मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

नन्दलाल भारती का आलेख - आधुनिक साहित्य और राष्ट्रवाद

डॉ.नन्दलाल भारती                          
एम.ए. । समाजशास्त्र ।  एल.एल.बी. । आनर्स ।                
पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट
विद्यावाचस्पति /विद्यासागर उपाधि


।। आधुनिक साहित्य और राष्ट्रवाद ।।
आधुनिक हिन्दी साहित्य स्वतन्त्रता संग्राम और राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत है, जो भारत के बदलते हुए ऐतिहासिक घटनाक्रमों से प्रभावित है। आधुनिक साहित्य काल के प्रारम्भिक काल में औद्यौगीकरण के साथ आवागमन के साधनों में विकास प्रारम्भ हो गया था । अंग्रेजी और पाश्चात्य वर्चस्व से जीवन में बदलाव धीरे-धीरे पांव पसारने लगा था। आधुनिक काल में ईश्वर के साथ मनुष्य को भी सम्मान मिलने लगा था और भावनाओं के साथ विचारों को महत्व मिलने लगा था। आधुनिक काल में पद्य के साथ गद्य का विकास तीव्रगति से होने लगा था, छापाखानों के पदार्पण से आधुनिक साहित्य जगत में क्रान्ति आ गयी । आधुनिक साहित्य का विकास हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे भारत में हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ गयी । गैर हिन्दी भाषा लेखकों ने भी हिन्दी को अपनाया और सृजन कार्य प्रारम्भ कर दिया ,यकीनन इससे आधुनिक हिन्दी साहित्य समृद्ध हुई। हिन्दी साहित्य के विकास को भारतेन्दु के पूर्व का युग यानि 1800 ईसवी से 1850 ईस्वी तक, भारतेन्दु युग 1850 से 1900 ईसवी तक,द्विवेदी युग 1900 से 1920 ईस्वी तक, रामचन्द्रशुक्ल व प्रेमचन्द युग 1920 ईस्वी से 1936 तक और आधुनिक युग 1936 से आज तक के सोपानों में बांटा जाता है। इन सोपानों को राष्ट्रवाद के अभ्युदय के नाम से भी संबोधित किया जा सकता है। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिशचन्द्र से माना जाता है। भारतेन्दु ने आपने लेखन में देश की गरीबी,पराधीनता के दंश,शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण किया है। हिन्दी पत्रकारिता,नाटक,काव्य के क्षेत्र में भारतेन्दु का विशेष योगदान है। भारतेन्द एक उत्कृठ कवि, व्यंगकार, नाटकार, पत्रकार, ओजस्वी गद्यकार, सम्पादक, निबंन्धकार और कुशल वक्ता थे। हिन्दी भाषा की उन्नति के संदर्भ में भारतेन्दु जी ने कहा है। निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल,... बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल ।। यह भारतेन्दु हरिश्चन्द के हिन्दी के प्रति अनुराग और राष्ट्रवाद का परिचायक है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी महान साहित्यकार,पत्रकार एवं युगप्रवर्तक थे । उन्होंने आजीवन हिन्दी साहित्य की सेवा किया। उनके हिन्दी साहित्य के उत्थान में दिये गये योगदान हिन्दी साहित्य का दूसरा युग द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है। आधुनिक साहित्य का यह युग राट्रवाद का शंखनाद करता है। प्रेमचन्द ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक परम्परा का विकास कर साहित्य की यर्थाथवादी परम्परा की नींव रखने का श्रेय मुंशी प्रेमचन्द को जाता है। मुंशी प्रेमचन्द एक सफल लेखक,देशभक्त,कुशल वक्ता जिम्मेदार सम्पादक थे।राहुल सांस्कृतायन हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे जिन्हे महापंडित की उपाधि दी गयी है। राहुल सांस्कृतायन को हिन्दी यात्रासाहित्य का पितामह कहा जाता है। वे दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों व नदियों के बीच भटकने के बाद,ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर स्वदेश लाये ये उनका राष्ट्रप्रेम ही तो था। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य अतिमहत्वपूर्ण माने जाते है। बौद्धधर्म पर शोध के लिये उन्होने दुनिया के कई देशों का भ्रमण किया था। राहुच सांस्कृतायन ने मध्य एशिया और काकेशस भ्रमण पर यात्रा वृतान्त लिखे को हिन्दी साहित्यिक श्रेठतम उपलब्धि माना जाता है। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी, महादेवी वर्मा, बाबू गुलाबराय, यशपाल, बाबू देवकीनन्दन खत्री, मैथलीशरण गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामधारी सिंह दिनकर, जैनेन्द्र कुमार,मोहन राकेश एवं डां.धर्मवीर भारती आदि आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार है। डां.धर्मवीर भारती को 1972 में पद्यम्श्री से सम्मानित किया गया है। उपन्यास गुनाहों का देवता को सदाबहार रचना माना जाता है। सूरज का सातवां घोड़ा को कहानी कहने का अनुपम प्रयोग कहा जाता है। डां.धर्म भारती के उपन्यास पर फिल्म भी बनी है। अंधा युग डां धर्मवीर भारती का प्रसिद्ध नाटक है। आधुनिक हिन्दी साहित्य में डां.धर्मवीर भारती एवं इस युग के अन्य रचनाकारों की कृतियों में राष्ट्रवाद मुखरित होता है। आजादी के आन्दोलन में आधुनिक हिन्दी साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है। आधुनिक हिन्दी भारत को एकता के सूत्र में जोड़ने का अथक प्रयास किया था। हमारी आजादी उसका जीवन्त उदाहरण है। अनेकता में एकता की वजह आधुनिक हिन्दी साहित्य कहा जा सकता है। यह एकता और राष्ट्रवाद का द्योतक है।

