तेमाल ज़िंदगी को ही भेंट चढ़ाकर करना किसी भी सूरत में समझदारी नहीं है।
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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित
और दिग्विजय कालेज,राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं।

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