मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - कथा में 'आत्म' की मौजूदगी के 'बाहरी' सरोकार

कथा में 'आत्म' की मौजूदगी के 'बाहरी' सरोकार

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

हमारा वर्तमान समय कई दीगर मुद्दों की तरह आत्मकथा यानी अपनी दास्तान को लेकर भी बहुत चर्चा में है।  अगर ये कहा जाए कि इन दिनों आत्म कथा लिखने की होड़ सी चल रही है तो शायद गलत नहीं होगा। इसे जुनून भी कहा जा सकता है, लेकिन तय है कि ज़िंदगी में अपने किए और रह गए को शब्द देने की चाहत परवान चढ़ जाने पर हर नामचीन शख्स आत्मकथा लिखने के लिए बेताब दिख रहा है। पर याद रहे कि आत्मकथा कहना खांडे की धार पर चलना है। लेखक ललित शर्मा ठीक कहते हैं कि आत्मकथा लिखना किसी बिगबैंग से कम नहीं है। अगर विस्फ़ोट कन्ट्रोल्ड हो तो गॉड पार्टिकल मिल जाता है और विस्फ़ोट अनकंट्रोल्ड हो तो समाज के समक्ष जीवन भर का बना हुआ प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो जाता है। 

सच है प्रत्येक मनुष्य के जीवन के दो पहलू होते हैं, पहला वह जिसे प्रकाश में लाना चाहता है और दूसरा वह जिससे प्रकाश में न लाकर प्रकाश में रहना चाहता है। बिरला ही कोई आत्मकथा लिखने का साहस कर पाता है और उसके साथ न्याय भी। संपूर्ण भारतीय साहित्य में परिवर्तन एवं नवीनता के लक्षण उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही दिखाई देने लगे थे। हिंदी साहित्य में भी परिवर्तन हुआ। नयापन आया। इसे नई दिशाएँ मिलीं। नए रूप प्राप्त हुए। नए आयाम मिले। सन 1850 के आसपास पाश्चात्य प्रभाव परिलक्षित हुए। मुगलों ने सल्तनत बख्श दी। सत्ता अंग्रेजों के हाथ में आ गई। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियाँ परिवर्तित हुईं। ऐसी नितांत नई बदलती हुई परिस्थितियों ने युग को प्रभावित किया। युग भी बदला। अतः परिवर्तित युग में साहित्य का स्वर भी परिवर्तित होना स्वाभाविक था। सीमित वर्ण्य-विषय एवं लक्षण-उदाहरण ग्रंथ की परिसीमा को लाँघकर हिंदी साहित्य में आधुनिक काल आया। इसी युग में साहित्य की अनेक नई विधाओं के बीच आत्मकथा लेखन को भी नया आयाम मिला। सच है -

कई बार

यूँ भी हुआ है,

कुछ माज़ी के परिंदे,

पेशानी में पड़ी लकीरों को,

शाख समझ बैठे.

और,

जब भी कैफियत बदली,

फ़िर संभाल ली

अपनी परवाज़.


कुछ भूले से परिंदे,

कुछ नए से ख्याल,

फ़िर यूँ ही लौट गए।

सवाल किया जा सकता है कि आत्मकथा की कला क्या है? क्या यह सबके लिए साध्य है? कलाकार कितने सच्चे होते हैं? कितने ही बने हुए। रचनाओं में कितना यथार्य होता है और कितनी कल्पना? कल्पना और भोगा हुआ सच मिला देने पर जो रचना तैयार होती है क्या वह संगी साथी के साथ न्याय कर पाती है? क्या लेखक एक घाघ होता है? एक ही जीवन में कोई कितना बदल सकता है? आज़ादी की लड़ाई के खातिर जेल जाने वाला आदमी आगे चलकर अपने हर काम की कीमत कैसे वसूलने लगता है? संयम क्या है? रचना में निष्पक्ष रहना, अभिव्यक्ति को बचा ले जाना। लेखक क्या पाठकों द्वारा अपनी आत्मकथा के माध्यम से खुद को बहुत ही दुखी जताकर सहानूभूति लेना चाहता है। क्या लेखक का श्रम आत्मकथा के बहाने सिम्पैथी बटोरने के कार्य में निवेश करना है? क्या लेखक लिख कर बदला लेता है ? क्या लेखक के लिए लिखना एक प्रतिशोधात्मक कार्य है, क्योंकि वो यहीं घालमेल कर अपने लोगों से बदला ले सकता है। जो समाज के नज़रों में प्रतिष्ठित है, कैसे वह अपने लोगों के नज़रों में गुनहगार है। ऐसे प्रश्नों को नज़रअंदाज़ कर यदि आत्मकथा लिखी जा भी रही हो तो वह आपबीती की स्व केंद्रित कहानी मात्र कही जा सकती है। कथा में आत्म की उस जगह का कोई सामाजिक सरोकार ही अगर नहीं रहा तो पाठक उसमें रूचि ले भी तो क्यों ?

