शशांक मिश्र भारती की कविताएं

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आज का मानव

 

 

आज का मानव

अपने स्‍वार्थों में इतना फंस चुका है

अपना करके हिंसा

आगे बढ़ रहा है

दिखता नहीं कुछ

निःशेष है अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति

रहें स्‍थिर संतुलन प्राणी जगत

अथवा

मानवीय संस्‍कृति का

उसको चाहिए

मात्र अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति।

जिसके लिए उसने अपने इष्‍ट मित्रों बन्‍धु बान्‍धवों

तक को

उपेक्षित सा बना दिया है।

किसी की क्‍या होगी प्रतिक्रिया

उसे नहीं आतुरता जानने की

और नहीं विकल उस कल्‍पना से

जो उसके द्वारा निरन्‍तर असन्‍तुलित

करने वाले क्रियाकलापों से उत्‍पन्‍न हो जायेगी।

काश!

ये मानव कुछ समझ पाता

पूर्ण तया सोने से पहले जाग पाता

अपने अस्‍तित्‍व के लिए

आवश्‍यक तत्‍वों का महत्‍व पहचान सकता

परि आवरण को यर्थाथ में

अपने अंर्तमन में उतार पाता

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मेरी अभिलाषा

 

मेरी अभिलाषा

आज से ही नहीं सदियों से

यही रही है कि-

शान्‍त- स्‍निग्‍ध बने वातावरण

समृद्धिता पाये समाज

हर्षोल्‍लासित हो मनुष्‍य

ओर

समस्‍त प्राणी जगत

जिसके लिएप्रकतफल कामना रही है मेरी

प्रकृति से

संघर्ष भी किया है प्रतिकूल परिस्‍थितियों से।

निश्‍चय ही

सफलता मिलेगी मुझे

अपनी उत्‍कण्‍ठाओं को पूर्ण करने में

अपनी वषोंर् से संचित

स्‍वर्ण रश्‍मियों सी कली को पूर्ण बनाने में

टब तो-

उत्‍साहित हूं मैं भी

संकेत मिलने से सफलता के

जिनसे आ चुका है मुझसे नवीन उत्‍साी

समाज को स्‍वच्‍छ परिवेश,गति,

व दिशा प्रदान करने के लिए

प्रकृति द्वारा प्राप्‍त मानव शरीर की

सार्थकता सिद्ध करने के लिए।

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क्‍यों रुक जाते हाथ

आज प्रात ः

अचानक ही पूछने लगी लेखनी

मुझसे,

क्‍यों विराम देने लगे हो

आवश्‍यकताओं से मुक्‍त परिवेश

त्रस्‍त परिकल्‍पनाओं को

अंकित न कर पा रहे हो

मैं तो व्‍ययकृते बर्धति का ही एक रूप हूं एक

प्रखरता आएगी उतनी ही

चलाओगो जितना मुझे तुम

हां जानती हूं मैं कि -

चलती हूं जब न रुकती हूं

तम चाहकर रोक भी न सकते। प्रारम्‍भ तो हो तुम

लेकिन-

अन्‍त का निर्धारण मैं स्‍वंय करती हूं

सदियां बीती अनेक बार

मुझे बांधने और साधने का

प्रयास किया गया,

परन्‍तु- कितने बांध सके मुझको

समय जानता है

मेरी धार कृपाण की नहीं

जो एक बार है करती

अपितु-

झंकार समस्‍त विश्‍व पर पड़ती है

स्‍माज की क्षुभित प्रक्रियायें

परिस्‍थितियां चहुं ओर की

झकझोर देती हैं, तुमको,

जब चलना पड़ता है मुझको

क्‍योंकि-

मैं लेखनी हूंऔर

उतार देती हूं कागज पर

घुमड़ रही तुम्‍हारे मन में

