मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

राजीव आनंद का आलेख - उपेन्द्रनाथ अश्क : हिन्दी-उर्दू में प्रेमचंदोत्तर कथा-साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर

14 दिसंबर-जयंती पर विशेष
       उपेन्द्रनाथ अश्क : हिन्दी-उर्दू में प्रेमचंदोत्तर कथा-साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
उपेन्द्रनाथ अश्क ने साहित्य की प्रायः सभी विद्याओं में लिखा है लकिन उनकी मुख्य पहचान एक कथाकार के रूप में ही है। काव्य, नाटक, संस्मरण, कहानी, आलोचना आदि क्षेत्रों में वे खूब सक्रिय रहे। प्रायः हर विद्या में उनकी एक-दो महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय रचनाएँ होने पर भी वे मुख्यतः कथाकार थे।  हिन्दी-उर्दू में प्रेमचंदोत्तर कथा-साहित्य में उनका विशिष्ट योगदान है यद्यपि उन्होंने पंजाबी में भी लिखा है। जैसे साहित्य की किसी एक विद्या से वे बंधकर नहीं रहे, उसी तरह किसी विद्या में एक ही रंग की रचनाएँ भी उन्होंने नहीं की। अपनी इस प्रवृति की ओर संकेत करते हुए उन्होंने 'मेरी प्रिय कहानियां की भूमिका के पृ. 19 में लिखा है, 'मेरा मस्तिष्क निहायत क्रियाशील और मेरा मन अत्यंत चंचल है। एक ही रंग विशेषकर कहानियों और एकांकियों को अपनाए रखना मेरे लिए कठिन है।'


    एक लेखक के रूप में अश्क की उल्लेखनीय विशेषता जीवन और अपने आसपास के जीव जगत को खुली आँखों से देखना है। उनका रचनात्मक विकास राष्ट्रीय आंदोलन के बेहद उथल-पुथल भरे दौर में तो हुआ ही, वे उस पंजाब से आए लेखक है जो विभिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक हलचलों का केन्द्र था। उनके बचपन और युवावस्था का बड़ा हिस्सा लाहौर और जालंधर में बीता था। अमृतसर में कुख्यात जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय उनकी आयु नौ वर्ष की थी, जलियांवाला बाग जैसी नृशंस घटना का उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के समय वे प्रायः बीस वर्ष के नवयुवक थे। इसी अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में, कांग्रेस के पूर्ण स्वराज्य का नारा दिया था। भगत सिंह और उनके सहयोगियों की क्रांतिकारी गतिविधियों की दृष्टि से भी वह बेहद उत्तेजना-भरा दौर था। इस काल के लाहौर का सफर और वहां की प्रामणिक कथाएं उनके पांच खंड़ों वाली उपन्यास श्रृखंला 'गिरती दीवारें' से 'इतिनियति' तक में कई जगह मिलता है। लेकिन कुल मिलाकर वे उस तरह एक राजनतिक लेखक नहीं थे जैसे यशपाल पूरे जीवन और अज्ञेय अपने लेखन के आरंभिक दौर में थे। अपने आसपास की दुनिया, घर-परिवार, परिवेश की कुंठाएं उन्हें भावनात्मक रूप से हिला कर रख दिया, लिहाजा उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की और अवर न्यायाधीश बने। अपनी पत्नी शीला देवी का यक्ष्मा के कारण हुई अकाल मृत्यु ने उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ कर रख दिया। वे नौकरी छोड़कर फिर लेखन की ओर मुड़े और 1936 में एक लघुकथा 'डाची' लिखा जो हिन्दी-उर्दू अफसाने में मील का पत्थर साबित हुआ।


