बुधवार, 10 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - क्या इंटरनेट का इस्तेमाल मानवाधिकार में सम्मिलित होगा?

इंटरनेट के इस्तेमाल को 'मानव अधिकार' बनाने की वकालत !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने इंटरनेट के इस्तेमाल को मानव अधिकार बताते हुए कहा है कि सोशल नेटवर्किग साइट की तरफ से किए गए सर्वे में यह पाया गया है कि 69 प्रतिशत भारतीय यह नहीं जानते कि इंटरनेट से उन्हें क्या फायदे हैं। केवल 30 साल के इस नौजवान बिलेनियर ने कहा कि फेसबुक इस समय स्थानीय भाषा में कंटेंट यानी अंतर्वस्तु पर ध्यान दे रहा है। यह भारत में इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए जरूरी है।

जुकरबर्ग ने किसानों के लिए लोकल एप्स और स्थानीय भाषाओं में सोशियल सर्विस डेवलप करने वालों के लिए नया कॉन्टेस्ट भी लॉन्च किया है। इसके लिए एक मिलियन डॉलर का फंड दिया गया है। जुकरबर्ग भारत ने दो दिन की भारत यात्रा पर नई दिल्ली में इंटरनेट डॉट ओआरजी समिट पर संबोधन भी किया। जुकरबर्ग प्रशासन के सुधार में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।  साथ ही वे भारतीय पर्यटन को बढ़ाने में सोशल मीडिया कितना योगदान दे सकती है इस बारे में भी चर्चा का माहौल बना रहे हैं। 

गौरतलब है कि भारत में अमरीका के बाद फेसबुक की मजबूत मौजूदगी है। यहां फेसबुक के विस्तार के लिए अपार संभावनाएं हैं, जो कि भारत में एक पहले ही एक मशहूर प्लेटफॉर्म है। साथ ही कहा गया था कि यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रचनात्मक कार्यों में एक साथ काम करने की जरूरत है। तो ये है मानव अधिकारों के बदलते परिवेश और उससे जुड़ी उम्मीदों के बढ़ते दायरे की एक नई पेशकश। मानव निर्मित इंटरनेट का मानव अधिकारों से क्या रिश्ता हो सकता है इसकी भनक साइबर क्राइम को लेकर तो मिलती ही रहती है, लेकिन इसके इस्तेमाल को इंसान के हक़ से जोड़ने वाली बात वास्तव में बिलकुल निराली है। 

वंचित अधिकार से जन्मे कुछ संकट

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खैर, हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ और कश्मीर में हुईं वारदातों के मद्देनज़र अगर गौर करें तो मानव अधिकारों का मुद्दा बार फिर नए सिरे से सोचने का सबब बन गया है। माओवाद और नक्सलवाद को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में बहुत से लोग ऐसे हालातों में रहते हैं, जिनसे यह रोग पनपता है। बेहतर भविष्य की आशा रखने वाले वे भारतीय नागरिक अनेक कारणों से खुद को अपने अधिकारों से वंचित महसूस करते हैं। उन क्षेत्रों में यही इस रोग के पनपने का आधार बनता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मानव अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। यह भी एक वास्तविकता है कि माओवादी और नक्सलवादी गुट निर्दोष लोगों के मानवाधिकारों पर वार करते हैं। लेकिन इससे निपटने के लिए भी उन इलाकों के सभी बाशिंदों के मानवाधिकारों का संरक्षण और संवर्द्धन ही एकमात्र उपाय है। आज विकास, सुरक्षा और मानव अधिकारों में से कोई भी एक, बाकी दोनों तत्वों के बिना अकेले सफल नही हो सकता। 

सुरक्षा का अभाव,विश्वास पर खतरा

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लिहाज़ा, मानव अधिकार  के प्रखर चिंतकों का यह कहना बेमानी नहीं है कि मानव अधिकार की जोरदार वकालत करने वाला तंत्र भी यदि स्थानीय लोगों की सुरक्षा और विकास के लिए कुछ ठोस उपाय नहीं करता,तो गाहे बगाहे वह अपनी विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है। लेकिन इसके साथ ही गरीबों को भी इतना सजग बनाने की जरूरत है कि वे अपने शोषण का प्रतिरोध कर सकें और कोई सरकारी तंत्र या गैरसरकारी समूह उनका शोषण नहीं कर सके। सामाजिक न्याय विशेषकर वैश्वीकरण के व्यापक संदर्भ में अति आवश्यक मुद्दा बन चुका है। सरकारों और नागरिकों के पारंपरिक संबंध वैश्वीकरण के कारण बदल रहे हैं। इसके चलते सामाजिक-आर्थिक न्याय की प्राप्ति के रास्ते में नई चुनौतियां पेश हो रही हैं - चाहे वह विनाशकारी वित्तीय संकट के रूप में हो या आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते मूल्यों के रूप में ,या फिर विश्व व्यापार संगठन , अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते प्रभाव के रूप में। मानवाधिकारों को समाज के सभी सदस्यों ,विशेषकर सरकार और उसकी एजेंसियों के व्यवहार की उपलब्धियों और सिद्धांतों के मानक के तौर पर देखा जाता है। 

