रविवार, 28 दिसंबर 2014

अकेलाभाइ की कविताएँ

 

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मौत का अहसास
मैं, हर पल
अपने सामने खड़ी देखता हूँ उसे
बिल्कुल समीप, बहुत ही करीब
देखने में मेरी तरह, पर अजीब
एक दिन--
मैंने उससे पूछा,
क्यों करती हो मेरा पीछा
वह हँसी--
मैं नहीं करती तेरा पीछा
मैं तो तेरे साथ चल रही हूँ ।
जब से तू जन्मा है--
तभी से हूँ तेरे साथ
और रहूँगी तबतक
जबतक तू मेरे भीतर न समा जाता।
पचास वर्ष सात महीने और तेइस दिन

उस रात मैं अकेला था
मुझे लगा कोई नहीं आसपास
मैं डरा, सहमा, और
नींद की गोलियाँ खा ली
मुझे याद है रात के दो बजे थे
घड़ी की टिक टिक सुनाई दे रही थी
और मैं दर्द से कराह रहा था।
वह मुस्कुरा रही थी-
मुझे और करीब बुला रही थी।
मेरे सामने उसका
आकार बढ़ता गया-और मैं
उसमें समाता गया।
फिर एक पल में
मैं उसमें विलीन हो गया
फिर तो न मैं था
और न वह थी।।

--

वह

मैंने पूछा-

तुम किस जाति के हो

वह चुप रहा

मैंने फिर पूछा--

क्या तुम हिंदू हो

वह खामोश था।

क्या तुम मुसलमान हो

उसके पास कोई उत्तर नहीं था।

तुम किस प्रांत के हो

तब भी वह चुप ही था।

मैंने उसे क्रोध भरी नजरों से देखा--

क्या तुम बहरे हो

तेरे लिए मैं बहरा ही नहीं--

अँधा, लँगड़ा और गूँगा भी हूँ।

अब मेरे पास कोई प्रत्युत्तर नहीं था।


--डॉ. अकेलाभाइ, सचिव (मानद), पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी,

पो. रिन्जा, शिलांग 793006 (मेघालय),

 akelabhai89@yahoo.com

3 blogger-facebook:

  1. अकेलाभाइ की गंभीर चिंतनभरी कविताएँ प्रस्तुति हेतु आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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