गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - उपहारों में शामिल हो बाल साहित्य

भावनाओं को समझे, ऐसा साहित्य बच्चों को दें

उपहारों में शामिल हो बाल साहित्य ..........

क्या कभी आपने सोचा है कि बच्चों की दुनिया बड़ों की दुनिया से बड़ी होती है। इसी कारण तो बच्चे आज इक्कीसवीं सदी में भी बडों,के सरोकारों का अहम्- हिस्सा हैं। घर की चहार दीवारी से लेकर खेल का मैदान, स्कूल परिसर तक उनकी दुनिया आबाद दिखाई पड़ती है। घरों में बच्चों के लिए कम्प्यूटर गेम्स और इलेक्ट्रानिक खिलौनों की भरमार है तो घर के बाहर कदम रखते ही अमेरिकी और अन्य यूरोपीय देशों के मॉडल स्वरूप मंहगे और तामझाम से भरपूर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल। प्रत्येक अभिभावक इलेक्ट्रानिक सुविधाओं और अंग्रेजी स्कूल का तमगा लगाने के बाद खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। इन सारे तामझाम और दिखावटी दुनिया से बच्चों का कोई भला हो या न हो, बड़ों का सामाजिक रूतबा सिर चढ़कर बोलने लगता है। सवाल यह उठता है कि ऐसे सामाजिक रूतबे से संबंध रखने वाले बड़ों का प्रतिशत हमारे भारतीय संदर्भ में कितना है? इसे बताने की शायद अधिक आवश्यकता नहीं है। यह सर्वविदित है कि देश के अधिसंख्य माता -पिता उन बड़ों की कतार में दूर-दूर तक दिखायी नहीं पड़ रहे हैं। यही मुख्य कारण है कि उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए न तो माकूल वातावरण उपलब्ध हो पा रहा है, और न ही उन्हें उपयुक्त पाठ्य सामग्री ही मिल पा रही है। ऐसे अनगिनत बच्चे भारतीय गांव कस्बों, महानगरीय झुग्गी झोपड़ी वाली बस्तियों में जीवन काट रहे हैं। वे उसी दुनिया मे रहते हुए अंतरिक्षगामी इक्कीसवीं सदी को अपनी पीठ पर ढोने की तैयारी में लगे सपने संजो रहे हैं।

वर्तमान शिक्षा की पाँच सितारा संस्कृति में ऐसे गरीब बच्चों का कोई स्थान नहीं है। कहा जाये तो सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा .... कहलाने वाले विराट चमन में वे बच्चे गुलाब की नहीं, कुकुरमुत्ते की हैसियत रखते हैं। शिक्षा के अधिकाधिक स्वायत्त होते जा रहे बाजार में उनका कोई मूल्य नहीं है। आज जो बच्चे हमारी लेखकीय चिंताओं के केन्द्र में हैं, हम जिन्हें लक्षित कर लिखना चाहते है, उनकी दुनिया पूरी तरह बदल गयी है। अब ज्ञान से ज्यादा विज्ञान का दखल दिखायी पड़ रहा है। दादी-नानी की जुबानी पंचतंत्र की कथाओं और हातिमताई के हिस्से -कहानियों का उस दुनिया में अब मोल नहीं रह गया है। एक ओर बच्चों का पसंदीदा शक्तिमान है तो दूसरी ओर स्पाईडरमैन और डोरीमोन। सहज संवेदना और कल्पनाशीलता के लिए बच्चों की दुनिया में कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसी परिस्थितियों के उदय होने पर सबसे पहला सवाल अभिभावकों से करने का मन करता है। आपके बैठक कक्ष में क्या कोई कोना किताबों के लिए आरक्षित है? और अगर है भी तो उसमें बालमन को आकर्षित और प्रभावित करने वाली कितनी और कैसी सामग्री है?

दूसरा सवाल समाज के सबसे अधिक जवाबदार शिक्षक वर्ग से । आप शिक्षक हैं, लेकिन आपके शिक्षक कौन हैं? बच्चों और प्रकृति को तो आप अपना शिक्षक स्वीकार करने से रहे। महान कथाकार प्रेमचंद गोर्की और टालस्टाय जैसे लेखकों को भी नहीं, जिन्होंने जीवन और समाज को ही अपना विश्वविद्यालय मान लिया था और फिर पूरा जीवन समर्पित कर दिया। न आप में नया पढ़ने की ललक है और न ही पढ़ाने की। किताबों से आपका रिश्ता महज कोर्स पूरा कराने तक ही है, और उसी सीमित सामग्री में बच्चों को बॉधे रखने में आप अपनी महानता समझते हैं। बच्चों के लिए आपकी छवि मात्र थानेदार की है, एक अच्छे दोस्त या मित्र की प्रतिमूर्ति नहीं। दूसरी ओर बच्चों के अभिभावकों के लिए एक अधिकारी का किरदार ही निभा पा रहे हैं। आपने यह समझने की जरूरत ही महसूस नहीं की, कि बच्चों को एक बेहतर इंसान बनाने के लिए उन्हें बेहतर किताबों और पत्रिकाओं से जोड़ना होगा। उन्हें संस्कारित करने के मार्ग में उनके मन में यह बात डालनी होगी कि अच्छी किताबें ही उनकी सबसे अच्छी दोस्त हैं। वही सबसे अच्छी शिक्षक भी हैं।