    उनका गंभीर और व्यवस्थित लेखन प्रगतिशील आंदोलन के दौर में शुरू हुआ। उसकी आधारभूत मान्यताओं का समर्थन करने के बावजूद उन्होंने अपने को उस आंदोलन से बांधकर नहीं रखा। यद्यपि जीवन से उनके सघन जुड़ाव और परिवर्तनकामी मूल्य-चेतना के प्रति झुकाव, उस आंदोलन की ही देन थी। साहित्य में व्यक्तिवादी-कथावादी रूझानों से बचकर जीवन की समझ का शउर और सलीका उन्होंने इसी आंदोलन से अर्जित किया था। भाषा एवं शैलीगत प्रयोग की विराट परिगति उनकी इसी सावधानी की परिणति थी। उनकी कहानियां मानवीय नियति के प्रश्नों, जीवनगत विडंबनाओं, मघ्यवर्गीय मनुष्य के दैनदिन जीवन की गुत्थियों के चित्रण के कारण, नागरिक जीवन के हर पहलू से संबंद्ध रहने के कारण सामान्य पाठकों को उनकी कहानियां अपनापे से भरी लगती है, उनमें राजनीतिक प्रखरता और उग्रता के अभाव में किसी रिक्तता का बोध नहीं होता। विषय और कौशल की विविधता भरी तेइस चुनिंदा कहानियों का संकलन उपनेन्द्रनाथ अश्क की श्रेष्ठ कहानियां प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य के मर्म को गंभीरतापूर्वक समझने के लिए एक संग्रहनीय पुस्तक है। 1933 में अश्क का लघुकथा संग्रह 'औरत की फितरत' आया जिसकी प्रस्तवाना खुद मुंशी प्रेमचंद ने लिखा था। अश्क अपने शुरूआती साहित्यिक दौर में उर्दू में लिखा करते थे, मुंशी प्रेमचंद की सलाह पर उन्होंने हिन्दी में लिखना शुरू किया। 1941 में अश्क ने ऑल इंडिया रेडियो में कार्यरत हुए जहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध समकालीन अफसानानिगारों कृश्नचंदर, पतरस बोखारी, ख्वाजा अहमद अब्बास, मिराजी, रशिद, राजेन्द्र सिंह बेदी एवं सदात हसन मंटो से हुई। दिल्ली में रहते हुए उनके समकालीन हिन्दी कथाकारों में प्रमुख अज्ञेय, शिवदान सिंह चौहान, जितेन्द्र कुमार, बनारसी दास चतुर्वेदी, विष्णु प्रभाकार और गिरिजा कुमार माथुर थे। उपेन्द्रनाथ अश्क हिन्दी के प्रहले वैसे नाटककार हुए जिन्हें 1956 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से नवाजा गया था


    जालंधर, पंजाब में 14 दिसंबर, 1910 को जन्मे उपेन्द्रनाथ शर्मा अपने बालपन में ही पंजाबी कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। उर्दू में लिखना उन्होंने जालंधरी शायर मोहम्मद अली 'अजर' के शार्गिदी में शुरू किया, उनका पहला उर्दू शेर लाहौर के अखबार 'मिलाप' में छपा। उनका पहला लघुकथा संग्रह 'नवरत्न' 1930 में प्रकाशित हुआ। यह वही समय था जब उन्होंने अपना 'तखल्लुस' अश्क यानी आंसू रखा। उन्होंने लाला लाजपत राय के अखबार 'बंदेमातरम' में बतौर पत्राकार काम किया, इसके पश्चात उन्होंने अखबार 'वीरभारत' और सप्ताहिक 'भूचाल' के लिए बतौर कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत रहे।


    बहुमुखी प्रतिभा के धनी अश्क फिल्मों के लिए न सिर्फ कहानियां और डॉयलाग लिखे बल्कि दो फिल्म नीतिन बोस का 'मजदूर' तथा अशोक कुमार का 'आठ दिन' में भूमिका भी निभायी। बम्बई में अश्क इप्टा से जुड़े और प्रसिद्ध नाटक 'टूटने से पहले' लिखा जिसका मंचन प्रसिद्ध फिल्मकार एवं रंगकर्मी बलराज साहनी ने किया। यह नाटक सांप्रदायिकता के खिलाफ लिखा होने के कारण अंग्रेज सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था।


    1948 में उतरप्रदेश सरकार ने चिकित्सकीय मदद के तौर पर पांच हजार रूपए की मदद अश्क और निराला को मुहैया कराया था। अश्क यक्ष्मा से ग्रसित थे। अश्क सरकारी मदद से प्रेरित होकर इलाहाबाद आ गए और वहीं रहे। उनका निधन 19 जनवरी, 1996 को इलाहाबाद में ही हुआ।


    अश्क के उपन्यास में सितारों के खेल, गिरती दीवारें, गरम राख तथा बड़ी-बड़ी आँखें प्रमुख हैं। नाटकों में प्रमुख जय पराजय, स्वर्ग की झलक, लक्ष्मी का स्वागत, कैद, उड़ान, अलग-अलग रास्ते, छठा बेटा, अंजो दीदी और टूटने से पहले है। उन्होंने कविताएं भी लिखी जो  दो कविता संग्रह, 'दीप जले' और चाँदनी रात और अजगर में संग्रहित है। दो संस्मरण 'मंटो मेरा दुश्मन' और 'चेहरे अनेक' उन्होंने लिखा।


    हिन्दी-उर्दू में प्रेमचंदोत्तर कथा-साहित्य में उपेन्द्रनाथ अश्क का विशिष्ठ योगदान मील का पत्थर है।

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरंगडा
गिरिडीह-815301
झारखंड

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