रविवार, 21 दिसंबर 2014

विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य - मेरे पड़ोसी के कुत्ते

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मेरे पड़ोसी को कुत्ते पालने का बड़ा शौक है। उसने अपने फार्म हाउस में तरह तरह के कुत्ते पाल रखे हैं। कुछ पामेरियन हैं , कुछ ऊंचे पूरे हांटर हैं कुछ दुमकटे डाबरमैन है , तो कुछ जंगली शिकारी खूंखार कुत्ते हैं। पामेरियन केवल भौंकने का काम करते हैं , वे पड़ोसी के पूरे घर में सरे आम घूमते रहते हैं । पड़ोसी उन्हें पुचकारता , दुलारता रहता है। ये पामेरियन अपने आस पास के लोगो पर जोर शोर से भौंकने का काम करते रहते हैं ,  और अपने मास्टर माइंड से साथी खूंखार कुत्तों को आस पास के घरों में भेज कर कुत्तापन फैलाने के प्लान बनाते हैं।

पड़ोसी के कुछ कुत्ते बहुत खूंखार किस्म के हैं , उन्हें अपने कुत्ते धर्म पर बड़ा गर्व है , वे समझते हैं कि इस दुनिया में सबको बस कुत्ता ही होना चाहिये। वे बाकी सबको काट खाना जाना चाहते हैं। और इसे धार्मिक काम मानते हैं। ये कुत्ते योजना बनाकर जगह जगह बेवजह हमले करते हैं। इस हद तक कि कभी कभी स्वयं अपनी जान भी गंवा बैठते हैं। वे बच्चों तक को काटने से भी नहीं हिचकते। औरतों पर भी ये बेधड़क जानलेवा हमले करते हैं। वे पड़ोसी के फार्म हाउस से निकलकर आस पास के घरों में चोरी छिपे घुस जाते हैं और निर्दोष पड़ोसियों को केवल इसलिये काट खाते हैं क्योंकि वे उनकी प्रजाति के नहीं हैं। मेरा पड़ोसी इन कुत्तों की परवरिश पर बहुत सारा खर्च करता है , वह इन्हें पालने के लिये बड़े लोगों से उधार लेने तक से नहीं हिचकिचाता। घरवालों के रहन सहन में कटौती करके भी वह इन खूंखार कुत्तों के दांत और नाखून पैने करता रहता है। पर पड़ोसी ने इन कुत्तों के लिये कभी जंजीर नहीं खरीदी। ये कुत्ते खुले आम भौंकने काटने निर्दोष लोगों को दौड़ाने के लिये उसने स्वतंत्र छोड़ रखे हैं।

पड़ोसी के चौकीदार उसके इन खूंखार कुत्तों की विभिन्न टोलियों के लिये तमाम इंतजाम में लगे रहते हैं , उनके रहने खाने सुरक्षा के इंतजाम और इन कुत्तों को दूसरों से बचाने के इंतजाम भी ये चौकीदार ही करते हैं। इन कुत्तों के असाधारण खर्च जुटाने के लिये पड़ोसी हर नैतिक अनैतिक तरीके से धन कमाने से बाज नहीं आता। इसके लिये पड़ोसी चुपके से वह ड्रग्स तक का धंधा करने लगा है। जब भी ये कुत्ते लोगों पर चोरी छिपे खतरनाक हमले करते हैं तो पड़ोसी चिल्ला चिल्लाकर सारे शहर में उनका बचाव करता घूमता है , वह यहां तक कह डालता है कि ये कुत्ते तो उसके हैं ही नहीं। पड़ोसी कहता है कि वह खूंखार कुत्ते पालता ही नहीं है। लेकिन सारा शहर जानता है कि ये कुत्ते रहते पड़ोसी के ही फार्म हाउस में ही हैं। ये कुत्ते दूसरे देशों के देशी कुत्तों को अपने गुटों में शामिल करने के लिये उन्हें कुत्तेपन का हवाला देकर बरगलाते रहते हैं।

