सोमवार, 15 दिसंबर 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - बिना सब्सीडी की रसोई

बिना सब्सीडी की रसोई

हम लोगों की जिन्दगी बिना सब्सीडी के सालों चली।

पहले सब्सीडी होती कहाँ थी ....?

यो कहीं होती भी रही हो तो, सरकारें जतलाती नहीं थी।

चुपचाप दे देती थी ले रख स्टाइल में,......जैसे सास, बेटी बिदा के वक्त दामाद के खीसे में जबरदस्ती नोट डाल रही हो।

आजकल एकदम उलट हो रहा है। सरकारें डंके बजाये जा रहीं हैं।

सब्सीडी का बोझ न उठाया जाएगा .....?कम करना हमारी मज़बूरी है। कम करके रहेंगे।

हायर-मिडिल क्लास के लिए अच्छे देनों की गिनती शुरू भी न हो पाई थी की उलटी गिनती शुरू होने के दिन आ गए|

लोग कहते हुए याद करेंगे,वो भी दिन थे,’सरकार’ हर थाली में ‘सब्सीडी-देवी’ के रूप में पसरी हुई थी|

बैगन के भुर्ते में, सब्सीडी की खुशबु हुआ करती थी।

दाल के तड़के में, सब्सीडी समाया हुआ था।

कुकर जब सीटी बजाता था, तो लगता था कि सब्सीडी का शंखनाद हो रहा है।

क्या सस्ते का ज़माना था.......?

एक सिलेंडर में महीने भर की फेमली मौज हो जाया करती थी।

मिडिल,हायर-मिडिल क्लास के ये छोटे छोटे मजे छीन के कोई चैन से भला कैसे रह सकता है?

अब पड़ोसन से मिलाने पर बातें यूँ होने की नौबत है.....,तुम्हारे ‘वे’ बिना सब्सीडी वाले सिलेंडर ,अब कहाँ से जुगाड़ करते हैं भैन जी....?हमें भी बताओ न ... बहुत दिनों से.गाजर के हलुए नहीं बनाए ?

टोमेटो का सीजन निकले जा रहा है साँस बनाने की कौन कहे ,चार बोतल बनाने में लगता है सिलेंडर चुक जाएगा ?

इससे अच्छा तो बाजार से खरीद के वापरने में अकलमंदी है

आप क्या कहती हैं मिसेज सिन्हा .....?आपके यहाँ सिलेंडर के अकाल तो पड़ते नहीं होगे ..... ,भाई सा, फुड विभाग वाले हैं एक मंगाओ चार आ जाता हैगा ।

अरे मिसेज शीला...... ,वो दिन अब लद गए...... ये कह रहे थे, अब सम्हाल के चलाओ आधार कार्ड के दम में, एक-एक को, गिन-गिन के मिलेगा।

इफरात में जलाने-उडाने का ज़माना, अब रहा नहीं समझ लो|

पहले बिना किसी झिझक के एक दूसरे के घर से सिलेंडर उठा लाते थे।

अचानक दालमखानी बनाते-बनाते सिलेन्डर बोल गया, किसी को तनिक भी परेशान होने की नौबत ही न आती थी, पडौसी को अधपकी दालमखनी दो, वे तडका मार के दे जाती थी, बता देती थी कि अपने हिस्से का आप रख ली हैं।

अरी रमीला जानती है, कल से, आपके भाईसाब के घर से फौज आने को है, वे बोलेंगे जानबूझकर हम बहाना बना रहीं हैं, आज ही सिलेंडर को ख़त्म होना था ,ब्लेक वाला लगवाना ही पड़ेगा तेरे पास कान्टेक्ट ननबर है तो देना ज़रा ....|

एक ज़माने में जब कोई ये कहती ,दीदी अब इज्जत आपके हाथ है बचा लो| सुनने वाली वो बड़ी दीदी का रोल बखूबी निभा लेती, अरे घबराने की जरुरत नहीं ,सिलेंडर की ही क्या बात, और कुछ चाहिए तो ले जाओ।

यही सीन अब बदले रूप में बहाने बाजी की शकल अख्तियार करने को है|

क्या बताएं बहन ,हमने महीने भर पहले लगाया है अब-तब में ये ख़त्म होने को है सिलेंडर की कहो ही मत,वैसे साफ मना करने में हमें बुरा तो लग रहा है पर क्या करें ? अपने समय में कोई मदद को सामने न आयेगा ,तब हम कहाँ कहाँ भटकेंगे ?

कहते हैं जब भगवान् देता है, तो छपर पहाड़ के देता है।

साठ सत्तर के दशक में अग्नि देवता अति प्रसन्न हुआ करते थे। छप्पर-फाडू थे ....|

गृहणियों को 'आग-लगाने' की सुध न हुआ करती थी ,वे 'आग-जलाने’ में इतना व्यस्त रहती कि बेकार के दूसरे काम देख न पाती|

रेलवे किनारे घर होते, ढेर सा कोयला ट्रेक पर पड़ा मिल जाता ,जिसे जितना उठाना हो उठा ले जाए। तब भी इमानदारी से लोग सिर्फ सुबह या शाम के लायक उठा लाते ,घर में जमा रखने का झंझट कौन पाले ?जंगल में लकड़ियाँ बेहिसाब काटो ,गठरियाँ ले जाओ पूछने वाला कोई मुहकमा न था। बिजली की चोरी से, हीटर में खाना बना लो, किसी सब्सीडी का सवाल न था।

उन दिनों के खाने में, ‘सोधी’ सी महक, आज की बेस्वाद सब्सीडी वाले खाने से कहीं ज्यादा उड़ा करती थी।

 

सुशील यादव

२०२,श्रीम सृष्ठी

अटलादरा,वडोदरा ३९००१२

susyadav67@gmail.com

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  1. बेशक सुशील जी रेलवे ट्रैक के किनारे से उठाये कोयले पर बने कहने में जो स्वाद था वोह
    सब सीडी वाले सिलिंडर में कहाँ......सुन्दर रचना बधाई

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