व्‍याप्‍त कल्‍पनाओं, अनुभवों,

समाजिक विसंगतियों के साथ

सार्थक रूप देकर

गतिलय के साथ शब्‍द देकर।

किन्‍तु - मुझे आश्‍चर्य होता है उस समय

जब रुक जाना पड़ता है

हमें अकस्‍मात ही

क्‍यों कांप जाते हैं आपके हाथ।

हां आपके हाथ

मुझको चलाने में,

तात्‍कालिकता के अनुसार प्रखर बनाने में,

मैं अभिमानी को निराभिमानी

दुर्बल को सबल

कण्‍टक को निष्‍कण्‍टक

और

भय को निर्भय करना जानती हूं

मुझे ज्ञात से अज्ञात तक पहुंचाना भी आता है।

कोई भी अनुत्‍तरित प्रश्‍न हो

खोज लाती हूं

नेतृत्‍व क्षमता का समाधान

क्‍लीवता में पौरुष भी भरकर

मैंने-

बस तुम मुझको,

चलने दीजिए। चलने दीजिए।

---.

 

 

अगली पीढ़ी इतिहास बनाती

युग बदला हम न हैं बदले

बोलो फिर क्‍या हैं बदले

आतंक हिंसा का वही ताण्‍डव

स्‍वार्थन्‍धता के गोरखधन्‍धे।

जो पहले थी पशुता कहाती

बन आतंक की छाया भाती।

गली मुहल्‍ले जल रहे सब

बाल युवा मचल रहे अब।

नेतृत्‍व की भी गोटियां सिंकती

वोट की खातिर नीतियां बिकतीं।

कैसा यह बदला युग है आया

घर -घर छायी काली छाया।

गांव जिन्‍हें शान्‍त कहते थे

अब राजनीति ने उसे गंवाया

अमृतमयी नदियों की धारा

बनी प्रदूषण की महाकारा।

आसमान भी रोता कब से

सच्‍चा मनुज सोता है जब से,

धरती -चांद सितारे जल रहे

स्‍वार्थ पूर्ति को प्रगति कह रहे।

मौलिकता अपनी भुला चुके सब

इन सबको पड़ेगा अब बदलना

यदि मिलती युग को प्रेरक बाती

अगली पीढ़ी इतिहास बनाती

बदलता युग जीव की थाती

सोने की चिडि़या धरा कहाती।

--.

 

 

अब समय आ गया है

 

आज पुनः जल उठे अनेक घर

चीत्‍कार कर उठे बच्‍चे,युवा और वृद्ध

सिमट गये लाशों में अनेक चेहरे

और

होने लगी पहचान

अपने पराये की

सेंकी गइ्रर्ं रोटियां स्‍वार्थ की

विभिन्‍नताओं,जाति,धर्म और वर्ग की,

असहाय भारत माता

सब कुछ देखती रही

इन गिद्धों को ही सहोदरों को नोचते

उनके रक्‍त,मांस से अपने स्‍वार्थ की गोटियां सेंकते।

शायद-

कोई आगे बढ़ता इस पाशविकता को रोकता

दानवता का प्रत्‍युत्तर

मनुजता से देता

पर-

कौन आता तोड़कर अपनी सुप्‍तावस्‍था

अपने स्‍वदेश,धर्म, संस्‍कृति के पद्‌दलन को रोकने

कादम्‍ब,कंचन, कामिनी में डूबे लोगों को

मार्गदर्शन देने।

किन्‍तु -

अब समय आ गया है

हमें अपने अतीत की भूलों को स्‍मरण कर

अपना आत्‍म निरीक्षण करने का

पशुता, स्‍वार्थतासे रोते -बिलखते

बच्‍चों,युवाओं और वृद्धों के अश्रु धोने का,

जलती झोपडि़यों, भटकती आत्‍माओं के कदम

रोकने का

और अपने आपको पशुता से हटा

मनुजता में ले जाने का।

 

ध्‍12122014

शशांक मिश्र भारती हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401,प्र

shashank.misra73@rediffmail.com

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