जब कभी शहर में कही भले लोगों का कोई जमावड़ा होता है , पार्टी होती है तो पड़ोसी के तरह तरह के कुत्तों की चर्चा होती है। लोग इन कुत्तों पर प्रतिबंध लगाने की बातें करते हैं। लोगों के समूह , अलग अलग क्लब मेरे पड़ोसी को समझाने के हरसंभव यत्न कर चुके हैं , पर पड़ोसी है कि मानता ही नहीं। इन कुत्तों से अपने और सबके बचाव के लिये शहर के हर घर को ढ़ेर सी व्यवस्था ढ़ेर सा खर्च व्यर्थ ही करना पड़ रहा है। घरों की सीमाओं पर कंटीले तार लगवाने पड़ रहे हैं , कुत्तों की सांकेतिक भाषा समझने के लिये इंटरसेप्टर लगवाने पड़े हैं। अपने खुफिया तंत्र को बढ़ाना पड़ा है , जिससे कुत्तों के हमलों के प्लान पहले ही पता किये जा सकें। और यदि ये कुत्ते हमला कर ही दें तो बचाव के उपायों की माक ड्रिल तक हर घर में लोग करने पर विवश हैं। इस सब पर इतने खर्च हो रहे हैं कि लोगों के बजट बिगड़ रहे हैं। हर कोई सहमा हुआ है जाने कब किस जगह किस स्कूल , किस कालेज , किस मंदिर,  किस गिरजाघर,  किस माल , किस हवाईअड्डे , किस रेल्वे स्टेशन , किस बाजार में ये कुत्ते किस तरह से हमला कर दें ! कोई नहीं जानता। क्योंकि सारी सभ्यता , जीवन बीमा की सारी योजनायें जिस एक मात्र सिद्धांत पर टिकी हुई हैं कि हर कोई जीना चाहता है , कोई मरना नहीं चाहता उस मूल मानवीय मंत्र को ही इन्होंने किनारे कर दिया है। इनका इतना ब्रेन वाश किया गया है कि अपने कुत्तेपन के लिये ये मरने को तैयार रहते हैं। इस पराकाष्ठा से निजात कैसे पाई जावे यह सोचने में सारे बुद्धिजीवी , सब लगे हुये हैं। टीवी चैनलों पर इस मुद्दे पर बहसें हो रही हैं।

हाल ही इन कटखने कुत्तों ने पड़ोसी के खुद के ही स्कूल के बच्चों को काट खाया। फिर क्या था पड़ोसी के घर में कोहराम मच गया। पड़ोसी जो अब तक अच्छे कुत्ते बुरे कुत्ते वगैरह के राग अलापता रहता था अचानक ही सारे कुत्तों को बुरा कहने लगा। मैंने भी सोचा चलो अब शायद पड़ोसी को समझ आए कि खूंखार कुत्ते पालना ठीक नहीं , शायद अब पड़ोसी की नीति में बदलाव हो। शायद अब वह हमारी परेशानी भी समझे , कि उसके कुत्ते पालने से हमें और सारे शहर के सभ्य लोगों को कितनी कठिनाई हो रही है। शायद अब पड़ोसी हमें वे पामेरियन मास्टर माइंड सौंप दे जिन्होंने हमारे घर में हमले करवाये थे। पर नहीं दूसरे ही दिन पड़ोसी ने एक उस कुत्ते को जेल से पंजड़े से छोड़ दिया जो हमारा गुनहगार है

 

अब शायद लोगों को ही समझ लेना चाहिये कि पड़ोसी कुत्तों के सामने कहि न कही बेहद मजबूर है , और वह उन्हें जंजीर नहीं पहना सकता। अब शहर के लोगों को ही सामूहिक तरीके से कुत्ते पकड़ने वाली वैन लगाकर मानवता के इन दुश्मन कुत्तों को पिंजड़े में बंद कर डालना होगा तभी सुरक्षा पर किया जाने वाला बेतहाशा खर्च रोका जा सकता है , और उसे गरीब लोगों के विकास में खर्च किया जा सकेगा। मैं दुआ करता हूं कि जल्दी से जल्दी सबको यह समझ आ जावे , कि कुत्ते की दुम टेढ़ी ही रहती है , उसे सीधा करने के सारे यत्न फिर फिर असफल ही होंगे।

 

vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११। विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर , जबलपुर

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