बुधवार, 24 दिसंबर 2014

पाठकीय प्रतिक्रिया - डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'


रामानुज मिश्र की कहानी 'वरदान' स्त्री जीवन के अभिशापों की विडंबना को स्वर देती एक श्रेष्ठ आंचलिक कहानी है.इस कहानी को पढ़ते हुए  शिव प्रसाद सिंह की कहानी कथन की भंगिमा और भाषा-शैली पुनः रूपाकार पाती हुई मिलती है. इसमें रेणु का अंचल बोध भी कुंडली मारे बैठा हुआ दिखता है. इन दोनों से अलग एक बात और इस कहानी में खास है जो इन दोनों में भी हमें नहीं दिखी, वह है कहानी में उपन्यास सरीखे प्रदीर्घ कथानक का निर्वाह. बाल्यावस्था से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक स्त्री जीवन के सभी संकल्पों , विकल्पों और प्रकल्पों को सिलसिलेवार प्रस्तुत करती इस कहानी में स्त्री जीवन की त्रासदी को औपन्यासिक विस्तार मिला है. यह इस कहानीकार की सबसे बड़ी शिल्पगत विशेषता भी  है. यह कहानी अपने कथ्य, भाषागत शिल्प और कथन भंगिमा के लिए जानी जाएगी.यह कहानी अपनी एक और चीज़ के लिए पाठक को सम्मोहन के स्तर तक बांधती है, वह है काव्यभाषा में निबद्ध प्रकृति-राग.कातिक की चांदनी रात की ओस में भीगे इस राग में मन खिंचा चला जाता है. -

"चलते-चलते रात जब थककर निढाल हो गयी तो उसने भोर की दहलीज पर बैठ अपने पाँव फैला दिये। गाँव के पूरबी आकाश में उगा टहकार शुकवा मीठी मुस्कान के साथ थकी हुई रात के कन्धे सहलाने लगा। मन्द-मन्द डोलती हवा ने गाँव को जगाना शुरु कर दिया। पेडों की पत्तियों भी धीरे-धीरे गुनगुनाती हुई रात्रिकालीन अपूर्ण राग को पूरा करने लगीं। डीहवाले पीपल के सिरहाने जमा बस्ती का जागरण नीचे उतरने लगा। पाल गली में निश्चिन्त सोई हलचल जाग उठी।"

 

इस विशिष्ट कहानी के प्रकाशन पर रचनाकार और उसके संपादक यानी आपको हार्दिक बधाई!
कृपया मिश्र जी का ईमेल पता दें या फिर मेरी यह टिप्पणी अलग से उन्हें अग्रेषित या प्रेषित करें.
सप्रेम
डॉ.गुणशेखर
ग्वान्ग्ज़ाऊ,चीन

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