जैसाकि हम सभी जानते है कि राष्ट्र  भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध एक समूह होता है । राष्ट्रवाद के मूल तत्व लोकहित,राष्ट्रहित,मानवीय समानता,समान हितों और समान भावनाओं के समान राजनैतिक महत्वाकाक्षायें होती है। राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने में आधुनिक साहित्य का बहुत बड़ योगदान है। राष्ट्रवाद से सामुदायिक भावना का विकास होता है और लोकतान्त्रिक भावना भी राष्ट्रवाद से समृद्ध होती है। प्राचीन इतिहास से भी वर्तमान पीढ़ी को राष्ट्रवाद की प्रेरणा मिली तो है परन्तु आधुनिक काल में राष्ट्रवाद अंग्रेजी शिक्षा से अधिक प्रभावित है। यह मान लेने में तनिक संकोच नहीं होना चाहिये कि राष्ट्रवाद की अभिवृद्धि में हिन्दी सहित भारत की अन्य भाषाओं,तमिल,मलयालम, गुजराती, मराठी,पंजाबी,बंगाली एवं अन्य भाषाओं एंव बोलियों के साथ अंग्रेजी का भी योगदान है।

अंग्रेजी शासन से पूर्व भारत में संयुक्त पारिवारिक/सामाजिक संरचना थी, सम्भवतः ऐसी सामाजिक संरचना दुनिया के दूसरे देशों में नहीं थी। अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। यहां अनेक धर्मावलम्बी अनेक भाषा-भाषी लोग निवास करते हैं। जनसंख्या की दृष्टि से हिन्दू धर्मावलम्बियों की संख्या तो अधिक है परन्तु हिन्दू धर्म में जातिवाद की बहुत बड़ी खामी है। हिन्दू धार्मिक व्यवस्था ने जनसंख्या के बड़े भाग को हाशिये का आदमी बना दिया है जो मानवता की दृष्टि से तनिक भी उचित नहीं है। हिन्दू समाज बहुत विखण्डित हो चुका है,आज भी जारी है,धमार्न्तरण की रस्साकस्सी चलती रहती है भारतीय व्यवस्था में जातिवाद की तूती बोलने के कारण राष्ट्रवाद की भावना विकसित होने में बहुत कठिनाई हुई परन्तु आधुनिक साहित्य और साहित्यकारों ने सामूहिक रूप से राष्ट्रवाद का अलख जगाया है। राष्ट्रवाद का विकास तो हुआ है परन्तु अभी राष्ट्रवाद के विकास में और अधिक प्रयास की जरूरत है। देश के संविधान को राष्ट्रग्रंथ घोषित कर राष्ट्रवाद को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। राष्ट्रवाद के लिये देश सर्वोपरि है की भावना हर नागरिक में होनी चाहिये,जैसे व्यक्ति अपने घर-सम्पति की रक्षा करता है वैसे ही देश और देश के संसाधनों के रक्षा के सद्भाव के जागरण की जरूरत है। इसके लिये धार्मिक कट्टरता को परे रखकर देश-धर्म को पा्रथमिकता देनी होगी।यह कदम राष्ट्रवाद के विकास में अहम् भूमिका निभा सकता है। आधुनिक साहित्य इस दृष्टि से प्रयासरत् है।

