धर्मेन्द्र निर्मल की जाड़े की कविताएँ - सर्द मौसम के चार रूप

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

सर्द मौसम के चार रूप

1

रात जैसे उजास के बिछोह में
लरजते पेंड़ों के कंधे पर सिर रख
रो रही मसक मसक
ओढे़ अंधेरा
सन्‍नाटा चुप खड़ा
बच्‍चा अबोध-सा

2

सुबह जैसे रूई के ढेर पर
सहमती ठिठकती चलती गिरती

फिर से उठती सहमती ठिठकती चलती नन्ही सी गुड़िया
हाथ दे दे बुलाता बाप सा सूरज
टूटकर बिखर पड़ती मोतियों की माला
मनकों को बीनते भाई-से घास

3

दुपहरी जैसे नई ब्‍याही दुल्‍हन
सजधज के सोने से धानी जेवर से
देखती नम दर्पण में बार-बार मुखड़ा
फाड़-फाड़ सरसों के फूल-सी आँखें
पीछे से बाँधकर धूप की बाँहों में
गुदगुदा रहा चूम-चूम सूरज सजन-सा

4

शाम जैसे तेजी से
उम्र के पड़ावों को पार करती दादी
शनैः-शनैः बढ़ता आँखों का अँधेरा
गालों के पोपलई
जाँगर की जर्जरता
लाठी की जरूरत
और कमर का झुकाव
तब भी बार-बार फिसलते नटखट सूरज को
पीठ पर लादे सुनाती कहानी
इस पेड़ से उस पेड़ के नीचे
घूम-घूम
सूरज तो सो जाता
देते हुँकारू चॉद और तारे
सुर मिलाते कोलिहा और कुकुर॥

धर्मेन्‍द्र निर्मल

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "धर्मेन्द्र निर्मल की जाड़े की कविताएँ - सर्द मौसम के चार रूप"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.