सोमवार, 8 दिसंबर 2014

राजेश पाठक की कहानी - लिट्टियाँ

                               लिट्टियां

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मैं प्लेटफार्म पर अपनी ट्रेन आने का इंतजार कर रहा था। प्लेटफार्म पर काफी भीड़ थी। मन में एक भय था, ट्रेन छूट जाने का नहीं, ट्रेन में चढ़ पाने का भय और अगर चढ़ भी जाउं तो उसमें जगह बना पाने का भय।


    थोड़ी ही देर में ट्रेन की सीटी बजने की आवाज सुनाई दी। मैं ट्रेन में दाखिल होने के लिए अपनी जड़ता का त्यागा, उठ खड़ा हुआ। डर से धड़कन भी तेज हो चली । मैं भीड़ में गर्दन उंची कर आ रही ट्रेन को देख रहा था। ट्रेन जैसे-जैसे प्लेटफार्म की ओर पहुंच रही थी, उसकी गति मंथर हो रही थी मानों वह यात्रियों की बोझ से दबी जा रही थी, मन ही मन सोच रही थी काश यहां सारे यात्री उतर जाते। कुछ पल आराम कर लेती फिर नये उर्जावान यात्रियों को अपने डब्बे में समेटे प्रस्थान कर जाती परंतु उसके सोच के विपरीत ट्रेन रूकी। इक्का-दुक्का यात्री ही ट्रेन से अपना अंतिम सफर तय कर वहां उतरे। चढ़ने वालों की भीड़ उतरने वालों से कहीं ज्यादा थी। मैं अदम्य साहस लिये, भीड़ को चीरते ट्रेन के दरवाजे तक जा पहुंचा, तब तक मैं शक्तिहीन हो चला था पर यह क्या पलक झपकते ही मैं ट्रेन के डब्बे के अंदर था। बिना मशक्कत किये ट्रेन के अंदर। इस कदर प्रवेश पर मुझे श्रावणी मेले की याद बरबस आ गयी जब मैं थका हारा मंदिर के प्रवेशद्वार पर खड़ा था और पीछे से भीड़ के धक्के से बाबा के चरणों में जा गिरा था। मुझे बाबाधाम देवघर के उस पंडे की याद आती है जब मैं मंदिर के अंदर की कतार में असहाय खड़ा पीछे से किसी के जोर के धक्के का इंतजार कर रहा था। अकुलाहट हो रही थी परंतु जिस पंडे ने मुझे बाबा के दर्शन कराने की सुपारी ली थी वह मुझे यह कह वास्तविकता का एहसास दिला रहा था कि उस कतार से लौटने की मैं हिम्मत न दिखाउं क्योंकि लौटना आगे जाने से ज्यादा कठिन था। पहली बार वास्तविकता के विपरीत एहसास हुआ। मुझे अपनी जानकारी में कमी का एहसास हुआ। मुझे तो मालूम था कि रणभूमि में डर-डर कर आगे बढ़ने से बेहतर तो लौट आना होता है


    मैं यह सब सोच ही रहा था कि अचानक मैं किसी की गोद में जा गिरा। मालूम हुआ कि ट्रेन अगले स्टेशन पर आ रूकी है। महान वैज्ञानिक न्यूटन के जड़ता का नियम जिसे मैं छठी-सातंवी कक्षा में पढ़ा करता था बरबस याद आ गया जब तत्कालीन शिक्षक द्वारा न्यूटन के गति के नियमों की व्याख्या के क्रम में वे सदैव ट्रेन के रूकने एवं यात्रियों के अचानक झुकने का उदाहरण दिया करते थे। मैं तो न्यूटन के गति के नियमों पर खरा उतर चुका था परंतु वे खड़े यात्री जो न गिर पाए, अपनी पूरी शक्ति के साथ न्यूटन के गति के नियमों को झुठलाने में लगे थे। पूरे मशक्कत के बावजूद वे भले न गिरें हों पर एक-दूसरे पर झुक जरूर गए थे।


    ट्रेन उस स्टेशन पर बहुत देर नहीं ठहरी थी। छोटा स्टेशन था। अगला स्टेशन तुरंत आने वाला था। कुछ लोग उतरने के लिए जगह बना रहे थे। मुझे पुनः अपने अधूरे ज्ञान पर पछतावा हुआ कि लोग ट्रेनों में बैठने, अंदर आने के लिए जगह बनाते है। यहाँ तो लोग उतरने के लिए ही जगह बना रहे थे। सच कहूं तो ट्रेन में चढ़ना जितना मुश्किल था उससे उतरना कहीं और भी ज्यादा मुश्किल। परंतु दाद देनी होगी ट्रेनों में चल रहे भेन्डरों की जो अपनी प्रबंधकीय तकनीक का इस्तेमाल कर अपनी खाद्य या अन्य विक्री की जाने वाली सामग्रियों को बेचने के लिए सहजता से जगह बना ले रहे थे। जहाँ पैर रखने की जगह ना हो वहाँ चलने के लिए पगडंडी बना लेना प्रबंधकीय कुशलता नही ंतो और क्या है ? कभी-कभी तो मन करता है कि भारत के प्रतिष्ठित प्रबंधकीय संस्थानों में पंबंध का पाठ पढ़ाने के लिए उन भेन्डरों को भी अवसर दिया जाना चाहिए जो अपनी जीविका के लिए जहाँ राह न हो वहाँ राह बना डालते हैं। मुझे ऐसा लगा कि मुझे प्रबंधकीय ज्ञान प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए और मैं उस भेंडर से पूछ ही बैठा वह सब कुछ जो उसकी कुशलता का राज था। मैंने सोचा कि पता नहीं दुबारा मुझे ज्ञानार्जन का अवसर मिले न मिले। मैंने पूछा, इतनी भीड़ में जगह कैसे बना लेते हो। यह तो वही बात हुई कि दाँत भी न हो और चने चबा लेते हो।


    मेरी बात सुन भेंडर को मेरे साहित्यिक होने का भान होने लगा। मुझे भी लगने लगा कि क्यों नहीं उसकी व्यथा, रोजमर्रा जिंदगी पर कथा लिखूं। वैसी कथा लिखूं जो यह भान कराये कि कैसे लेखक अपने पात्रों से ही सब कुछ सीखता है और उस सीख को समाज में बांटता है।


    वह हर रोज की तरह उस रोज भी अपने बाल-बच्चों की भूख को शांत करने के लिए ट्रेनों में सफर कर रही अजनबी-अनजान दुनिया की भूख को शांत कर रहा था। मानों उसकी आँखें कह रही थी, उसकी बनी खा लो और भूख मिटा लो, तभी जाकर उसके बच्चे की भूख मिट सकेगी। मैं भी भूख न होते हुए भी, उसकी मोटी और गोयठे पर की पकी लिट्टियां बड़े चाव से खरीदी यह सोच कर कि भले मैं ना खाउं पर अब उसके बच्चे जरूर खा सकेंगे। मेरी लिट्टियां नहीं, इन लिट्टियों के एवज में दिये गए पैसों से वो सब कुछ जो वे खाना चाहते हैं। यह सब कुछ होते-होते मैं अपने पड़ाव पर आ चुका था। ट्रेन से उतरकर तेज चाल से मैं घर की ओर बढ़ रहा था कि कहीं लिट्टियां ठंडी न हो जाए।

 

राजेश कुमार पाठक
गिरिडीह-815301
झारखंड़
सेल फोन-09955114600

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