देखा जाये तो भारत में राष्ट्रवाद एवं एकता उसकी विभिन्नताओं में निहित है। अंग्रेजी शासन की स्थापना से भारतीय समाज में नये विचारों और नई व्यवस्थाओं का सूत्रपात हुआ। आजादी के आन्दोलन का शंखनाद हुआ, अन्ततः  आजादी मिली और अपना संविधान लागू हुआ,जिसने अनेकों विभिन्नताओं के बाद भी भारत की एकता और राष्ट्रवाद का परचम् लहरा दिया। जैसाकि कहा जाता है भारत विभिन्नताओं के मूल पर आधारित राष्ट्र है,जिसको राजनीति शास्त्र स्वीकार नहीं करता ,इसके बावजूद भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक राट्र है। भारत वर्ष एक राजनीतिक नाम नहीं है वरन् एक भौगोलिक नाम है ।भारत में राष्ट्रवाद का उदय उन परिस्थितियों में हुआ है जो परिस्थितियों राष्ट्रवाद में बढावा देने के वजाय बाधायें पैदा करती है परन्तु आधुनिक साहित्य ने राष्ट्रवाद को विकास करने में अहम् भूमिका निभाया है। यही कारण है है कि भारत की जनसंख्या बहुधर्मी-बहुजातीय एवं बहुभाषी होने के बाद भी राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर है। इसका श्रेय आधुनिक हिन्दी साहित्य को जाता है।

माना जाता है कि साहित्य में विचारों और चिन्तनों को सीमा नहीं होती। जहां नये विचारों और परिस्थितियों का जन्म होता है वही परम्परागत विचारधारायें तात्कालीनता को प्रभावित करती है। नई संक्ल्पनाओं मतों और विचारों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सोचने समझने की दृष्टि प्रदान करती हैं। ज्ञात है जब रूढ़िवादी परम्परायें टूटती है तो समाज में बदलाव आता है। परम्परागत ढांचे टूटते हैं और नये सौन्दर्य शास्त्र का अभ्युदय होता है। बदलाव की इस प्रक्रिया में जहां रचना नये जीवन मूल्यों का सृजन करती है, वही आलोचना के माध्यम से उन मूल्यों का संरक्षण भी होता है। आधुनिक साहित्यकारों ने भारतीय साहित्य शास्त्र की अवधारणाओं और विचारधाराओं को पूनर्मल्यांकित करते हुए उन्हें आधुनिक युग में भी प्रतिष्ठापित किया है,जिससे राष्ट्रवाद कुसुमित हो रहा है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि देश में अनेकों विभिन्नताओं के होते हुए सर्वधर्म,समभाव,राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद को विकसित करने में आधुनिक साहित्य सफल रहा है।

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