रविवार, 21 दिसंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का प्रेरक आलेख - अपने दिल में डूबकर पा ले सुरागे ज़िंदगी

अपने दिल में डूबकर पा ले सुरागे ज़िंदगी

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

अंग्रेजी व्याकरण का एक विद्वान एक नाविक के साथ नाव में बैठा था। अपनी उपलब्धियों के घमंड से भरकर, उसने नाविक से पूछा, 'क्या तुमने कभी व्याकरण सीखी है?' नाविक ने कहा, 'नहीं, मैंने नहीं सीखी।' कटाक्ष के साथ, व्याकरण के विद्वान ने कहा, 'तब तो तुमने अपनी आधी जिंदगी बर्बाद कर दी!' नाविक इन अभद्र वचनों से व्याकुल हो उठा,पर बाहर से शांत रहा। थोड़ी ही देर में अचानक नाव एक भंवर में फंस गई और नाविक उसे किसी भी प्रकार बाहर नहीं निकाल पाया। इस भय के साथ कि नाव डूब जाएगी, नाविक उफनती लहरों के शोर में चिल्लाया- आचार्य जी, तुम्हें तैरना आता है?' व्याकरण के विद्वान ने तिरस्कार से उत्तर दिया, 'नहीं। मुझसे तैरना जानने की उम्मीद मत रखो। मैंने ऐसे बेकार के कामों में समय खराब नहीं किया है।' नाविक ने उसे बताया, 'अच्छा ! अब यह नाव भंवर की लहरों में डूबने जा रही है और तुमने तैरना न सीखकर अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी है, क्योंकि अब तुम डूबने वाले हो।'  

किस तरह बिताते हैं हम ज़िंदगी ?

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मौलाना रूमी द्वारा अपनी पुस्तक 'मसनवी' में लिखी गई यह कहानी एक महत्त्वपूर्ण सत्य की ओर इशारा करती है। यह हमें इस बात पर विचार करने को कहती है कि हम अपनी जिंदगी कैसे बिताते हैं और हम किसे महत्व देते हैं? विद्वान को अपनी बुद्धिमत्ता पर बहुत घमंड था, पर जब तैरने के व्यावहारिक अनुभव की बात आई तो उसके बौद्धिक ज्ञान ने उसकी कोई मदद नहीं की। तैरने जैसे व्यावहारिक ज्ञान को उसने महत्व नहीं दिया था। वह अपनी व्याकरण की पुस्तकों के अध्ययन में व्यस्त था और उसने कभी महसूस नहीं किया था कि जीवन में कभी उसे कुछ और सीखने की जरूरत पड़ेगी।

हममें से ज्यादातर उसी नाव में हैं। हम अपना जीवन भौतिक और बौद्धिक लक्ष्य पाने में लगा देते हैं, पर जीवन के वास्तविक ज्ञान और अध्यात्म से अनजान रहते हैं। जब भौतिक मृत्यु की उफनती लहरें हमारे ऊपर आ जाती हैं तो हममें कोई आध्यात्मिक क्षमता नहीं होती कि हम अपने जीवन के अंत से आसानी से निकल सकें। जब हमें खबर मिलती है कि हमें एक जानलेवा बीमारी है या अचानक अपनी मृत्यु दिखाई देती है तो हम भयभीत हो जाते हैं। हमें समझ में नहीं आता कि हम क्या करें। हमने अपना समय जीवन और मृत्यु का सच्चा अर्थ समझने में नहीं लगाया होता है और हम अपने अंत से डर जाते हैं। जिन लोगों ने ध्यान-अभ्यास के द्वारा आध्यात्मिक धारा में तैरना सीखने में अपना जीवन गुजारा है, उन्हें कोई डर नहीं होता। वे इसी जीवन में परलोक के जीवन की शान देख चुके होते हैं। वे देहाभास से ऊपर उठने की कला सीख चुके होते हैं और स्वयं परलोक के क्षेत्रों को देख चुके होते हैं।

सब कुछ हो कर भी असंतोष क्यों ?

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कई लोग हैं जो भरपूर सुख-सुविधा मिलने के बाद भी अपने जीवन से असंतुष्ट रहते हैं। ऐसा क्यों? क्या धन, पद, सम्मान, ऐश्वर्य जीवन को आनंद नहीं दे पा रहे? क्या मनुष्य के भीतर कोई अपराधबोध बना रहता है? इस खुशी रहित स्थिति को ग्रीक भाषा में 'एन्हेडोनिया' कहते हैं- जिंदगी में आनंद को न समझने की दशा। इसका कारण है असंतुष्टि,अत्यधिक महत्वाकांक्षा,असीम लोकप्रियता की चाह और मानसिक एवं शारीरिक थकान।घड़ी की तेज सरकती सुइयां। सड़कों पर दूर-दूर तक फैली वाहनों की कतारें हैं। ट्रैफिक जाम, बॉस की तनी भृकुटियां, सहयोगियों की बीच की शीशे की दीवारें,दूषित पर्यावरण और आधुनिक दिनचर्या है। कमजोर पड़ता सामाजिक ढांचा, सुख-सुविधाओं की बढ़ती प्यास, घर-ऑफिस में खींचा-तानी, रोज के पल-पल के समझौते, दम तोड़ती आशाएं और मन की टूटन है।

लगता है जैसे अब झुझलाहटें ही रह गई हैं जीवन में। इनसे बचने का रास्ता यह है कि हम यह जान लें कि व्यावहारिक ज्ञान जीवन को बेहतर बनाने के लिए होता है और जीवन का अंतिम लक्ष्य है स्वम को जानना, खुद को समझना। इसलिए ठीक ही कहा गया है - 

अपने दिल में डूबकर पा ले सुरागे ज़िंदगी,

तू अगर मेरा नहीं बनता न बन,अपना तो बन।

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लेखक लायंस डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन चेयरमैन

और शासकीय दुग्विजय कालेज, में प्रोफ़ेसर हैं

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