स्मरणीय है कि 10 दिसंबर 1948 को यूनाइटेड नेशन्स की जनरल एसेम्बली ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया। इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही एसेम्बली ने सभी सदस्य देशों से अपील की कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों या प्रदेशों की राजनीतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना विशेषतः स्कूलों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में इसके प्रचार, प्रदर्शन और व्याख्या का प्रबंध करें। इस घोषणा में न सिर्फ मनुष्य जाति के अधिकारों को बढ़ाया गया बल्कि स्त्री और पुरुषों को भी समान अधिकार दिए गए।

इंसानियत की छतरी का दूसरा नाम

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बहरहाल,मानव अधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं। यह अधिकार भारतीय संविधान के भाग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किये गये हैं और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है । इसके अलावा ऐसे अधिकार जो अंतर राष्ट्रीय  समझौते के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा स्वीकार किये गये है और देश के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है, को मानव अधिकार माना जाता है । इन अधिकारों में प्रदूषण  मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार, अभिरक्षा में यातनापूर्ण और अपमानजनक व्यवहार न होने संबंधी अधिकार, और महिलाओं के साथ प्रतिष्ठापूर्ण व्यवहार का अधिकार शामिल है।

अधिकार के हनन के जाने कितने रूप

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एक और पहलू पर गौर कीजिए। आज जहां हमारी नारियां सशक्तीकरण के मार्ग पर सतत अग्रसर हैं ,वहीं बड़ी तादाद में बच्चे अभी भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं और मजदूरी करने के लिए विवश हैं। वृद्ध जनों और विकलांगों की दीर्घकालिक तथा सतत देखभाल करने वाली हमारी मशीनरी और संस्थाएं अब भी बेहद सतही हैं। सरकार जहां समावेशी विकास सुनिश्चित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है वहीं आम मानस में जाति और क्षेत्र आधारित विभाजन अब भी कुंडली मारे बैठा है। अति गरीब की श्रेणी में समाज का वह समूह आता है जो सामाजिक - आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा असुरक्षित है। ऐसे समूहों में भिखारी ,किन्नर ,एचआईवी पीडि़त , झुग्गी - झोपड़ी में रहने वाले बच्चे , कारखानों में काम करने वाले बच्चे, अवैध रूप से प्रताडि़त लोग , खासकर महिलाएं , मानसिक विकलांग , कुष्ट रोगी , बहु विकलांगता के शिकार व्यक्ति , देह व्यापार वाले इलाके में रहने वाले बच्चे , अनाथ बच्चे , परिसंपत्ति विहीन लोग , फुटपाथ पर रहने वाले लोग , बेघर और कचरा बीनने वाले आदि शामिल हैं। ऐसे लोगों की बदहाली इतनी अधिक है कि वे अमानवीय स्थिति में जीवन बसर करने को मजबूर हैं। 

न्याय पालिका की सशक्त भूमिका

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अति गरीबों के उत्थान के लिए उनकी पहुंच सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के लाभ तक बनानी होगी। इसके लिए भी उन्हें सहयोग की आवश्यकता है। ऐसे लोग घोर आर्थिक तंगी के शिकार होते हैं , जिसके चलते समाज इन्हें अपने लिए कलंक मानता है और इन्हें खुद से अलग - थलग कर देता है। व्यापक समाज में इनकी कोई अपनी पहचान नहीं है। किसी प्रकार की आकस्मिकता को झेलने के लिए इनके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं है तथा इन्हें किसी प्रकार का संस्थागत सहयोग प्राप्त नहीं है। बहरहाल , हमारी कमजोरियां चाहे जो भी हों , हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि मानवाधिकार सुनिश्चित करने और सामाजिक न्याय हासिल करने की हमारी संरचना काफी मजबूत है। यह गर्व की बात है कि न्यायपालिका ने इसे असीम शक्ति दी है। 

स्पष्ट है कि मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।

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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित

प्रखर वक्ता और दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर हैं। 

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