कथा लेखिका मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि है आत्मकथा लिखने के लिए किसी विभूति के कमेंट सुनने का साहस चाहिए। इस कमेंट में दम है। उनका कहना है कि आत्मकथा लिखने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए और किसी विभूतिनारायण के कमेंट सुनने का साहस चाहिए। हमारे समाज में तो लड़कियों को सच बोलने से डराया जाता है, बचपन से ही. परिवार के बारे में सच, रिश्तों के बारे में सच. आत्मकथा वही लिख सकता है जो सच बोलने से न डरे। सबसे जरूरी चीज है कि पढ़ने की ललक बनी रहे. यही खत्म हो जाएगा तो आप अपनी रचनाएं कहीं भी प्रकाशित कर लीजिए कौन पढ़ेगा? जब आप सहज भाव से लिखते हैं और उसमें से लोगों की जिंदगी झांकती है- वे अपनी जीवन की उसमें कल्पना कर पाते हैं और आपका लेखन उन्हें कदम दर कदम बांधता चला जाता है तो लोग उसे पढ़ते हैं. पाठक तो रचना से ही बनते हैं, लेखक से नहीं. इसलिए लेखन को जिंदगी से और जुड़ना होगा। 

आत्मकथा लिखने के पीछे कहीं यह मंशा भी रहती है कि अन्य लोग इससे प्रेरित होकर अपने जीवन को बेहतर ढंग से गढ सकें। रवीन्द्रनाथ ने लिखा भी है कि महान व्यक्तियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व आम आदमी के लिए दिशा-बोध का काम करता है। अक्सर ऐसा होता भी है। हम अपने जीवन के भीतर इस तरह डूबे हुए रहते हैं कि उसकी बागडोर पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होती। दूसरों के जीवन को हम अपेक्षाकृत तटस्थ भाव से देखते हैं, इसलिए उसके मोड़-तनावों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस समझ का उपयोग कर सकते हैं। यों तो हर जीवन विशिष्ट है। कोई जीवन किसी का आदर्श नहीं होता, लेकिन उस महान जीवन को दृश्टांत मानकर प्रेरणा तो ली ही जा सकती है। महात्मा गांधी ने इसीलिए अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कोई मेरे लेखों को प्रमाणभूत न समझे। मैं तो सिर्फ यह चाहता हूं कि उनमें बताए प्रयोगों को दृष्टांत रूप मानकर सब अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें। इस तरह समझना होगा कि महान साहित्यकारों ने केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी आत्मकथाएं लिखी हैं।

फिर भी, स्मरण रखना होगा कि आधुनिक साहित्यिक विधाओं में ‘उपन्यास’ और ‘आत्मकथा’ के स्वरूप को समझने के लिए सामाजिक संबंधों की जटिलता में व्यक्ति के आत्म-प्रकाशन की चिंता को समझना जरूरी है। हालांकि इन दोनों विधाओं को अलग-अलग खांचे में बांट दिया गया है, लेकिन इनके स्वरूप को समझते हुए इनके सहसंबंध या वस्तु की आपसी तारतम्यता को नकारा नहीं जा सकता। दरअसल कथा में आत्म की उपस्थिति के बाहरी सरोकारों की पड़ताल के बगैर आत्मकथा पर कोई भी चिंतन अधूरा है। 

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प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,

दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव।

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