राजीव आनंद का लघु संस्मरण - कचरों का कब्रिस्तान

स्मृतिशेष                  कचरों का कब्रिस्तान


    शहर से बाहर निकल कर हाइवे पर पहुंचने के लिए एक बगीचे से होकर निकलना, समय की बचत करवाता था. बगीचा कभी अहाते से घिरा फल-फूल के पेड़ों से भरा था. एक सुंदर घर हुआ करता था, जो पेड़ों से घिरे प्रकृति की गोद में किसी स्वर्ग से कम न था. रहने वाले कोई बंगाली परिवार था, जो कलांतर में घर-अहाते में ताला जड़ कर कलकत्ता जा बसे थे. घर ढह चुका था, बगीचे में पेड़ों के अगल-बगल झाड़ियाँ उग आयीं थीं. अहाते में एक छेद हो गया था, जो धीरे-धीरे बढ़ता हुआ एक दरवाजे का शक्ल अख्तियार कर लिया था.
    कुछ साल पहले तक इस बगीचे के बीच से गुजरना मेरे लिए सबसे खुशनुमा मंजर हुआ करता था. बगीचे के अहाते में हुई छोटी छेद दरवाजेनुमा हो चुकी है, जिससे होकर लोग हाइवे तक जल्द पहुंचने के लिए इस्तेमाल करने लगे है, लिहाजा पेड़ों के बीच से होती हुई एक सुनिश्चित पगडंडी कायम हो चुकी है.
    किसी ने एक दिन पानी का खाली बोतल उस बगीचे में फेंका था, फिर धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार की चीजें, कुछ पूरी, कुछ टूटी हुई, कुछ खंडित, कुछ अखंडित, दबी-पिचकी, मुडी-तुड़ी बगीचे में जमा होने लगी. लोग अब बाल्टी भर-भर कर कचरा लाते और बगीचे के अंदर उलट देते. देखते ही देखते वह सुंदर पेड़ों, फूलों, फलों से सजा बगीचा कचरों के कब्रिस्तान में तब्दील हो गया.
    कचरा मृत्यु का ही पयार्य है। प्रकृति की रानाईयों को समेटे वह फलता-फूलता बगीचा अब मर चुका था. बगीचे के अहाते के अंदर कचरे के ढेरों के एक नहीं कई मकबरें बन गए थे. कुछ साल पहले जहाँ आँखों को शकुन, दिल को चैन और आत्मा को तृप्ति मिलती थी, आज वहाँ भयावह कचरों के ढेरों का मकबरा कायम हो चुका था और पूरा बगीचा एक विशाल कचरागाह में तब्दील हो गया था.
    कचरा बीनने वाले छोटे-छोटे बच्चों का झुंड उन मकबरों को खोदते मिल जाते हैं, जिन्हें कचरा बीनते हुए देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कचरा ही उन्हें रूंध रहा है. आश्चर्यजनक बात यह है कि लोग कल भी बगीचे में बनी पंगड़डी का इस्तेमाल करते थे, आज भी करते है लेकिन बगीचे का कचरों के कब्रिस्तान में हुई तब्दिली किसी को दिखाई नहीं देता, लोग आज भी नाक पर रूमाल या हाथ रखकर उस पगडंड़ी से गुजर जाते हैं, कचरों का दृश्य मानों आँखों से अदृश्य हो गया हो. उपभोग के व्यभिचार का शिकार होते लोग अपने घरों से कचरा ला-ला कर जीते-जागते बगीचे को कचरों के कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया.

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815310
झारखंड

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