मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - तनाव से मुक्ति कैसे पाएँ?

सही सोच और साफ़ नज़रिये से संभव है तनाव मुक्ति

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

आजकल तनाव हमारे वर्तमान जीवन की परिभाषा बन गयी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में हैरान, परेशान होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़ते रहते हैं और यह पूरी तरह से बिसरा देते हैं कि इसके लिए कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया-आस-पास के लोगों के प्रति अपना स्वयं का दृष्टिकोण भी जिम्मेदार हो सकता है।

मनोवैज्ञानिकों की सलाह मानें तो सबसे पहले हमें अपनी खीज-तनाव के कारण खुद में खोजने चाहिए। आस-पास के लोगों, परिस्थितियों के प्रति अपने नजरिए की छान-बीन करनी चाहिए। ऐसा कर सके तो पता चलेगा कि सारी परेशानी का कारण हमारी मानसिकता का बाहरी वातावरण से संगति न बैठना है और इसके लिए वातावरण की अपेक्षा हम खुद जिम्मेदार हैं।

वातावरण जड़ और हम हैं चेतन

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एलन वाट्स ‘प्रेग्रासिंग आँफ द माइन्ड’ में कहते हैं कि वातावरण जड़ है, सोच-विचार रहित है, जबकि हम स्वयं सचेतन हैं। अपने सोचने-विचारने के तौर-तरीकों में फेर-बदल करना हमारे लिए एक आसान बात है। थोड़े से प्रयास के साथ ही हम वातावरण से समस्वरता स्थापित कर सकते हैं। इसी तरह आस-पास के लोगों के व्यवहार पर टीका-टिप्पणी करना, उन्हें अनर्गल बकते-झकते रहना, रह-रहकर उन पर दोषारोपण करना, समस्या का कोई सार्थक समाधान नहीं है। क्योंकि सभी-अपनी प्रवृत्तियों एवं संस्कारों के वशीभूत हैं, फिर औरों पर अपना क्या वश? ऐसे में उन पर खीजने, झल्लाने से हमारा तनाव कम होने की बजाय बढ़ेगा ही, तब क्यों न हम समस्याओं के समाधान अपने अन्दर खोजें।

एक सत्य और है-बाहरी माहौल को प्रभावित करने वाले घटकों की संख्या भी काफी है। चाह कर भी सब पर एक साथ काबू पा सकना हमारे वश में नहीं है। बहुत कोशिशों के बावजूद हम कुछ हद तक ही परिस्थितियों को बदल सकते हैं। हाँ! अपने आन्तरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन करना अपना बिल्कुल निजी मामला है। इसके फेर-बदल में हम पूरी तरह स्वतन्त्र ही नहीं सक्षम भी हैं। स्वस्थ एवं सुखी जीवन का यह एकमात्र कारगर उपाय है। जब हम अपने परिकर के साथ सहअस्तित्व की अनुभूति के साथ रहते हैं तो तनाव अपने आप दूर हो जाता है। लेकिन निषेधात्मक चिन्तन और मन में संचित घृणा, द्वेष, ईर्ष्या और भय के संस्कारों के कारण वातावरण से तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल जरूर है।

विचारों की सफाई का चले अभियान

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आवश्यक है कि मन से बुरे विचारों का कूड़ा-कचरा निकाल फेंका जाय। लेकिन होता इसका उल्टा है। हममें से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति सफलता पाने की तीव्र तृष्णा से ग्रसित है। हर वक्त उसे यह भय सताता रहता है कि कहीं वह असफल न हो जाय। जिससे उसे अपने परिवार तथा परिचितों के बीच शर्मिन्दा न होना पड़े। उसके इस भय को अभिभावक और शिक्षक मिलकर बढ़ा देते हैं। अपनी अस्मिता से जुड़ा यह सवाल इस कदर उसके मन पर छा जाता है कि वह लगातार भर और चिन्ता से ग्रसित रहने लगता है। जीवन का हर कृत्य उसके लिए आपातकालीन कार्य बन जाता है और वह लगातार तनाव में रहने लगता है।

ऐसा नहीं हैं कि सफलता के लिए प्रयास कना कोई बुरी बात है। लेकिन यदि अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जा सके तो इसे कर्तव्य भावना से तनाव रहित होकर भी किया जा सकता है। 

तनाव मुक्त होकर किए गए प्रयास में सफल होने की उम्मीदें भी अधिक होंगी। यदि इसके साथ देशहित और लोकहित की उदात्त भावनाएँ जोड़ी  सकें तो मन हर-हमेशा उत्साह एवं प्रफुल्लता से भरा रहेगा। हमारे किए गए काम के सौंदर्य में भी भारी निखर आ जाएगा। इस प्रकार हमारी पूर्व मान्यताएँ जिन्हें साइकोलॉजिस्ट मेण्टल प्रोग्रामिंग कहते हैं, हमारे जीवन का निर्धारण करती है। गलत एवं निषेधात्मक मेण्टल प्रोग्रामिंग हमारे गलत चिन्तन एवं गलत शिक्षा का परिणाम है। इस पर चिंतन ही नहीं, सुविचारित कदम भी उठाये जाने चाहिए। 