शिक्षक से सवाल के बाद अब लेखक की भूमिका और उसके योगदान से संबंधित प्रश्न भी जरूरी लगता है। यदि आप लेखक हैं तो वह तय है कि बच्चों के लिए नहीं लिखते होंगे। कारण यह कि बच्चों पर लिखना बच्चों का खेल नहीं इसलिए बेहतर यही है कि इस इलाके से चुपचाप बचकर निकल लिया जाये। बच्चों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में वही पुरानी आरूणी - श्रवण कुमार और एकलव्य की नैतिक कथाएँ ही शामिल न हों, जिन्हें पढ़ते-सुनते हमारी पूरी पीढ़ियाँ गुजर गयीं। अब ऐसा कुछ लिखना होगा जिसमें बच्चों की अपनी दुनिया ही उन्हें दिखायी दे। उनका अपना यथार्थ, उसके साथ उनका बनने वाला रिश्ता बड़ी ही सावधानी और गंभीरता के साथ साहित्य में समेटना होगा। एक गंदा और फटे चिथड़े कपड़ों में गली-गली रद्दी बीनता घूम रहा बच्चा और उसके स्वयं की रद्दी कर दी गयी किताबें भी लेखक के साहित्य का विषय होना चाहिए अथवा नहीं? इस पर भी विचार करना होगा। आयु-वर्ग का निर्णय करते हुए उसी के अनुरूप भाषा और शिल्प का चयन भी जरूरी तत्व होगा। बच्चों की रचनात्मकता को टटोलने और जगाने की एक सुरूचिपूर्ण कोशिश साहित्य द्वारा ही की जा सकती है। बच्चों के विषय में बड़ी बारीकी से यह समझना होगा कि वे अपने आसपास को किस नजरिये से देखते हैं। उससे उनके रिश्तों और लगावों की शक्ल क्या है। घर परिवार और पास पडोस से लेकर स्कूल तक जो उनकी दुनिया फैली हुई है, उसे वे किस तरह लेते हैं।

हिन्दी बाल साहित्य की जिस विधा के बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह हिन्दी बाल साहित्य के प्रारंभिक चरण से लेकर आज तक हमेशा लोकप्रिय रही है, वह है बाल जीवनियों की विधा। यह एक ऐसा झरोखा है जहाँ से बच्चे ऊंचे शिखरों की ओर देखते हैं और अपने जीवन में नई उम्मीदों के रंग भरना सीखते हैं। उन्हें निरंतर संघर्ष में तपकर आत्मिक आभा से दमकते चेहरों का सौंदर्य

आकर्षित करने लगता है। लिहाजा उनमें खुद भी उसी राह में आगे बढ़ते की ललक पैदा होती है। शायद यही कारण है कि बहुत से लेखकों से लेकर कलाकारों, स्वाधीनता सेनानियों और वैज्ञानिकों ने अपनी सफलता की कहानी लिखते हुए बड़े भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है कि बचपन में पढ़ी हुई महापुरूषों क्रांतिकारियों और महान समाज सुधारकों की जीवनियों का उन पर गहरा असर पड़ा और उनका समूचा जीवन ही बादल गया। जब बड़ों के लिए जीवनियाँ इतनी प्रेरक हो सकती हैं तो बच्चों के कोमल कल्पनाशील मन पर उनका कितना गहरा असर होता होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

हम बच्चों का जन्म दिन मनाते हैं। केक, पेस्ट्री, चॉकलेट, मिठाइयाँ मंहगे खिलौने उनके उपहारों में शामिल होते हैं। अलग-अलग प्रकार की तमाम चीजें हम तोहफों की सूची में समाहित करते हैं, किन्तु किताबें हमारे तोहफों में कहीं भी दिखायी नहीं पड़ रही हैं। हम यदि अच्छे साहित्य के पाठक हैं, तो हमारे बच्चे भी उस ओर आकर्षित जरूर होगें। किताबों से भी उनका एक आत्मिक रिश्ता अवश्य बनेगा। दरअसल अपनी भाषा और साहित्य के प्रति हमारी निष्ठा और दिलचस्पी ही हमारे बच्चों को एक बेहतर पाठकीय संस्कार दे सकती है, और वही संस्कार कुछ भी बन जाने के बावजूद उन्हे एक संवेदनशील मनुष्य और जागरूक नागरिक बने रहने की प्रेरणा देता रहेगा।

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

1 blogger-facebook:

  1. पर आज कॉमिक और स्तरहीन किताबों से आगे सोच ही नहीं पाते literate मां बाप

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