सोमवार, 8 दिसंबर 2014

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का हास्य व्यंग्य - डॉक्टर एम.ओ.बी.आई.एल.ई.

डॉक्टर एम.ओ.बी.आई.एल.ई.

     चाचा दिल्लागी दास आज इतने बेताबी में थे कि दुआ सलाम करना तक भूल गए और आते ही ताबड़ तोड़ सवाल पूछना शुरू हो गए। बोले जरा बताओ तो सही कि ये डॉक्टर गांवों के नाम से इतने कतराते क्यों हैं ? क्यों सरकार को नये डॉक्टर को इनिशियल पोस्टिंग गांवों में देने जैसा क्रूर नियम बनाना पड़ा ? क्यों डॉक्टरों को गांवों का टेन्योर सजा कि तरह लगता हैं ? क्यों डॉक्टरों को गांवों की पोस्टिंग के दौरान रोग प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर लीव विदाउट पे पर रह कर शहर में छोटी मोटी प्रैक्टिस कर के अपना गुजरा करना पड़ता हैं या महीने दो महीने से ड्यूटी प्लेस पर आकर झूठी हजारियां लगानी पड़ती हैं क्यों ? तुम यूं मेरा मुंह क्या ताक रहे हो,जवाब दो। जवाब भी एकदम माकूल,मैं सफाई की तरह कोई सरकारी जवाब नहीं सुनना कतई पसंद नहीं करूंगा कि गांवों में चिकित्सा ,सड़क,बिजली,पानी,शिक्षा,संचार आदि की सहूलियतें नहीं होती जिसके चलते कोई भी डॉक्टर तो क्या कोई भी सरकारी नौकर गांवों में नौकरी करने नहीं जाता चाहता। अगर तुमने यही जवाब दिया तो मैं फिर एक सवाल और करूंगा,उस सवाल का तुम क्या जवाब दोगे कि नियुक्तियां और स्थानान्तरण मुलाजिम कि मर्जी से होना चाहिये या सरकार की जरुरत के मुताबिक।     

    मुझे काफी देर से  चुपचाप बैठे देख कर शायद चाचा को मेरे ऊपर रहम आ गया होगा सो अपने सवालों का जवाब खुद ही देने लगे। बोले कि तुम जैसा बेअक्ल इंसान इतने सारे और इस कदर तबील सवालात का यूं यक-ब-यक ही क्या जवाब दे देगा। तो सुनो गांवों में सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जैसे चिकित्सा को ही लें तो अगर गांव में जा कर खुद डॉक्टर बीमार पड़ गया तो वो किसी भी परचूनी वाले दुकानदार से अपनी बीमारी के लक्षण बता कर गोली, केप्सूल या शीशी ले कर स्वस्थ हो सकता हैं,दूसरा रहा सड़क तो सरकार द्वारा बनायी गयी सड़कों से तो गांव के उबड़ खाबड़ रास्ते ज्यादा ठीक होते हैं। बिजली की कमी का इलाज इन्वर्टर बनाने वाली कंपनियों ने के रखा हैं,पानी की बोतलें शहरों और गांवों में सामान रूप मयस्सर होती हैं और रही बात शिक्षा की तो किसी गांव में चाहे सरकारी स्कूल भले ही ना हो,मगर वहां एक आध इंग्लिश मीडियम स्कूल जरूर मिल ही जायेगा,फिर पेपर लीक परम्परा के बाद तो बच्चा चाहे कहीं भी पढ़े क्या फर्क पड़ता हैं,जबकि गांवों की स्कूल्स में शहर की तुलना में फीस कम लगती हैं। इस हिसाब से डॉक्टरों की गांवों के नाम से घिग्घी क्यों बांध जाती हैं इसके वजूहात कोई और ही हैं। और वो वजूहात क्या हैं थोडा मुख़्तसर ही बता देना चाहता हूं।

      चाचा जरा सा रुक कर बोले कि गांवों लोग अनपढ़ भले ही हो मगर शहर वालों की तरह बेवकूफ नहीं होते सो झट से भांप लेते हैं कि यह डॉक्टर असली डिग्री वाला हैं या मोबाईल के सहारे प्री पीजी कर डॉक्टर की डिग्री हासिल किया हुआ डॉक्टर हैं। गांवों के लोग मोटी-मोटी-डिग्रियों और बड़े-बड़े बोर्ड पढ़ के झांसे में नहीं आते बल्कि डॉक्टर की काबिलियत देख कर ही उसे अपनी नब्ज थमाते हैं। कई रोगी तो उल्टा डॉक्टर को राय  देते हैं कि कुछ बुखार सा हैं ,थोडा सर दर्द है,हल्की खांसी आती हैं,कच्चा कफ भी आता हैं सो आप वो गोली और वो सिरफ ही लिखना दूसरी मुझे सूट नहीं करती हैं। ऐसे में कोई डॉक्टर कैसे अपनी सैंपल की दवाईयां बेच कर दो पैसे कमाएगा। अगर डॉक्टर दो पैसे नहीं कमाएगा तो फर्जी डिग्री के लिए दिया गया पैसा कैसे रिकवर होगा। मेरे ख्याल से एक कारण तो यही हो सकता है जिसकी वजह से डॉक्टर गांवों से दूर ही रहना पसंद करते हैं।

   इसके अलावा दूसरी वजह यह भी तो है कि गांवों के लोग डॉक्टर की गलत दवा खाकर मरने के बजाय बिना कुछ खर्चा किए ही मरना ज्यादा मुफीद समझते हैं। तीसरी वजह यह है कि कम्पनीज के रिप्रेजेंटेटिव गांवों में नहीं जाते तथा गँवाई डॉक्टरों को शहरों में आकर दवाईयों के सैंपल ले जाने को मजबूर करते हैं। इसके साथ-साथ पांच साल तक किसी गांव में रह कर शहर में आये डॉक्टर का दर्जा भी कुछ हल्का हो जाता हैं,बड़े अस्पताल में उसे निहायत ही किसी कम महत्व का वार्ड दे कर उसे एक पृथक कक्ष में ही रखा जाता हैं और कई दिनों तक तो वो डॉक्टर प्रेस्क्रिपसन स्लिप में गंडा तावीज ही लिखता रहता हैं। एक खास बात और कि अस्पतालों में’रोंग निदान कक्ष’ ‘औषधि कक्ष’’चीर फाड़ कक्ष’’ड्रेसिंग रूम’और साथ-साथ में ‘मुर्दा घर’ भी तो बना होता हैं और गाव वाले लोग चाहे दूसरे किन्हीं कक्षों के उपयोग के बारे में चाहे न जानते हों पर इस ‘मुर्दा घर’ के बारे में जरूर जानते हैं कि अगर डॉक्टर की सेवाएँ ली तो उनकी अंतिम परिणति क्या होगी, मेन गेट से घुसेंगे और पोस्ट मार्टम होने के बाद ही बाहर निकलेंगे,सो अस्पताल के नाम से ही बिदकते हैं।                      

                   पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------