तनाव से न टूटे जीवन की लय

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निरन्तर तनावग्रस्त बने रहना जीवन में हानिकारक है। चूँकि जीवन-उद्देश्य आपके सामने है, तनावग्रस्त से दूर रहना ही आपके लिए श्रेष्ठतर होगा। अतः आप तनाव के बहुत से कारकों से बचें, जो आप आसानी से कर सकते हैं और साथ में ये भी।

काम को टालने की प्रवृत्ति से बचें, अगले सप्ताह में पड़ने वाले कार्यो की अग्रिम सूची बना लें, सूची के अनुसार कार्य करें। अपने पास उतना ही कार्य लें, जितना कि आप आसानी से कर सकें।समय अमूल्य धरोहर है, इसलिए इसका उपयोग ध्यानपूर्वक करें।गतिशील रहने पर आप अपनी समस्याएं भूल जाते हैं, एक जगह जॉगिंग करने से भी आपके मन को शांति मिलेगी।शोध से पता चलता है कि अपने पालतू पशु को प्यार करने से या फिर मछलियों को टैंक में देखने से मन को शांति मिलती है।कार्य के प्रति, जीवन के प्रति आशावादी रुख अपनाने से आप जीवन के कठिन से कठिन क्षणों में भी विजय हासिल कर सकते हैं।बंटी हुई चिताएं आधी हो जाती हैं, इसलिए समस्याओं और दुखों को मन में न रखें, किसी निकटतम व्यक्ति से बातें करके, आपको हलकापन महसूस होगा।

बीच-बीच में अपनी मनपसंद गतिविधि जैसे-बागवानी, घूमना, मनपसंद खेल, टीवी देखना, संगीत, समाचार, पत्र-पत्रिका वाचन, लेखन आदि कार्यो को करके आप तरोताजा महसूस करेंगे।तनाव मुक्त जीवन के लिए हास्य का विशेष महत्व है।

छल-कपट और प्रपंच से दूर रहें

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प्रतिदिन कुछ मिनट ध्यान करने से मन को शांति मिलती है। इससे मानसिक, भावनात्मक व शारीरिक राहत महसूस होगी।नौकरी करते हैं, तो छुट्टियों में आराम करके तरो-ताजा हो जाएं।कोई भी फोन करने से पहले मन में भलीभांति सोच लें कि क्या बातें करनी हैं, तुरन्त हा ना कहते हुए सोचकर जवाब दें। मन उचटाने वाली गतिविधियों से दूर रहें।संगीत को जीवन का हिस्सा बनाए।अपनी रूचि बढ़ाए,जिससे जीवन में रचनात्मकता आए। कपट छल प्रपंचना से बचने के लिए भी तनाव मन में डर के कारण कि कहीं ये बातें खुल ना जायें टैंशन हो जाती है। मन को, तन को, मस्तिष्क को, निर्मल रखिए। कथनी करनी में भेद नहीं उलझने समस्याऐं तो आज हर किसी के जीवन में रहती हैं। कायर पुरूष उनसे घबड़ा जाते हैं पुरुषार्थी उनसे सामना करके विजय पाते हैं। शाकाहार फलाहारी बने, तले, चटपटे, मसालेदार खाने के पदार्थ ना लें। गुटके, तम्बाकू, चाय, मदिरा, धूम्रपान सेहत के लिए घातक हैं, हवा, जल, धूप, बागवानी श्रेष्ठ है।

बदला न लें, खुद को बदलें

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जीवन निर्माणकारी साहित्य नियम से पढे और आचरण मन, वचन, कर्म से शुद्धता की ओर हों। दया, प्रेम सहिष्णुता, सरलता सर्वोपरि है। बदले की प्रवृति छोड़ दें जो जैसा करेगा, भरेगा आप प्रभु पर छोड़ दें समझ लें क्षमा कर दिया पर उसके कुकर्म उसे बेमौत मार डालेंगे। और कोई अपील नहीं। आशावादी रहें। पक्का इरादा अपने लक्ष्य में रखें। अपना हर कार्य स्वयं करें विनम्र सदाचारी और उपकारी रहें। तनाव आपसे सदा दूर ही रहेगा। आचरण करें।यदि आप तनाव को चुनौती के रूप में स्वीकार सकते हैं, तो उसके आगे आप कभी हिम्मत नहीं हारेंगे और सफलता के पायदान पर खडे होगे। अपना कुछ समय बाहर बिताएं, देखें कि बाहर क्या हो रहा है। छोटी-छोटी बातों पर गौर करने से आपको महसूस होगा कि जिंदगी में जीने लायक कितना कुछ है। चिड़िया की चहक सुनें, सूरज को डूबते देंखें, प्रकृति, वन, नदी को देखकर मन खुश हो जाता है। चिंता करना छोड़कर हमेशा खुश रहें, जीवन इतना गंभीर नहीं है, जितना आपने बना डाला है। उस स्थिति में हास्य का पुट दें, ऐसा करने से स्वयं को हलका महसूस करेंगे। 

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लेखक लायंस क्लब के एजूकेशन

डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन और दिग्विजय

कालेज में प्रोफ़ेसर हैं।

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  1. बहुत ही अच्छा लेख है। बड़े -बुजुर्ग इसीलिए कह गए हैं की चिता मुर्दे को जलाती है जबकि चिंता जिन्दे को ही जला देती है। हमारे लक्ष्यों पर इस तनाव की वजह से क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर मेरा एक लेख www.achchisalah.blogspot.com पर जरूर पढ़ें।

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