बुधवार, 24 दिसंबर 2014

सूर्यकांत मिश्रा का क्रिसमस विशेष आलेख - जब समय पूरा हुआ

जब समय पूरा हुआ


प्राचीनकाल से एशिया महाद्वीप अपनी विशेषताओं के कारण अन्य महाद्वीपों से अधिक महत्वपूर्ण रहा है। मानव सभ्यता का आरम्भ फरात ओर दजला नदी के उपजाऊ दोआब के प्रदेश को माना जाता है। यह क्षेत्र आधुनिक इराक है। संसार के महान धर्मों का पालना भी एशिया महाद्वीप रहा है।  प्राचीन यहूदी धर्म के धर्मग्रन्थ की रचना सिनाई के मरूस्थल में हुआ, हिन्दू धर्म की नींव चाक बेदग्रन्थ हैं जिन्हें आर्य ऋषि-मुनियों ने लिखा। इतिहासकारों के अनुसार आर्य भारत में मादी-फारसी देश जिसका आधुनिक नाम इरान हैं उस ओर से आये। मसीही धर्म ईश पुत्र यीशु मसीह के विश्वासियों से आरम्भ हुआ। उनका जन्म स्थान पलस्तिन देश था, जो आधुनिक इस्त्राएल है। मुसलिम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद का जन्म आधुनिक साउदी अरेबिया में हुआ था


विश्व के महान दार्शनिक सुकरात और अफलातून ईसा पूर्व 600 में पैदा हुये थे, उनका जन्म स्थान एशिया माइनर में हुआ था। अरब देशों से गणित और साहित्य और ललितकला का विकास हुआ, जो विश्व की बहुत बड़ी देन है। एशिया महाद्वीप जिस समय सभ्यता, दर्शन और साहित्य में व मौत्कर्ष पर था उस समय आज के सभ्य और विकसित देश जैसे समस्त यूरोपीय देश और अमेरिका विकास के प्रथम चरण में थे। अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में मिश्र ही ऐसा देश था जो एशियाई देशों के समान सभ्य देश था।


यीशु मसीह जब पैदा हुये उस समय पूरे संसार में राजनैतिक, धार्मिक और बौद्धिक शून्यता थी और पूरा मानव समाज नये विचार और धार्मिक शिक्षा का जानने लालायित था। वे बौद्धिक और धार्मिक प्यास से व्याकुल थे और एक समाज सुधारक और उपदेश को ग्रहण करने को तैयार थे।


यीशु के जन्म के पहले विश्व में यीशु की शिक्षाओं को ग्रहण करने की तैयारी पूरी हो चुकी थी, इसलिये बाइबिल में यह वचन, कहा गया, ‘जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा’


यीशु की शिक्षाओं को ग्रहण करने की कौन सी तैयारी विश्व ने की थी, उसका धार्मिक, बौद्धिक और राजनैतिक दृष्टि से संक्षिप्त सिंहवालोकन यहाँ करने की आवश्यकता है।


धार्मिक तैयारी
सामान्यतः मनुष्य स्वभाव से ईश्वरवादी होता है, वह किसी न किसी ईश्वर पर आस्था रखता और उसकी आराधना करता है। यीशु के जन्मकाल में पूरे यूरोप, मिश्र और मध्य एशिया में रोमन साम्राज्य फैला था। यहूदी जाति उस काल में दूर-दूर देशों तक फैल चुकी थी। वे अपनी मूलभाषा के साथ स्थानीय भाषायें बोलने लगे थे। वे जानते थे कि एक मसीहा का जन्म होने वाला है जो संसार में शांति और प्रेम का संदेश देगा। यह विचार उन लोगों में भी फैल चुका था जो यहूदी नहीं थे। अधिकांश लोग आस्तिक थे और सच्चे परमेश्वर को जानना चाहते थे। यीशु का जन्म एक अनूठी घटना थी, उनके जन्म लेने की घटना ज्योतिषियों को ज्ञात थी इसलिये यह माना जाता है कि ज्योतिषियों का दल भारत, फारस और मिश्र देशों से निकला और पलस्तिन देश में आकर उन्होंने बालक यीशु के दर्शन किये और बहुमूल्य भेंटे चढ़ाई। ज्योतिषियों को यीशु के जन्म का पता ग्रह-नक्षत्रों और तारे की चाल से चला और उन्होंने जान लिया कि कोई महान राजपुरूष का जन्म हुआ है।


बौद्धिक तैयारी
यहूदियों के धर्मग्रन्थों से जिस प्रकार मसीहा के जन्म का ज्ञान बहुत देशों की जनता तक पहुंचा वैसे ही यूनानी तत्वावधान ने भी लोगों को मसीह को जानने का मौका दिया। यूनानी भाषा उस समय जन-साधारण की सम्पर्क भाषा थी। सिकन्दरमहान के विश्व-विजय के कारण और यूनानी सभ्यता को बढ़ावा देने के कारण, रोमन साम्राज्य में भी यूनानी भाषा का उपयोग होता था। बाइबिल का ‘नया नियम’ यूनानी भाषा में ही लिखा गया था, इसलिये यीशु की शिक्षाओं का प्रसार दूर-दूर देशों तक हो गया।


रोमन साम्राज्य की तैयारी
रोमन साम्राज्य विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था। व्यापार को बढ़ावा देने के लिये रोमन साम्राज्य में एक छोर से दूसरे छोर तक चौड़ी सड़कों का निर्माण हुआ। मार्ग को सुरक्षित रखने सैनिक चौकियां स्थापित की गई। समुद्र में समुद्री डाकुओं के आतंक को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार जल और थल मार्गों में यात्रा करना और व्यापार करना सुरक्षित हो गया। विजित देशों के निवासी आपस में स्वतंत्र रूप से मिलाने लगे तो उनके बीच में पुरानी शत्रुता समाप्त हो गई। नये विचार, नये ईश्वर और नई शिक्षाओं को जानने की इच्छा बलवती हो गई। यीशु ने ऐसे ही विश्व शान्ति के अवसर पर जन्म लिया।


मसीही धर्म का प्रसार
यीशु ने अपनी शिक्षायें पलस्तिन देश की सीमा के अन्दर ही दी, परन्तु उनके शिष्यों ने उनकी शिक्षा को दूर देशों तक प्रचार कर फैला दिया। मसीही धर्म के प्रसार में पूरे यूरोप और सभ्य देशों में यूनानी भाषा जनसम्पर्क भाषा होने के कारण बहुत सहायता मिली। राजनैतिक शांति और सुव्यवस्था से मसीही धर्म के प्रसार में सहायता मिली। आज यह विश्व का सबसे बड़ा धर्म है।


                                         (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                        जूनी हटरी राजनांदगांव

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------